वो भी तो एक वक्त था…जब साँझ होते ही बच्चों के शोर से गूंज उठती थी घर-आंगन की गलियां…

समय-समय के साथ हमारे जीवन शैली में भी आज बहुत परिवर्तन हो गया है। चाहे बात हमारे रहन-सहन की हो या खान-पान की या खेलकूद की वर्तमान में बहुत कुछ बदल गया है। बचपन की यादें हमेशा दिल के किसी ना किसी कोने में दबी रहतीं हैंउम्र के हम किसी भी पड़ाव में पहुंच जाएँ लेकिन बचपन के दोस्त, बचपन का खेल-कूद हमेशा याद आ ही जाता है

“खेलकूद”आज मनोरंजन, यानि खेलकूद के मायने काफी बदल गए हैं। टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप में ही बच्चे व्यस्त होने लगे हैं, लेकिन एक समय वह भी था जब बच्चे स्कूल से आकर पढ़ाई करने के बाद शाम को इकट्ठे होकर घर के आंगन, खेत-खलिहान गली।, जहां जगह मिलती इकट्ठे होते और धमाचौकड़ी  मचा देते। बच्चों के खेलकूद के शोर से आंगन और गलियाँ गूंज उठती थी। अब तो  बड़े बड़े शहरों में आंगन तो है नहीं, गलियों में सनाटा पसरा रहता है।

 पुराने समय में पहाड़ों के शांत जीवन में एकरसता को तोड़ने के लिए नाच-गाने, उत्सव-मेले, खेल-तमाशे तथा मनोरंजन के अनेक अन्य साधन होते थे। लेकिन आज भागदौड़ की जिंदगी और आधुनिक मनोरंजन से हमारे बच्चों का भविष्य अछूता नहीं है

  सदियों तक मनोरंजन के कई ऐसे छोटे-छोटे साधन थे जिनमें सस्ता और स्वस्थ मनोरंजन मिलता था। गांव में लोक मनोरंजन के प्रमुख साधन रहे हैं  सांझ ढलते ही आंगन व चौगानों में कबड्डी, गिट्टी-छिपाना, किकली, छुपन-छुपाई, गिल्ली-डंडा, बैट-बोल; लकड़ी से हॉकी बनाकर खेलना; फुटबाल; वालीबॉल; कपड़े की गेंद बनाना कर पिठू खेलना; रस्सी कूदना और  बेडमिंटन आदि कई प्रकार के खेल खेलते थे। 

अब तो  सभी खेल धीरे- धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। बच्चों से पढ़ाई को लेकर माता-पिता की अपेक्षाएं बढ़ने लगीं हैं। बच्चों में पढ़ाई को लेकर चिंता ज्यादा नजर आने लगी है, कॉम्पीटिशन देखा जाए तो हर क्षेत्र में शत-प्रतिशत तक पहुंच गया है। शहरों में मकान इतने बन गए हैं कि खेलने के लिए आंगन तो छोड़ो अब चलने के लिए गलियां भी नहीं मिल रहीं। जहाँ है भी आंगन और पार्क वहां से बच्चों की रौनक ही गायब है।

बच्चों को खेलने का आंगन तो फिर कहाँ मिलेगा… अब तो स्कूल जाने वाले बच्चे पढ़ाई और फिर उसके बाद मोबाईल, टीवी, लैपटॉप, कंप्यूटर और  गेम्स में ही उलझ कर रह जाते हैं। जरूरत तो आज के बदलते वक्त में आधुनिक साधनों से भी जुड़े रहने की है मगर समय की सीमा तय करना भी जरूरी है। आज काफी हद तक माता-पिता सतर्क हैं लेकिन कुछ अपने ही समय के अभाव के चलते इन बातों को सब जानते हए भी अनदेखा कर रहे हैं जो सही नहीं हैं, ना हमारे लिए ना हमारे बच्चों के लिए।

हमें बच्चों को कुछ हद तक मोबाइल गेम्स, टीवी या फिर आधुनिक साधनों से दूर रखना होगा ताकि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास हो सके। हमें बच्चों के लिए समय देना होगा; “आंगन” नहीं तो आस-पास पार्क या कोई छोटा सा मैदान जहाँ बच्चों को थोड़े समय के लिए खेलकूद जैसी गतिविधियों की तरफ उन्हें हम ला सकेबच्चों का खेल का समय निर्धारित किया जाना चाहिए जिससे उनके शारीरिक व्यवहार या फिर शारीरिक गतिविधियों में रुचि बढ़े।

अभिभावकों को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास हो सके। भले ही जीवन में सभी के व्यस्तता बढ़ गई हैलेकिन आज के वक्त में अपने बच्चों के लिए और कुछ अपने लिए निकालना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि बच्चे आज के बहुत होनहार हैं। ऐसे वक्त में बच्चों का माता-पिता के साथ तालमेल कम नहीं अपितु ज्यादा होना जरूरी है।

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