धौलासिद्ध परियोजना की लागत 687.97 करोड़ से बढ़कर 1,561.21 करोड़, अब 800 करोड़ में वापस लेने की घोषणा का आधार बताए मुख्यमंत्री – राकेश जमवाल

शिमला: भाजपा प्रदेश मुख्य प्रवक्ता एवं विधायक राकेश जमवाल ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा धौलासिद्ध जलविद्युत परियोजना को एसजेवीएनएल से वापस लेने और इसके लिए 800 करोड़ रुपये देने की घोषणा पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार की ऊर्जा नीति में स्पष्टता का अभाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश की बहुमूल्य जलविद्युत संपदा से जुड़े निर्णयों को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली दिशाहीन दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री को राजनीतिक बयानबाजी के बजाय परियोजना की वास्तविक वित्तीय स्थिति, हस्तांतरण की शर्तों और प्रदेश पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।

राकेश जमवाल ने कहा कि धौलासिद्ध परियोजना ब्यास नदी पर हमीरपुर और कांगड़ा जिलों में स्थित 66 मेगावाट क्षमता की जलविद्युत परियोजना है, जिसमें 33-33 मेगावाट की दो उत्पादन इकाइयां प्रस्तावित हैं। परियोजना से प्रतिवर्ष लगभग 304 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर 2020 को परियोजना के लिए 687.97 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत पर निवेश स्वीकृति प्रदान की थी।

उन्होंने कहा कि केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की अक्टूबर 2025 की निगरानी रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की संशोधित लागत बढ़कर 1,561.21 करोड़ रुपये हो गई थी। अक्टूबर 2025 तक परियोजना पर 986.12 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे और भौतिक प्रगति लगभग 70 प्रतिशत दर्ज की गई थी। परियोजना की मूल पूर्णता समयसीमा नवंबर 2025 थी, जिसे संशोधित कर मार्च 2027 किया गया।

जमवाल ने कहा कि इन आंकड़ों के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री की 800 करोड़ रुपये में परियोजना वापस लेने की घोषणा कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उन्होंने पूछा कि जब अक्टूबर 2025 तक परियोजना पर 986 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके थे, तो 800 करोड़ रुपये की प्रस्तावित हस्तांतरण राशि किस आधार पर निर्धारित की गई है? क्या यह राशि केवल एसजेवीएनएल के निवेश की प्रतिपूर्ति है अथवा इसमें ऋण, ब्याज और अन्य वित्तीय देनदारियां भी शामिल हैं? उन्होंने स्पष्ट किया कि परियोजना की कुल लागत और हस्तांतरण मूल्य अलग-अलग वित्तीय अवधारणाएं हैं, इसलिए सरकार को वास्तविक मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मुख्यमंत्री ने एसजेवीएनएल और केंद्र सरकार के साथ परियोजना हस्तांतरण की शर्तों पर अंतिम सहमति प्राप्त कर ली है? यदि हां, तो संबंधित समझौता सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? परियोजना वापस लेने के बाद निर्माण पूरा करने के लिए कितनी अतिरिक्त धनराशि की आवश्यकता होगी और इसकी व्यवस्था कहां से की जाएगी? क्या सरकार ने भविष्य में बिजली उत्पादन से प्राप्त होने वाले राजस्व तथा परियोजना के संचालन और रखरखाव की लागत का आकलन किया है?

राकेश जमवाल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जलविद्युत संपदा राज्य की महत्वपूर्ण आर्थिक धरोहर है। इसके स्वामित्व और संचालन से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता आवश्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार बड़ी घोषणाएं कर रही है, लेकिन उनके पीछे की विस्तृत वित्तीय और प्रशासनिक कार्ययोजना जनता के सामने नहीं रख रही। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना वापस लेने से हिमाचल को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना होगा और राज्य को किन वित्तीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करना पड़ेगा।

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना का उल्लेख करते हुए जमवाल ने कहा कि छह राज्यों के बीच हुए समझौते के अंतर्गत परियोजना की लगभग 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की व्यवस्था है, जबकि शेष 10 प्रतिशत लागत सहभागी राज्यों के हिस्से में आएगी। उन्होंने कहा कि परियोजना की वित्तीय व्यवस्था, बिजली के बंटवारे और हिमाचल प्रदेश की जिम्मेदारियों का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

राकेश जमवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री को धौलासिद्ध परियोजना की प्रस्तावित वापसी से संबंधित सभी दस्तावेज, मूल्यांकन रिपोर्ट, एसजेवीएनएल के साथ पत्राचार, वित्तीय दायित्व और निर्माण की संशोधित समयसीमा सार्वजनिक करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिमाचल की जलविद्युत संपदा से जुड़े निर्णयों में प्रदेश के दीर्घकालिक आर्थिक हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और सरकार को प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न का तथ्यों के आधार पर जवाब देना चाहिए।

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