शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के आंचल में बसा, स्वर्ण कलशों से सुसज्जित मंदिर “माँ चिंतपूर्णी”

शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के आंचल में बसा, स्वर्ण कलशों से सुसज्जित मंदिर “माँ चिंतपूर्णी”

त्रिर्गत के तीन शक्तिपीठों में ज्वालाजी, वज्रेश्वरी और चिंतपूर्णी उल्लेखनीय शक्तिपीठ

पहला स्थान माता वैष्णों देवी को दिया जाता है, जो जम्मू-कश्मीर में पड़ता है

स्वर्ण कलशों से सजा चिंतपूर्णी मंदिर उत्तर भारत का दूसरा सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठ

मानव कल्याण के लिए शक्ति ने अपनी योग अग्नि से जलाई अपनी देह

हिमाचल के ऊना जिला में शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के आंचल में बसा छिन्नमस्तिका भगवती चिंतपूर्णी शक्ति पीठ स्थित है। संगमरमर के शिल्प से बने इस मंदिर का शिखर गुम्बदनुमा है।

भारतीय दर्शन ईश्वर में अटूट आस्था का पाठ पढ़ाता है। प्रभु के निरंकार रूप को ही शिव और शक्ति के साकार रूपों में देखा जाता है। मानव के कल्याण के लिए ही शक्ति मां ने अपनी योग अग्नि से अपनी देह को जलाया। अपने अंगों को 51 अलग-अलग स्थानों पर गिराया। यहीं स्थापित हुए 51 शक्तिपीठ भी, जिनमें से एक हैं छिन्नमस्तिका स्वरूपा मां चिंतपूर्णी, जो हिमाचल के कांगड़ा जिला में स्थित है। चिंताएं हर लेती है सबकी यह मां।

असुरों की छलमाया को मां जगदम्बा ने बुलाईं दो यागिनियां

पौराणिक आख्यानों में वर्णन दिया गया है कि कभी देव-असुर संग्राम हुआ। चण्ड और मुण्ड नामक सेनापति मां चंडिका व काली के हाथों मारे गए। असुरों ने अब रक्तबीज नाम के राक्षस दल को अपने पक्ष में मिला लिया। इन्हें वरदान था कि जहां भी इनका रक्त गिरेगा, तुरन्त ही हर बूंद से क्षमतावान असुर पैदा होते जाएंगें। मां जगदम्बा यह तथ्य जानती थीं। उसने दो यागिनियां जया और विजया बुलवाईं। आदेश दिया कि जमीन पर गिरने से पूर्व असुरों का रक्त पीती जाएं। असुरों की छलमाया का यह इंतजाम जरूरी था।

मां भगवती चंडिका ने स्वयं अपनी गर्दन धड़ से काट डाली

आदिशक्ति मां ने अपना नवरूप धारण कर असुरों का डटकर मुकाबला किया। अपनी सुध-बुध भूलकर जया और विजया ने बड़ी तेजी से इन राक्षसों का गिरता खून सोख लिया। इससे भी जब उनकी प्यास बुझी नहीं तो उन्होंने मां से और रक्त पीने की प्रार्थना की। ममतामयी मां भगवती अपनी दुलारियों के त्रास को सहन नहीं कर पाईं। तब चामुण्डा रूप महाशक्ति ने त्याग की वह मिसाल कायम की, जो अन्यत्र नहीं मिलती। मां भगवती चंडिका ने स्वयं अपनी गर्दन धड़ से काट डाली। तभी दो रक्त धाराएं बह निकलीं। दोनों योगिनियों के मुख में जा गिरीं। साथ ही प्रभु माया द्वारा बीच में से एक तीसरी अमृत धारा प्रकट हुई। यह मां के कांतिमय मुखमंडल में प्रवाहित होने लगी। इस कल्याणकारी स्वरूप से भगवती छिन्नमस्तिका के नाम से विख्यात हुई। तभी तो परिवर्तनशील जगत का स्वामी कबंध कहा गया है और उसकी शक्ति छिन्नमस्ता है। शाक्तों, बौद्धों और जैनमत में छिन्नमस्ता का वज्र वैरोचनी नाम भी प्रचलित है।

जो श्रद्धालु इच्छापूर्ति के उद्देश्य से वटवृक्ष को लाल मौली बांधता है उसकी इच्छा पूर्ण होती है

जो श्रद्धालु इच्छापूर्ति के उद्देश्य से वटवृक्ष को लाल मौली बांधता है उसकी इच्छा पूर्ण होती है

