करघे से कनेक्टिविटी तक: हिम एमएसएमई फेस्ट से ऐसे बदलेगी हिमाचल प्रदेश के बुनकरों की दशा और दिशा

शिमला: शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर जब हज़ारों हस्तनिर्मित शॉलें एक साथ सजीं, तो यह सिर्फ़ एक भव्य प्रदर्शनीनहीं थी, यह हिमाचल के बुनकरों के भविष्य का संकेत था। हिम एमएसएमई फेस्ट 2026 का सफल आयोजन एक सवाल भी छोड़ गया कि क्या यह उत्सव आने वाले वर्षों में बुनकरों की ज़िंदगी बदल पाएगा? इसका जवाब है हाँ। इस आयोजन के चलते कई स्तरों पर बुनकरों के जीवन में बदलाव होंगे।अब तक बुनकर अक्सर व्यवस्था के हाशिये पर रहे। उनकी कला प्रदर्शनियों में तो दिखती थीं, लेकिन नीतियों और बाज़ार की मुख्यधारा से दूर रही। हिम एमएसएमई फेस्ट ने इस क्रम को उलट दिया। यहाँ बुनकर उत्पाद नहीं, कहानी बनकर सामने आए। कौन ऊन तैयार करता है, कौन डिज़ाइन बनाता है, और किस पहाड़ी गाँव में करघा आज भी सुबह सबसे पहले बोलता है, यह सब खरीदारों और निवेशकों ने प्रत्यक्ष देखा।

दशा बदलेगी: आमदनी, पहचान और सम्मान: इस आयोजन का पहला और सीधा असर आमदनी पर पड़ेगा। बुनकरों को थोक खरीदारों, फैशन हाउसों और निर्यातकों से सीधा संवाद करने का मिला, बिचौलियों पर निर्भरता कम होने की संभावना बनी तथा ‘हैंडमेड’ और ‘स्लो फैशन’ की वैश्विक माँग से बेहतर मूल्य मिलने का रास्ता खुला अब शॉल केवल सर्दी से बचाव का साधन नहीं, बल्कि प्रीमियम प्रोडक्ट के रूप में देखी जाने लगी है।

दिशा बदलेगी: लोककला से ब्रांड तक: हिम एमएसएमई फेस्ट ने बुनकरों को यह समझ दी कि कला तभी टिकेगी, जब वह ब्रांड बनेगी। अब आने वाले समय में कुल्लू, किन्नौर, मंडी और कांगड़ा आदि की जिला-वार पहचान और मज़बूत होगी।

पैकेजिंग, टैगिंग और स्टोरीटेलिंग पर ज़ोर बढ़ेगा: जीआई टैग और प्रमाणिकता का महत्व बुनकर स्वयं समझने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें कारीगर से उद्यमी की ओर ले जाएगा। हिमाचल के हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी हमेशा से रही है, लेकिन पहचान कम मिली। इस फेस्ट के बाद महिला बुनकर स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये संगठित होंगी, युवाओं को करघे से जुड़ने का आर्थिक कारण मिलेगा।

तकनीक और परंपरा का मिलन: हिम एमएसएमई फेस्ट 2026 ने यह भी दिखाया कि तकनीक परंपरा की दुश्मन नहीं है। डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन ऑर्डर और कस्टम डिज़ाइन, इन सबने बुनकरों को सिखाया कि करघा गाँव में रहे, बाज़ार दुनिया भर में हो सकता है।

प्रशासनिक समर्थन: उत्सव से नीति तक: इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि यह सिर्फ़ उत्सव बनकर नहीं रह गया। उद्योग विभाग, एमएसएमई तंत्र और ज़िला उद्योग केंद्रों ने बुनकरों को यह भरोसा दिया कि प्रशिक्षण, डिज़ाइन अपग्रेड, वित्तीय सहायता और बाज़ार से जोड़ने की प्रक्रिया अब लगातार चलेगी, केवल आयोजन तक सीमित नहीं रहेगी।

कुल्लू के भूट्टिको वीवर्स  सत्य प्रकाश ठाकुर का कहना है कि ‘आने वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश हैंडलूम टूरिज़्म, स्लो फैशन हब और हेरिटेज टेक्सटाइल स्टेट के रूप में उभर सकता है। यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा, लेकिन दिशा तय हो चुकी है। आयोजन ने बुनकरों को यह एहसास कराया कि उनकी कला केवल अतीत की विरासत नहीं, भविष्य की संभावना है।

मण्डी के संस्थापक कृष्णा वूल, ओम प्रकाश मल्होत्रा का कहना है कि  ‘जब करघे की आवाज़ नीति-निर्माण तक पहुँचने लगे, तब समझिए, दशा भी बदलेगी, दिशा भी। शिमला के रिज मैदान से उठी यह गूँज, प्रदेश के हर गाँव तक पहुँचे, यही इस आयोजन की असली सफलता होगी।

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