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नूरपुर हादसा : घरों में सिर्फ उदासी, मायूसी और दिल को चीरकर रख देने वाली खामोशी

नूरपुर हादसा : घरों में सिर्फ उदासी, मायूसी और दिल को चीरकर रख देने वाली खामोशी

  • नूरपुर हादसा : स्पेशल स्टोरी
  • नूरपुर हादसे में घायल एक और मासूम ने तोड़ा दम
  • नूरपुर हादसे में घायल एक और मासूम ने दम तोड़ दिया है। घायल नितिश पठानिया (9) ने पठानकोट के निजी अस्तपताल में अंतिम सांस ली। नीतिश ठेहड़ पंचायत का निवासी था। हादसे में मरने वाले छात्रों की संख्या अब 24 पहुंच गई है।

…मानो कहीं से उनका नन्हा मासूम अभी आ जाएगा

नूरपुर हादसा : घरों में सिर्फ उदासी, मायूसी और दिल को चीरकर रख देने वाली खामोशी

नूरपुर हादसा : घरों में सिर्फ उदासी, मायूसी और दिल को चीरकर रख देने वाली खामोशी

नूरपुर हादसा : जिन घरों में बच्चों की हंसी से व मासूम शरारतों से पूरा घर भरा-भरा लगता था आज उन घरों में सिर्फ उदासी, मायूसी और दिल को चीर कर रख देने वाली खामोशी है। गांव में कौन किसको धीरज बंधाये? किसी न किसी के कलेजे का टुकड़ा गांव के उस घर को ऐसा जख्म दे गया है जिसका इलाज न दवा से है न दुआ से। रो-रोके आंसू भी सूख गए हैं। न भूख है न प्यास और न नींद। घर का आंगन सूना। मानो अभी आकर मासूम मां को आवाज देगा….मम्मी भूख लगी है। पापा….मेरे लिए क्या लाए…..। घर की खामोशी काटने को पड़ती है रात को नींद आने का नाम नहीं लेती। मानो कहीं से उनका नन्हा मासूम अभी आ जाएगा और उनके सीने से लगकर मुस्कुराएगा। सब ठीक हो जाएगा, लेकिन पलभर में भ्रम जब टूटता है तो सदा के लिए बिछुड़े मासूमों के घरों से माता-पिता, दादा-दादी की तड़प और पूरे घर को झंझोड़ने वाली चीखें दूर-दूर से धीरज बंधाने वाले लोगों को भी आसुओं के सैलाब में बहाकर रख देती है।

पिता और दादा कभी-कभी बिल्कुल खामोश तो कभी उनकी नजरें इधर-उधर कुछ खोजती नजर आती हैं। मानों मिलने आए लोगों के बीच वो अपने जिगर के टुकड़े के भी आने के इन्तजार में हो। जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन पल भर में आंखों के आगे अपने मासूमों को अपने हाथों से सदा के लिए विदा कर वो लौटकर घर आना दिल को झंझोड़ कर रख देता है। आंख से आंसू थमने का नाम नहीं लेते। घर खंडहर, आंगन सूना सब कुछ खत्म हुआ सा लगता है। सासें तो हैं पर शरीर बेजान है। बातें हो रही है लेकिन क्या कुछ पता नहीं। घाव गहरा है और कभी न भरने वाला भी।

जहां पूरा प्रदेश इस हादसे से सहम गया हो वहाँ उन परिवार वालों पर क्या बीत रही है सोचकर ही कंपन हो जाती है। प्रदेश में इस प्रकार की मेरे विचार से पहली घटना है। इस हादसे का किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? बस चालक जो सालों के अनुभव के साथ बस चलाता आ रहा था या सरकार व प्रशासन को कि सड़कों की खस्ताहालत कब दुरुस्त होगी? जबकि कहा ये जा रहा है कि जहां यह हादसा हुआ वहां खुली और चौड़ी सड़क थी, तो हादसे की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। या फिर ग्रह दशा, जिसकी  काल का ग्रास मासूम बच्चे बन गए। वो भी वो नन्हें जो अभी जीवन के पहले पड़ाव में भी पूरी तरह से कदम भी नहीं रख पाए थे और पहली बार ही स्कूल गये थे। भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? फिर उन मासूमों को उसे दुनिया में भेजने की जरूरत ही क्या थी अगर उन नन्हें फरिश्तों की जरूरत उसे यहां से ज्यादा वहां थी।

राज्य सरकार व प्रशासन को भी नूरपुर हादसे ने पूरी तरह हिलाकर रख दिया। राज्य सरकार व प्रशासन पूरी तरह हादसे की जानकारी मिलते ही मुस्तैदी से बच्चों को बचाने की तैयारी में जुट गया। घटनास्थल पर जहां स्थानीय लोग व पुलिस बच्चों व घायलों के बचाव कार्य में जुट गए। वहीं प्रशासन दवारा बच्चों को अस्पताल जल्द से जल्द पहुंचाने और सड़कों को एक पल में खाली करवाने ताकि घायल बच्चों को ट्रैफिक में न फंसना पड़े, सारे इंतजाम पुख्ता रूप से किये गए। अस्पताल के बाहर हजारों लोग इकट्ठे हो गए ताकि किसी को भी मदद की जरूरत हो तो तुरन्त सहायता की जा सके। खून की कमी न हो। लेकिन बदनसीबी ये रही कि इतना सब होने के बावजूद भी 24 नन्हें मासूमों को मौत ने हजारों लोगों की दुआओं और जी-तोड़ बचाने की कोशिश के बावजूद भी नहीं बख्शा।

नूरपुर हादसे में घायल एक और मासूम ने दम तोड़ दिया है। घायल नितिश पठानिया (9) ने पठानकोट के निजी अस्तपताल में अंतिम सांस ली। नीतिश ठेहड़ पंचायत का निवासी था। हादसे में मरने वाले छात्रों की संख्या अब 24 पहुंच गई है।

 

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