"चूड़धार" पर्वत पर बसे "शिरगुल महाराज"

“चूड़धार” पर्वत पर बसे “शिरगुल महाराज”

 चूड़धार घाटी लगभग 7 महीने तक बर्फ से अटी रहती है।

चूड़धार घाटी लगभग 7 महीने तक बर्फ से अटी रहती है।

हिमाचल में बहुत से प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं और इन तीर्थ स्थलों के दर्शनों के लिए लोग न केवल देशों से अपितु विदेशों से भी आते हैं। ऐसा ही एक हिमाचल के सिरमौर जिले में प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। सबसे ऊंची चोटी चूड़धार में तमाम मनमोहक दृश्य व तमाम कई प्रकार के पक्षियों व पेड़-पौधों के अदभुत नजारे मन को मोह लेते हैं। प्राचीन शैली से बना शिरगुल महाराज के मंदिर में माथा टेकने व पर्वतीय दृश्य को देखने के लिए हिमाचल से ही नहीं, अपितु बाहरी राज्यों से सैलानियों का हर वर्ष तांता लगा रहता है। यह देवस्थल अपने आपमें अनूठा है। पर्यटन की दृष्टि से भी चूड़धार विश्वभर में विख्यात है। और ट्रैकिंग के लिए भी जाना जाता है।

आज भी शिवलिंग के बायीं ओर दो जल की बावड़ियां, जहां दो लोटे पानी सिर पर डालने से पूर्ण होती हैं मनोकमनाएं

कहा जाता है कि शिरगुल महाराज ने चूड़धार में जहां पर पानी की हमेशा कमी थी वहां उन्होंने पानी की व्यवस्था की। आज भी शिवलिंग के बायीं ओर दो जल की बावड़ियां हैं। इस पवित्र जल के दो कुंड भी हैं। जहां दो लोटे पानी सिर पर डालने से मनोकमनाएं पूरी हो जाती हैं। चूड़धार में जहां अब विशालकाय शिव प्रतिमा है वहां पर प्राकृतिक शिवलिंग होता था। ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने अपने हिमाचल प्रवास के दौरान यहां शिव की आराधना के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी। स्नान या पंचस्नान करके श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करते हैं और पवित्र एवं अद्भुत शिवलिंग का दर्शन पाकर पुण्य प्राप्त करते हैं। क्षेत्र में जब भी किसी मंदिर का जीर्णोद्धार होता है तो उस मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना से पहले उन्हें चूड़धार में पवित्र स्नान करवाया जाता है। चूड़धार यात्रा शुरू होते ही वहां पर भारी संख्या में पुजारी का जमावड़ा लग जाता है। अपने आपको शिरगुल देवता का गुर बताते हुए पुजारी श्रद्धालुओं की समस्याओं के समाधान की विधि बताते हैं और श्रद्धालुओं को संतुष्ट करते हैं।

  • लगभग 7 महीने तक बर्फ से ढकी रहती है चूड़धार घाटी
  • सिरमौर जनपद में समुद्रतल से 11,966 फुट ऊंचाई पर स्थित पवित्र चूड़धार शिखर हिमालय पर्वत शृंखलाओं की शिवालिक श्रेणियों की
मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना से पहले उन्हें चूड़धार में पवित्र स्नान करवाया जाता है

मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना से पहले उन्हें चूड़धार में पवित्र स्नान करवाया जाता है

उच्चतम चोटी है, जो प्राकृतिक सौंदर्य के विहंगम दृश्य एवं चूड़ेश्वर महादेव की तपोस्थली का अनूठा संगम है। इस तीर्थस्थल का तापमान माइनस में चला जाता है, लेकिन इसके बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं होती है। यहां हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते हैं। चूड़धार तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 20 से 25 किमी पैदल चल कर यात्रा करनी पड़ती है।

  • चूड़धार घाटी लगभग 7 महीने तक बर्फ से ढकी रहती है।
  • चूड़धार धाम में किया गया स्नान गंगा स्नान की तरह ही पवित्र

मई से लेकर अक्टूबर माह तक वहां पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। अक्टूबर माह में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। अप्रैल माह में मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं। मगर उस दौरान भी वहां पर 8 से 10 फुट बर्फ जमी हुई होती है। लोगों की शिरगुल देवता के प्रति इतना आस्था है कि बर्फबारी के दौरान भी श्रद्धालु शिरगुल महाराज के दर्शन के लिए चूड़धार पहुंच जाते हैं। चूड़धार में सबसे अधिक श्रद्धालु सिरमौर, शिमला व सोलन जिले से आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग अपने कुल देवी-देवताओं के साथ पवित्र धाम के लिए रवाना होते हैं। चूड़धार पहुंच कर देवी-देवताओं को पवित्र स्नान करवाया जाता है। श्रद्धालु भी पवित्र स्नान करने के बाद मंदिर जाकर शिरगुल महाराज के दर्शन व उनकी पूजा अर्चना करते हैं। चूड़धार धाम में करवाए गए स्नान को गंगा स्नान की ही तरह पवित्र माना जाता है।

प्रसिद्ध चूड़धार तीर्थस्थल की और जाता रास्ता

प्रसिद्ध चूड़धार तीर्थस्थल की और जाता रास्ता

  • श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए चूड़ेश्वर सेवा समिति का भवन, सरकारी सराय और श्यामानंद आश्रम

चूड़धार आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए चूड़ेश्वर सेवा समिति का भवन, सरकारी सराय और श्यामानंद आश्रम है। यहां पर प्रतिदिन करीब 2000 श्रद्धालुओं के ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था है। लोगों की शिरगुल देवता के प्रति गहरी आस्था है। यहां पर पवित्र लिंग व भगवान शिव की एक विशालकाय प्रतिमा सुशोभित है।

  • शिखर से नजर आते हैं कुरुक्षेत्र, चंडीगढ़, करनाल के अदभूत दृश्य

यह शिखर जहां एक ओर दक्षिण से सतलुज एवं गंगीय मैदानों एवं शहरों में कुरुक्षेत्र, चंडीगढ़, करनाल का अदभूत दृश्य पेश करता है। वहीं दूसरी ओर उत्तर से दृष्टिगोचर बर्फ से ढकी हिमालय की पवित्र श्रृंखलाओं तथा क्षेत्र के घने-घने जंगलों का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है, जो कि पर्यटकों को मंत्रमुग्ध करता

यहाँ कस्तूरी, मृग, बाघा, कक्कड़, कोयल आदि दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणी यहां के प्रकृति की गोद में स्वतंत्र

कस्तूरी, मृग, बाघा, कक्कड़, कोयल आदि दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणी यहां के प्रकृति की गोद में स्वतंत्र

है।

  • कस्तूरी मृग, बाघ, कक्कड़, कोयल आदि दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणी यहां के प्रकृति की गोद में स्वतंत्र

कस्तूरी मृग, बाघ, कक्कड़, कोयल आदि दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणी यहां के प्रकृति की गोद में स्वतंत्र हैं। दुर्लभ पक्षी मोनाल की सुरीली आवाज इस क्षेत्र में पर्यटकों के पर्यावरण की आहट का अभिनंदन करती है। चूड़ेश्वर महादेव के इतिहास को बख्यान करती सुडोल चट्टान, गगन चूमती चोटियां, यहां की धरती को स्पर्श करते गतिशील बादल, स्वास्थ्यवर्धक शीतल हवा, अमृतरूपी औषधीय जड़ी-बुटियां आने वाले हजारों पर्यटकों का मुख्य आकर्षण हैं।

  • सराहां और नौहराधार से जाने वाले रास्ते में दो बेस कैंप

यहां हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते हैं। सराहां और नौहराधार से जाने वाले रास्ते में दो बेस कैंप हैं। दूसरे और तीसरे पड़ाव में लोगों को खाने-पीने की वस्तुएं आसानी से मिल जाती हैं। सेवा समिति प्रतिवर्ष चूड़धार में भंडारा लगाने पर 10 से 12 लाख खर्च करती है। उन्होंने बताया कि यहां प्रतिवर्ष करीब एक लाख श्रद्धालु शिरगुल महाराज के दर्शन करने आते हैं। चूड़धार आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए चूड़ेश्वर सेवा समिति का भवन, सरकारी, सराय और श्यामानंद आश्रम है। यहां पर प्रतिदिन करीब 2000 श्रद्धालुओं के ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था है। यहां बैसाख मास की संक्रान्ति से लोगों का आना शुरू हो जाता है।

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