हिमाचल की बोलियां : चार कोस पर बदले पाणी, आठ कोस पर बदले वाणी

हिमाचल की भाषा-बोलियां : चार कोस पर बदले पाणी, आठ कोस पर बदले वाणी

पहाड़ी भाषा हिन्दी, डोगरी और पंजाबी भाषाओं से घिरी हुई

हिमाचल प्रदेश की भाषा-बोलियां

पहाड़ी बोलियों के संदर्भ में शौरसेनी का महत्व

हिमाचल की बोलियां : चार कोस पर बदले पाणी, आठ कोस पर बदले वाणी

हिमाचल की बोलियां : चार कोस पर बदले पाणी, आठ कोस पर बदले वाणी

हिमाचल में कई प्रकार की बोलियाँ बोली जाती हैं। इन बोलियों की अपनी खास विशेषता है। तीन-तीन मील के अन्तर पर भी कई शब्दों के उच्चारण में भेद हो जाता है। भाषा और संस्कृति की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश अपनी विलक्षण और सम्पन्नता में अद्वितीय है। इस बार हम आपको हिमाचल की बोलियों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। ऋगवेद की संस्कृत से सर्वमान्य संस्कृत विकसित हुई। पाणिनी ने प्राचीन संस्कृत को क्रमबद्ध कर विश्व की अनेक भाषाओं की जननी बना दिया। इस प्रकार संस्कृत ने विश्व की दिगविजयी देवभाषा के रूप में प्रारम्भ किया। कालगति के साथ इसमें परिवर्तन आ गए और इसका विकास प्राकृत, अर्धमागधी प्राकृत, पैशाची, अपभ्रंश के रूप में कालान्तर में हुआ। जैन, बौद्ध साहित्य इन्हीं भाषाओं में लिखा गया है। प्राकृत से अपभ्रंश का विकास हुआ, इससे शौर-सेनी, मागधी, अर्धमागधी, पैशाची, महाराष्ट्री, अवधी, गुज्जर, पांचाली आदि भाषाएं विकसित हुई। पहाड़ी बोलियों के संदर्भ में शौरसेनी का महत्व है। अपभ्रंश का विकास 500 ई. से 1200 ई. के बीच हुआ। हिमाचल की बोलियों का खस से भी निकट का सम्बन्ध है। इसी प्रकार पश्चिमी पहाड़ी बोलियों पर पश्चिमी हिन्दी और पश्चिमी राजस्थानी का प्रभाव और सामीप्य है।

नेपाल से भद्रवाह तक के पहाड़ी क्षेत्र में बोली जाने वाली बोलियां पहाड़ी परिवार से हैं। गढ़वाल से शिमला तक के पहाड़ी क्षेत्र को सप्तलक्ष अर्थात सवा लाख पहाडिय़ों का क्षेत्र और आजकल शिवालिक कहते हैं। महाभारत, स्मृति और हरिवंश पुराण में इनका वर्णन पश्चिमोत्तर प्रदेश के वासी और पिशाच कहा गया है। यहां बोली जाने वाली लोक-भाषाओं का क्षेत्र और उसकी परिधि बहुत संकुचित है। विशेष भौगोलिक दृष्टि के कारण इसे प्रदेश की बोलियों के आधार पर दो भागों में बांट सकते हैं। पहला भाग भारोपिय परिवार की बोलियों पर हैं। दूसरा भाग वह है जो तिब्बत की सीमा से मिला है और उसमें तिब्बती वर्मन परिवार की बोलियां हैं। भारोपियन बोलियों की मूल संरचना हिन्दी की मूल संरचना से लगभग मिलती जुलती है।