दशम महाविद्याओं में अग्रगण्य छिन्नमस्तिका के प्रादुर्भाव की लोक मानस में भी नाना प्रकार की लोक कथाएं प्रचलित है। किवंदन्ति है कि कालान्तर में पटियाला के अढूर नामक गांव के दो भाई माई दास और दुर्गा दास वर्तमान हिमाचल प्रदेश के रपोह मुचलेयां अंब गांव में आकर बस गए। यह दोनों भाई कृषक पेशा से थे लेकिन माई दास का अधिक समय दुर्गा पूजा में लग जाता था। एक दिन माई दास जब ससुराल जा रहा था तो छपरोह गांव से गुजरते हुए वह एक वटवृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया। उसे वहीं कुछ देर बाद नींद आ गई। माई दास को स्वप्र में एक दिव्य कन्या के दर्शन हुए। उस अलौकिक शक्ति के दर्शन से उद्वेलित होकर यह सुसराल में रूक नहीं पाया तथा वापस आकर वटवृक्ष के नीचे बैठकर स्तुति करने लगा। आखिर कन्यारूपी भगवती ने अपने भक्त दास्य भाव से प्रसन्न होकर पुन: साक्षात दर्शन दिए तथा कहा कि इस वटवृक्ष के कूल में आदिकाल से मेरा प्रस्तर पिंडी  के रूप में वास है। यहां पर तुम नित्य पूजा करना इससे तुम्हारे सारे कष्ट और चिंताएं दूर हो जाएंगी। इस स्थल से कुछ दूरी पर भगवती की लीलाओं से जल की अजस्त्र धारा प्रवाहित होने लगी। भक्त माई दास यहीं रहने लगा तथा भगवती स्वरूपा कन्या की पूजा करता रहा। माई दास ने भगवती की प्रस्तर पिंडी को देवालय में रखने के आशय से मंदिर का निर्माण भी करवाया। भक्तों की चिंता हरने वाली भगवती के इस रूप को चिंतपूर्णी के नाम से जाना जाने लगा। माई दास को मनवांछित अनुकम्पा प्रदान करने वाली जगजननी के दरबार में जो भी दुखिया जाता है वह चिंताओं के बोझ से मुक्त होकर शांति अनुभव करता है। इसी मंदिर के तालाब के साथ माई दास और उसके परिवार के अन्य तीन सदस्यों की समाधियां विद्यमान है।

जो श्रद्धालु इच्छापूर्ति के उद्देश्य से वटवृक्ष को लाल मौली बांधता है उसकी इच्छा पूर्ण होती है

इस शक्ति पीठ की धार्मिक मान्यता का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। जनश्रूति है कि सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के तालाब का जीर्णोंद्धार करवाया था। यहां लोकआस्था है कि जो श्रद्धालु इच्छापूर्ति के उद्देश्य से वटवृक्ष की शाखाओं को रक्त वर्ण डोरी (लाल मौली) से बांधता है उसकी इच्छा पूर्ण होती है। इस धार्मिक विश्वास के अनुसार मनोरथ पूरा होने पर श्रद्धालु वटवृक्ष की शाखाओं में बांधी लाल डोरियों को खोल देता है।

यह मंदिर ऋतुकाल के अनुसार ब्रहामुहूर्त में खोला जाता है। सबसे पहले भगवती का स्नान उसी अमोघ जलकुण्ड में करवाया जाता है जो माता चिंतपूर्णी ने माई दास को सुझाया था। यहीं सांयकालीन स्नान भी होता है। इस स्नान के उपरांत प्रात:कालीन और सांयकालीन पूजा-आरती की जाती है। यह मंदिर दिन में 12 से 12:30 बजे तक बंद रहता है इससे पहले दोपहर की आरती फिर माता को खीर, दाल-चावल का भोग लगाया जाता है।

माता चिंतपूर्णी शक्ति पीठ बुद्धि, धन, वैभव, मान-सम्मान दिलाने में सक्षम

माता चिंतपूर्णी शक्ति पीठ के पूर्व में व्यास के तट पर महा कालेश्वर स्थान पश्चिम में नरहाणा महादेव, उत्तर में मुच्कुद महादेव तथा दक्षिण में पीपल तथा बड़ के वन में शिवबाड़ी हैं। मां चिंतपूर्णी के इस मंदिर में भक्तों की हर प्रकार की चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। कल्याणकारी मां बुद्धि, धन, वैभव, मान-सम्मान दिलाने में सक्षम है। यह वही स्थान है जहां जगदंबा ने असुरों का विनाश किया। यह वही स्थल है जहां मां ने अपने भक्त भाईदास को स्वप्र में सेवा करने का भेजा था। उन्होंने इस शक्ति पीठ की सेवा में पूरा जीवन लगा दिया। स्वर्ण कलशों से सजा चिंतपूर्णी मंदिर उत्तर भारत का दूसरा सबसे लोकप्रिय शक्ति मां का मंदिर है। पहला स्थान माता वैष्णों देवी को दिया जाता है, जो जम्मू-कश्मीर में पड़ता है।

त्रिर्गत के तीन शक्तिपीठों में ज्वालाजी, वज्रेश्वरी और चिंतपूर्णी उल्लेखनीय शक्तिपीठ

इसका गुम्बद कमलदल, कलश और सोने के छत्र से सुसज्जित है। इस मंदिर के कपाट स्वर्ण धातु की परत के साथ ओढ़े गए हैं जिसमें बेल-बूटों, देवी-देवताओं आदि के कलात्माक चित्रों को अत्यंत जीवन्तता के साथ दर्शाया गया है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवती चिंतपूर्णी प्रस्तर पिंडी के रूप में स्थापित है। यहां आद्या शक्ति के इसी विग्रह की पूजा का प्रचलन है। यह मंदिर डाडासिबा और अंब के जागीरदारों की भी वन्दीय स्थली रही है। यह शक्तिपीठ त्रिर्गत जनपद के त्रिकोणीय शक्तिपीठों में एक रहा है। त्रिर्गत के तीन शक्तिपीठों में ज्वालाजी, वज्रेश्वरी और चिंतपूर्णी उल्लेखनीय शक्तिपीठ रहे हैं। जालन्धर पुराण में इन तीनों शक्तियों के स्तुतिगान सहित छिन्नमस्तिका का स्तुति स्त्रोत भी दिया गया है।

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