हिमाचल: बागवानी विभाग ने लीची खाने से चमकी बुखार की अटकलों को नकारा

आइये जाने कैसे करें “लीची की बागवानी”

  • बरसात के प्रारंभ से तैयार करें लीची की बागवानी
लीची के पकते समय छिलके पर एक लुभावना लाल रंग छा जाता है

लीची के पकते समय छिलके पर एक लुभावना लाल रंग छा जाता है

उपोष्ण फलों में लीची का विशेष महत्व है। यह देर से तैयार होने वाला फल है। लीची देखने में बडी आकर्षक व सुन्दर होती है तथा इसका पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है। लीची के बाग को स्थापित करने में काफी समय लगता है तथा इसका फल काफी स्वादिष्ट होता है, परन्तु इसकी बागवानी देश के कुछ ही भागों तक सीमित है तथा निर्यात के मामले में लीची का बड़ा योगदान है।

  • लीची की उत्पत्ति:

लीची दक्षिणी चीन का देशज माना जाता है। जहाॅं सदियों से उगाई जा रही है। पूर्वी भारत में इसका आगमन 17 वीं शताब्दी के अन्त में हुआ है और वहाॅं से यह धीरे-धीरे देश के अन्य भागों में फैल गई। बिहार राज्य के उत्तरी भाग में विशेष रूप से मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिले के आसपास इसकी बागवानी सफल सिद्ध हुई है। उत्तरी भारत के हिमालय की तलहटी वाले स्थानों में भी इसकी पैदावार सफलापूर्वक की जाती है। इसका विस्तार उत्तरप्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और देहरादून जिले तथा पंजाब का गुरदासपुर, पटियाला, बहादुरगढ़ तथा होशियारपुर आदि में है। बंगाल तथा मेघालय के कुछ इलाकों में भी इसकी बागवानी होती है। उत्तरी भारत के तराई वाले इलाकों में भी इसकी खेती की जाती है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के हिस्सों में भी इसकी बागवानी प्रारम्भ हो चुकी है।

  • पोषक तत्व:

लीची के पकते समय छिलके पर एक लुभावना लाल रंग छा जाता है और फल का गुदा मुलायम पड़ जाता है। जिसमें एक भीनी-भीनी सुवास और मन पसन्द चीनी और अम्ल के अनुपात का विकास होता है। लीची में प्रमुख पोषण तत्व चीनी है। इसकी मात्रा किस्म, मिट्टी तथा स्थानीय जलवायु पर निर्भर करती है। औसत मात्रा लगभग 11 प्रतिशत होती है। इसके अतिरिक्त इसका फल फाॅस्फोरस, चूना, लोहा, रिबोफ्लेविन तथा विटामिन-सी का एक अच्छा स्त्रोत है।

  • मिट्टी तथा जलवायु:

लीची के लिए गहरी दोमट मिट्टी उत्तम रहती है। बलुई या चिकनी मिट्टी में यह काफी पैदावार देती है। किन्तु जल-निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए तथा भूमि कड़ी परत या चट्टान वाली नहीं होना चाहिए, क्योंकि अम्लीय मिट्टी में लीची का पौधा काफी तेज गति से बढ़ता है तथा मिट्टी में चूने की कमी नहीं होनी चाहिए। फ्लोरिडा में लीची के लिए 5.0 से 5.5 पी.एच. मान उत्तम माना जाता है। लीची एक उपोष्ण देशज फल है। इसके लिए मई-जून में मध्यम जलवायु की आवश्यकता होती है। इस समय अधिक गर्मी तथा वातावरण बहुत शुष्क होने पर इसका लीची पर काफी असर पड़ता है, परन्तु उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में मई-जून में आर्द्रता 30 प्रतिशत या इससे कम रहती है। यहाँ लीची की पैदावार अच्छी होती है। लीची की सफल बागवानी के लिए दिसम्बर-जनवरी तक औसत न्यूनतम तापमान लगभग 7 डिग्री सेल्सियस तथा गर्मी में अधिकतम तापमान 36 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होना चाहिए। लीची के छोटे पौधे पाले से अधिक प्रभावित होते हैं तथा पाले से इनकी सुरक्षा करना आवश्यक है।

  • प्रवर्धन और पौध-रोपण:

लीची का व्यावसायिक प्रवर्धन गुटी द्वारा होता है जो बरसात के प्रारंभ से तैयार की जाती है। उचित मोटाई की शाखा लेकर, इसके नीचे वाले भाग से लगभग 2.5 से.मी लम्बाई में छिलका हटाकर वलय के ऊपरी भाग को रूटोन या सिराडेक्स के नाम से उपचारित किया जाय। इसके बाद इसे नम माॅस घास से ढॅंककर ऊपर से एल्काथीन का टुकड़ा लपेटकर कसकर बाॅंध देना चाहिए तथा ऐसा करने से श्वसन की प्रकिया चलती रहती है और वाष्पीकरण रूक जाता है।

इसके बाद लगभग 2 माह के अन्दर जड़ें पूर्ण रूप से निकाल देना चाहिए तथा इसके बाद इसकी शाखा मातृवृक्ष काटकर आंशिक साये में

लीची का व्यावसायिक प्रवर्धन गुटी द्वारा होता है जो बरसात के प्रारंभ से तैयार की जाती है।

लीची का व्यावसायिक प्रवर्धन गुटी द्वारा होता है जो बरसात के प्रारंभ से तैयार की जाती है।

गमले में लगाकर रख दिया जाना चाहिए। जिसके फलस्वरूप इसकी जडें कुछ मोटी होती रहेगी, जो जल्दी आसानी से टूट जायेगी। इसके परिणामस्वरूप पौधो के मरने का भय अधिक रहता है तथा लीची की कुछ पत्तियों को तोड़ देना चाहिए, जिससे मरने की संभावना काफी कम रहती है तथा पानी शोषण और वाष्पीकरण में एक सामंजस्य स्थापित हो जाता है। एक साल के बाद इसके पौधे खेत में लगाने योग्य हो जाते है। यदि माॅस घास और वरमीकुलाइट के मिश्रण का प्रयोग गुटी बांधने हेतु किया जाए तो निकलने वाली जड़े पतली हो जाती है और टूटती कम है। तथा इसके फलस्वरूप नर्सरी में लगाने के बाद पौधों के मरने की कम संभावना रहती है।

  • पौध-रोपण:

लीची का जुलाई से लेकर अक्टूबर तक कभी भी रोपण किया जा सकता है। रोपण के पहले बाग के चारों तरफ वायुरोधक वृक्ष लगाना अच्छा रहता है तथा पश्चिम दिशा में काफी आवश्यकता होती है, क्योंकि गर्मी में लीची के पेड़ गर्म हवा से रक्षा करते हैं। गड्ढ़ो की खुदाई तथा भराई आम के पौधों की तरह करनी चाहिए। भराई के लिए गड्ढे की ऊपरी भाग में मिट्टी के साथ 20-25 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 2 कि.ग्रा हड्डी का चूरा तथा 300 ग्राम म्यूरेट आफ पौटाश मिलाकर डालना चाहिए।

लीची के पौधे को सामान्य रूप से भूमि में 10 मी. की दूरी पर लगाया जाना चाहिए तथा शुष्क जलवायु तथा कम उपजाऊ भूमि में यह दूरी 8 मी. होना चाहिए। रोपण के लिए स्वस्थ पौधों का चयन किया जाना चाहिए ।

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