पैगोड़ा और शिखरनुमा शैली में बना "माँ हाटकोटी मंदिर"

अपार शांति व अद्भूत शक्ति की अनुभूति होती है “माँ हाटकोटी” के दरबार में

  • हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी”
  • मंदिर का शीर्ष भाग पत्थर की स्लेट की ढलानदार छत से आच्छादित
  • हाटकोटी को अर्जित है ‘पत्थर के मंदिरों की घाटी’ का खिताब
हाटकोटी मंदिर के चारों ओर का असीम सौंदर्य

हाटकोटी मंदिर के चारों ओर  असीम सौंदर्य

हिमाचल जिसे देवभूमि की संज्ञा प्राप्त है और यहां के देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था भी उतनी ही गहरी है। ना केवल प्रदेश के लोगों की अपितु यहां के देवी-देवताओं के प्रति प्रदेश के साथ-साथ अन्य देश-विदेशों से आने वाले भी नतमस्तक अवश्य होते हैं। ऐसा ही प्रदेश का एक प्रसिद्ध मंदिर है “हाटकोटी”। जहां आकर एक अपार शांति का अनभुव तो होता ही है, साथ ही मनमोहक हरी-भरी वादियां भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। लोग दूर-दूर से माता “हाटकोटी” जी के दरबार में अपनी मन्नत लेकर पहुंचते हैं और माता हाटकोटी के दरबार में जो भी सच्चे मन से शीश झुकाकर मन्नत मांगता है माता उसकी हर मनोकामना पूरी करती है।

हाटकोटी मंदिर के चारों ओर का असीम सौंदर्य सैलानियों के मन को बहुत भाता है। हाटकोटी मंदिर में स्थापित महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति लोकमानस में दुर्गा रूप में पूजित है। आठवीं शताब्दी में बना यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से शिखर और पैगोड़ानुमा शिल्प की अमूल्य कृति है। वर्तमान में यह मंदिर दो छतरी के पैगोड़ा और शिखर शैली के मिश्रित रूप में बना है। शिखर पर सज्जे आमलक के ऊपर स्वर्ण कलश सुशोभित हैं। इस मंदिर का शेष शीर्ष भाग पत्थर की स्लेट की ढलानदार छत से आच्छादित है। हाटकोटी मंदिर दुर्गा के गर्भगृह में महिषा सुरमर्दिनी की तोरण से विभूषित आदमकद कांस्य प्रतिमा गहरी लोक आस्था का प्रतीक है।

  • माँ हाटकोटी” अपार शांति, अद्भूत शक्ति की अनुभूति

हाटकोटी मंदिर में दुर्गा मंदिर के साथ शिखरनुमा शैली में बना शिव मंदिर है। इस मंदिर का द्वार शांत मुखमुद्रा में अष्टभुज नटराज शिव से सुसज्जित है। शिव मंदिर के गर्भगृह में प्रस्तर शिल्प में निर्मित शिवलिंग,दुर्गा,गरूड़ासीन लक्ष्मी-विष्णु,गणेश आदि की प्रतिमाएं है। इस मंदिर का द्वार मुख तथा बाह्यप्रस्तर दीवारें कीर्तिमुख, पूर्णघट,कमल और हंस की नक्काशी के साथ अलंकृत है। नागर शैली में बने अन्य पांच छोटे-छोटे मंदिर प्रस्तर शिल्प के जीवन अलंकरण को प्रस्तुत करते हैं। इस पावन धारा पर संजोए पुरावशेष और प्रस्तर पर उर्त्कीण देवी-देवताओं की भाव-भंगिमाएं देवभूमि पर शैव-शाक्त संप्रदायों के प्रबल प्रभाव के उद्बोधक हैं। हाटकोटी दुर्गा का मंदिर मान्यता क्षेत्र व्यापक है। पर्वतीय क्षेत्रों में शाक्त धर्म का सर्वाधिक प्रभाव दुर्गा रूप में ही देखा जाता है।

  • हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर

लगभग 1370 मीटर की उंचाई पर बसा पब्बर नदी के किनारे हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर है। जिसमें वास्तुकला,

मंदिर का शीर्ष भाग पत्थर की स्लेट की ढलानदार छत से आच्छादित

मंदिर का शीर्ष भाग पत्थर की स्लेट की ढलानदार छत से आच्छादित

शिल्पकला के उत्कृष्ठ नमूनों के साक्षात दर्शन होते हैं। शिमला से लगभग 104 किलोमीटर दूर, शिमला-रोहड़ू मार्ग पर पब्बर नदी के दाहिने किनारे पर धान के खेतों के बीच माता हाटकोटी के प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर के लिए जाना जाता है।

कहते हैं कि यह मंदिर 10वीं शताब्दी के आस-पास बना है। इसमें महिषासुर र्मदिनी की दो मीटर ऊंची कांस्य की प्रतिमा तोरण सहित विद्यमान है। इसके साथ ही शिव मंदिर है जहां पत्थर पर बना प्राचीन शिवलिंग है। द्वार को कलात्मक पत्थरों से सुसज्जित किया गया है। छत लकड़ी से निर्मित है, जिस पर देवी देवताओं की अनुकृतियां बनाई गई हैं। मंदिर के गर्भगृह में लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, गणेश आदि की प्रतिमाएं हैं। इसके अतिरिक्त यहां मंदिर के प्रांगण में देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां हैं। बताया जाता है कि इनका निर्माण पांडवों ने करवाया था।