चार कोस पर बदले पाणी, आठ कोस पर बदले वाणी, कांगड़ी, चम्बयाली, मण्डियाली, सुकेती, बिलासपुरी, सोलन, नालागढ़, हमीरपुर और ऊना, सिरमौर की दून घाटी की बोलियां डोगरी बोली के समीप हैं, भारोपियन परिवार से हैं। इन्हें हिमाचली पहाड़ी भी कहा जा सकता है। चम्बा की चम्बयाली की भी भिन्न-भिन्न बोलियां हैं- चम्बा नगर व तहसील में चम्बयाली, भरमौरी, चुराही, पंगवाली लाहौली बोली जाती है, इनमें भेद रहता है। चुराही में कश्मीरी का सामीप्य है, भरमौरी में संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्द अधिक हैं। लाहौली में तिब्बती का प्रभाव है। भटियात की बोली कांगड़ी से मिलती है। सिरमौर की उपबोली बेशाऊ, पारठी, खौल्टू हैं। ये बोलियों सिरमौर मण्डल, जौनसार (बाबर) शिमला जिला की जुब्बल तथा चौपाल तहसील, मोरनी में बोली जाती हैं। सिरमौर के पूर्व में पश्चिमी हिन्दी, दक्षिण में खड़ी बोली तथा हरियानवी, पश्चिम में बघाटी, उत्तर में क्योंथली और बुशहरी (कुल्लवी) भाषा बोली जाती है। पहाड़ी भाषा का आधार खस भाषा भी है। लाहौल, स्पिति क्षेत्र की बोलियों पर तिब्बती प्रभाव है।

लगभग 30 स्पष्ट बोलियां इन पहाड़ों में खोजी गई है या यूं भी कहा जा सकता है कि जितनी पहाड़ी रियासतें थीं उतनी ही बोलियां हैं। इस प्रकार लोगों द्वारा प्रयुक्त बोलियों को जौनसारी, सिरमौरी, बघाटी, क्योंथली, सतलुज-वर्ग, (कोची/ सराजी) कुल्लवी, मंडयाली, चम्बयाली और भद्रवाही नाम दिए गए हैं। यह वर्गीकरण प्रसिद्ध भाषाविद् जी.ए. ग्रियर्सन द्वारा अपनी प्रसिद्ध पुस्तक भारत का भाषिक सर्वेक्षण में दिया गया था। परन्तु कहलूरी अथवा बिलासपुरी और कांगड़ी को उसने पंजाबी से सम्बद्ध कर दिया था। बाद के शोध कार्य और डॉ. सिद्धेश्वर वर्मा और आर.सी. निगम जैसे भाषा शास्त्रियों ने स्पष्ट रूप से कांगड़ी को पहाड़ी भाषा माना है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि कांगड़ा की भाषा चम्बा, मण्डी, सुकेत और जम्मू की भाषा के अधिक निकट है। इसके अतिरिक्त स्थानीय तौर पर इसे पहाड़ी कहा जाता है और टांकरी में लिखा जाता है न कि पंजाबी की गुरमुखी लिपि में।

डॉ. ग्रियर्सन के वर्गीकरण का आधार छोटी-छोटी पहाड़ी रियासतों की उपस्थिति था परन्तु बाद के शोध कार्यों से स्पष्ट हुआ कि विभिन्न बोलियों की शब्दावली, उच्चारण तथा व्याकरणिक व्यवस्था में पर्याप्त समानता है। इसका स्पष्टीकरण निम्र प्रकार से दिया जा सकता है-

सिरमौरी

सिरमौरी जिला सिरमौर में बोली जाती है

सिरमौरी जिला सिरमौर में बोली जाती है

सिरमौरी जिला सिरमौर में बोली जाती है। सिरमौर की प्रमुख नदी गिरि अथवा गिरि गंगा है जो कि इस जिले के धुर उत्तर में प्रवेश करती है और जिले को लगभग दो बराबर भागों में बांटती है-गिरी-वार अथवा गिरी से इधर का क्षेत्र तथा गिरी-पार अथवा गिरि के दूसरी ओर का क्षेत्र जो इसके उत्तर-पूर्व में पड़ता है। इन दो भागों के लोग अपनी विशेषताओं में पर्याप्त भिन्न हैं। इन दो भागों में से गिरी के इस ओर का क्षेत्र तीन पर्वत श्रृंखलाओं में बंटा है जिनमें से एक धरथी कहलाता है। इसी क्षेत्र के नाम पर सिरमौरी की एक उप बोली का नाम धारथी है। यह क्षेत्र मैदानों के निकट है इसलिए इस पर हिन्दी का भी कुछ प्रभाव पड़ा है। जबकि गिरि से दूसरी ओर का क्षेत्र जिसमें पछाद, रेणुका का सेंज क्षेत्र जो कि तौंस नदी तक फैला है तथा क्यारदा दून का एक छोटा सा हिस्सा शामिल है- यहां पर बोली जाने वाली बोली को गिरी-पारी कहते हैं। यह पूर्णतया पहाड़ी बोली है। कुछ विद्वानों का मत है कि गिरि-पारी में कुछ संस्कृत शब्द भी बचे हैं।

उत्तर में चूड़धार की पर्वत श्रृंखला सिरमौर जिले को शिमला के चौपाल जिले से अलगाती है। पुराने समय में इस क्षेत्र को विश-शॉ कहा जाता था। यहां पर बोली जाने वाली भाषा गिरी-पारी से अत्यधिक मिलती है और जी.ए. ग्रियर्सन द्वारा इसे विशवाई नाम दिया गया था। दूसरे शब्दों में गिरी-पारी का उपयुक्त नाम विशवाई है।

बघाटी सिरमौरी के पड़ौस में, पश्चिम में है। यह सोलन क्षेत्र में बोली जाती है जिसमें पहले बघाट, बाघल और कुछ अन्य राज्य आते थे। पश्चिमी भाग में अर्थात कुनिहार और अर्की में इसे बघलानी कहा जाता है संभवत: बाघल में बोली जाने के कारण। इसके पश्चिम में नालागढ़ है और यहां के लोगों की भाषा को पुराने हिन्डूर राज्य के नाम पर हिन्डूरी कहा जाता है। जी.ए. ग्रियर्सन ने इसे क्योंथली से सम्बद्ध माना है जो कि उचित नहीं क्योंकि क्योंथली ऊपरी शिमला में बोली जाती है जबकि नालागढ़ उत्तर में, कहलूरी (बिलासपुरी) बोली स,े पूर्व में बघाटी से तथा दक्षिण में मैदानों से घिरा है।

क्योंथली

शिमला के आस-पास और जिले के उत्तरी भागों में बोली जाती है। इसका नामकरण क्योंथल राज्य के नाम पर पड़ा था जिसका कि शिमला के पहाड़ी राज्यों में केन्द्रीय स्थान था। शिमला के पहाड़ों में रामपुर बुशैहर एक अन्य महत्वपूर्ण राज्य था और देलाथ और खनैटी, जुब्बल, सारी (रोहडू क्षेत्र) बलसन, कुमारसैन और भज्जी इसकी अधीनस्थ रियासतें थीं।

रामपुर बुशैहर, कुमारसैन और कोटगढ़ तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों में तथा सतलुज घाटी में बोली जाने वाली भाषा को कोची कहा जाता है। इस क्षेत्र के उत्तर में यह सराहन तक फैली है।

बरारी

यहां पर लोग किरनी बोलते हैं

यहां पर लोग किरनी बोलते हैं

जिसका नाम जुब्बल राज्य के एक परगना बरार के नाम पर पड़ा है। आस-पास के कोठरवाई और रोहडू तहसीलों में बोली जाती है। यह तौंस नदी तक फैली है जिसके आगे जौनसारी बोली प्रारम्भ हो जाती है। जुब्बल के सुदूर दक्षिण में और जौनसार बावर के पश्चिम में एक क्षेत्र है जिसे किरन कहते हैं। यह प्राचीन थरोच राज्य का भाग था। यहां पर लोग किरनी बोलते हैं। जिस पर जौनसारी का प्रभाव है। 1948 में शिमला के पहाड़ी राज्यों के एकीकरण से ये उपबोलियां सामूहिक रूप से महासुई पुकारी जाने लगी हैं।

कुल्लवी

कुल्लू की प्रमुख बोली को कुल्लुई कहा जाता है

कुल्लू की प्रमुख बोली को कुल्लुई कहा जाता है

कुल्लू की प्रमुख बोली को कुल्लुई कहा जाता है। इसमें तीन उपबोलियां हैं जिन्हें सिराजी (आन्तरिक और बाह्य सिराजी) सैंजी और मुख्य कुल्लवी कहा जाता है। अन्तिम बोली अधिकतर ऊपरी ब्यास घाटी के लोगों द्वारा बोली जाती है।

मंडियाली

मण्डी और सुकेत, शिमला और कांगड़ा के बीच स्थित दो प्रसिद्ध राज्य थे और कुल्लू इनका पूर्वी पड़ोसी था। 1948 में ये क्षेत्र एक प्रशासकीय इकाई के रूप में गठित हुए और इसे मण्डी जिला कहा गया। मु़ख्य मंडियाली बोली उस क्षेत्र में दूर-दूर तक बोली जाती है।

मु़ख्य मंडियाली बोली उस क्षेत्र में दूर-दूर तक बोली जाती है

मु़ख्य मंडियाली बोली उस क्षेत्र में दूर-दूर तक बोली जाती है

जिले के पश्चिमी और उत्तरी भागों में इस बोली में बहुत कम अन्तर है। यह मण्डी शहर में भी बोली जाती है और बिना अधिक अन्तर के इसका क्षेत्र दक्षिण में सुन्दरनगर और करसोग तक है। सुन्दरनगर और सुकेत में बोली जाने वाली बोली को मंडियाली की जगह सुकेती कहा जाता है।

कहलूरी

जी.ए. ग्रियर्सन ने अपने भारत का भाषिक सर्वेक्षण में बिलासपुर की बोली को कहलूरी कहा है। उसके अनुसार कहलूरी या बिलासपुरी अविकसित पंजाबी का वह रूप है जो होशियारपुर आदि में बोला जाता है। टी. ग्राह्म बेली ने जो कि ग्रियर्सन का समकालीन था, शिमला जिला की बोलियों का गहन सर्वेक्षण किया था। उसने बिलासपुरी को निम्र रूप में व्याख्यायित किया है-

कुल मिलाकर बिलासपुर अथवा कहलूर में जैसा कि कभी-कभी उसे नाम दिया जाता है, छह बोलियां हैं। राज्य के केन्द्र में

राजधानी के चारों ओर छह-सात मील तक बिलासपुरी या कहलूरी बोली जाती है

राजधानी के चारों ओर छह-सात मील तक बिलासपुरी या कहलूरी बोली जाती है

राजधानी के चारों ओर छह-सात मील तक बिलासपुरी या कहलूरी बोली जाती है। इसके तुरन्त साथ पश्चिम की ओर इस राज्य का जो क्षेत्र कांगड़ा की ओर बढ़ा है वहां पश्चिमी बिलासपुरी बोली जाती है।

मानक बोली के उत्तर की ओर दो उपबोलियां मिलती हैं, एक पश्चिम की ओर कांगड़ा की सीमा के निकट जिसे हम उत्तरी बिलासपुरी का नाम दे सकते हैं जबकि पूर्व की ओर मण्डी की सीमा के निकट मंडियाली जैसी भाषा जिसे हिमालय की भाषाओं में माना जाता है। मानक भाषा के निकट दक्षिण में लोग कुछ भिन्न भाषा बोलते हैं जिसे दक्षिणी बिलासपुरी कहा है। इसका क्षेत्र नालागढ़ की सीमा के साथ की छोटी सी पट्टी है। इसके पूर्व में दक्षिण-पूर्वी बिलासपुर में एक बोली प्रचलित है जिसे स्थानीय रूप से दामी कहा जाता है। यह अपनी सीमाओं से बाहरी अर्की तक फैली है जिसके आगे क्योंथली बोली जाती है जो कि मध्य शिमला राज्यों में सर्वत्र बोली जाती है।

बिलासपुर की बोलियां एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती हैं कि इन्हें सामूहिक रूप से बिलासपुरी या कहलूरी कह सकते हैं। बिलासपुरी नाम ही अधिक उचित माना है क्योंकि यह राज्य बाहरी दुनिया में अधिकतर बिलासपुर के ही नाम से जाना जाता है, केहलूर नाम तो इस राज्य में बसने वालों के सिवा शायद ही किसी को पता हो।

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