  • मां दुर्गा व शिव भगवान का मन्दिर प्रदेश के विख्‍यात मन्दिरों की श्रेणीयों में से एक

पब्‍बर नदी के किनारे समतल स्‍थान पर निर्मित मां दुर्गा व शिव भगवान का मन्दिर हिमाचल प्रदेश के विख्‍यात मन्दिरों की श्रेणी में आता है। इस क्षेत्र में कई पर्यटक स्‍थल है तथा उतरंचल के लिए मार्ग इसी स्‍थान से होकर जाता है। इसके आस-पास महाभारत काल के कुछ अवशेष प्राप्‍त हुए हैं। ऐसा विश्‍वास है कि पांडवों ने अपना 12 वर्ष का वनवास इसी क्षेत्र में बिताया था।

  • ताम्र घट भगवती दुर्गा के द्वारपाल होने का प्रमाण करता है पुख्ता

महिषा नाम के दानव का मर्दन करती दर्शाई गई दुर्गा की यह प्रतिमा सौम्यभाव की अभिव्यक्ति देती है। यहां मंदिर के प्रवेश द्वार पर बाईं ओर लोहे की जंजीरों में बंधा एक विशालकाय ताम्र घट भगवती दुर्गा के द्वारपाल होने का प्रमाण पुख्ता करता है। जनश्रुति है कि इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर वृहदाकार ताम्र कुंभ स्थापित थे। जब श्रावण मास में पब्बर खड्ड उफान पर होती थी तो यह दोनों घट लोहे की जंजीरों से मुक्ति पाने के लिए छटपटाहट में जोरदार सीटियों को मारने वाली आवाज जैसा वातावरण बना देते थे। जिससे यह स्पष्ट होता था कि दोनों घट अथाह जलवेग में बह जाने के लिए तत्पर रहते थे।

  • लोक मान्यता
हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर

हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर

यह भी लोक मान्यता है कि भगवती मूलतः रोहडू खशधार की माटी से उद्भासित होकर प्रबल जलवेग के साथ बहती हुई हाटकोटी के समतल भूभाग पर रूक गईं। आज भी यह लोक आस्था है कि जब-जब खशधार के नाले का बढ़ता जल वेग पब्बर नदी में शामिल होता है तब-तब हाटकोटी मंदिर में कुंभीय गर्जना अधिक भयंकर हो जाती है। कहा जाता है कि खशधार की दुर्गा के पब्बर नदी में प्रवाहित हुए अवशेषों की स्मृति में कुंभ विकराल रूंदन करते सुनाई देता है।

  • माँ के चरणों में बांधा गया है एक घड़ा
  • चरू में रखा भोजन बार-बार बांटने पर भी नहीं होता था खत्म
  • पब्‍बर नदी से हुआ है घड़े का उदग्म

एक अन्‍य मान्‍यता के अनुसार माता दुर्गा के चरणों में एक बहुत बड़े घड़े को बांधा गया है जिसे चरू नाम से संम्‍बोधित किया गया है। इस घड़े का उदग्म पब्‍बर नदी से हुआ है। लोगों का यह मानना है कि जब पब्‍बर नदी में बाढ़ आती है तो यह घड़ा नदी की ओर हिलने लगता है। कहा जाता है कि हाटकोटी मंदिर की परीधि के ग्रामों में जब कोई विशाल उत्सव,यज्ञ,शादी आदि का आयोजन किया जाता था तो हाटकोटी से चरू लाकर उसमें भोजन रखा जाता था। चरू में रखा भोजन बार-बार बांटने पर भी समाप्त नहीं होता था। यह सब दैविक कृपा का प्रसाद माना जाता था। चरू को अत्यंत पवित्रता के साथ रखा जाना आवश्यक होता था अन्यथा परिणाम उलटा हो जाता था। लोक मानस में चरू को भी देवी का बिंब माना जाता रहा है। शास्त्रीय दृष्टि से चरू को हवन या यज्ञ का अन्न भी कहा जाता है।

  • ब्रह्ममुहूर्त में प्रतिदिन स्थानीय बोली में किया जाता है भगवती का स्तुति गान
  • वाद्य यंत्रों की लय और ताल पर होती है पूजा

हाटकोटी मंदिर के दैनिक पूजा विधान में प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में भगवती का स्तुति गान स्थानीय बोली में किया जाता है। प्रात:कालीन पूजा को ढोल-नगाड़ों की देव धुन पर किया जाता है। इसे लोक मानस में प्रबाद कहा जाता है। सूर्योदय के साथ-साथ एक बार फिर पूजा की जाती है। इसके बाद दोपहर तथा सांझ होते ही पूजा-अर्चना करने का विधान है। सांयकालीन पूजा को सदीवा कहते है। रात्रिकालीन में मां दुर्गा के शयन पर नब्द बजाई जाती है। यहां प्रत्येक पूजा वाद्य यंत्रों की लय और ताल पर की जाती है। हाटकोटी मंदिर शिमला- रोहडू मार्ग पर है।

Pages: 1 2

सम्बंधित समाचार

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *