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धर्म-आस्था व कला का बेजोड़ संगम : कांगड़ा

  • कांगड़ा किला: कांगड़ा के शासकों की निशानी यह किला भूमी चंद ने बनवाया था। बाणगंगा नदी के

कांगड़ा किला

कांगड़ा किला

किनारे बना यह किला 350 फीट ऊंचा है। इस किले पर अनेक हमले हुए हैं। सबसे पहले कश्मीर के राजा श्रेष्ठ ने 470 ई. में इस पर हमला किया। 1886 में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया। किले के सामने लक्ष्मीनारायण और आदिनाथ के मंदिर बने हुए हैं। किले के भीतर दो तालाब हैं। एक तालाब को कपूर सागर के नाम से जाना जाता है। इतिहास के पन्नों में कांगड़ा किले का अपना महत्व है इसे देखने के लिए लोग विशेष रूप से यहां पहुंचते हैं।

महाराणा प्रताप सागर झील: यह झील व्यास नदी में बनी है। 1960 ई. में व्यास नदी पर एक बांध बनवाया गया और इसे महाराणा प्रताप सागर झील कहा गया। इस झील का पानी 180 से 400 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला है। 1983 ई. में इस झील को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित कर दिया गया। यहां लगभग 220 पक्षियों की प्रजातियां प्रवास करती हैं। इस बांध को पोंग बांध भी कहा जाता है। महाराणा प्रताप सरोवर को यह नाम 16वीं शताब्दी के राजपूताना की दन्तकथा के बाद दिया गया है। यह मानव मिर्मित जलाशय पहले पौंग बांध जलाशय के रूप में जाना जाता था यह समुद्र के स्तर से 450 मीटर की ऊंचाई पर होते थे। पौंग बांध बाद में हिमाचल के दक्षिण-पश्चिम छोर पर ब्यास नदी पर बनाया गया था। यह सरोवर कांगड़ा जिला में पड़ता है तथा 450 हैक्टेयर क्षेत्र को आवरित करता है। यह राज्य में मनुष्य द्वारा बनाया गया दूसरा वृहृत जलाशय है। इसके पृष्ठ पट में आकर्षक धौलाधार का क्षेत्र नजर आता है और यह स्थान शिवालिक रेंज में स्थित है। झील का चमकता हुआ एवं सुन्दर दृश्य बार-बार आने को उकसाता है।

कांगड़ा घाटी के नूरपुर, गुलेर, कांगड़ा, नादौन तथा सुजानपुर टीहरा में इसे फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिला। जयदेव एवं केशवदास जैसे कवियों की कविताओं से उद्धृत दृश्य इन लघुचित्रों के विषय बन गए। इनके खास चरित्र राधा एवं कृष्ण रहे। कांगड़ा लघुचित्र शैली के नमूने आज देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों के अलावा विदेशों के संग्रहालयों की भी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके अलावा यह स्थान प्रसिद्ध चित्रकार पद्मश्री शोभा सिंह एवं बीसी सान्याल से संबंधित भी है। शोभा सिंह की प्रोटेट बनाने की एक खास शैली थी। उनके द्वारा बनाए गए चित्रों में सोहणी-महिवाल, हीर-रांझा, उमर खय्याम तथा कांगड़ा दुलहन का चित्र बहुत प्रसिद्ध है। आंद्रेटा में उनकी एक कलादीर्घा भी है। जिसे देखने सैकड़ों चित्रकला प्रेमी यहां अवश्य आते हैं। यहां प्रदर्शित चित्रों में उनकी बिंदास शैली देखते ही बनती है। आंद्रेटा में एक पॉटरी केंद्र व संग्रहालय है जहां टेराकोटा पाटरी के बेहतरीन नमूने प्रदर्शित हैं। पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी द्वारा कलाकारों के लिए यहां राइटर्स हाउस की स्थापना की गई है। यहां के

कांगड़ा आर्ट गैलरी

कांगड़ा आर्ट गैलरी

शांत, ग्रामीण परिवेश में घूमते हुए सैलानी स्वयं को प्रकृति के ओर निकट महसूस करते हैं। शायद इसीलिए कलाप्रेमियों को भी यह स्थान भा गया होगा।

कांगड़ा आर्ट गैलरी: यह आर्ट गैलरी कांगड़ा घाटी की कला, शिल्प और समृद्ध अतीत का भंडार है। यहां कांगड़ा की लोकप्रिय लघु पेंटिग्स, मूर्तियों का संग्रह और मिट्टी के बर्तन देखे जा सकते हैं। आर्ट गैलरी में कई तरह की शिल्पकारों द्वारा बनाई गई सुंदर आकृतियां व चित्र हैं। यह अपने आप में अति अनुपम है। निचले धर्मशाला में बना कांगड़ा आर्ट म्यूजि़यम कांगड़ा के सालों पुराने इतिहास को दिखाता है। म्यूजि़यम की गैलरी में कांगड़ा की पेंटिंग्स, स्कल्पचर्स, मिट्टी के बर्तन और एंथ्रोपोलॉजी से जुड़ी तमाम चीजें देखने को मिलती हैं। कांगड़ा घाटी की कांगड़ा पेंटिंग भी विश्व में प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी के मध्य में कांगड़ा की खास चित्रकला शैली का उदय हुआ था। 1739 में नादिर शाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण करने पर बहुत से कलाकारों ने पश्चिम हिमालय के राज्यों की ओर पलायन कर लिया। वहां के राजाओं ने इनकी कला को प्रोत्साहित किया। उन्हीं दिनों में यहां लघुचित्रों की एक खास शैली प्रचलित हुई। यह कांगड़ा लघुचित्र शैली कहलाने लगी।

मशरूर मंदिर: कांगड़ा के दक्षिण से 15 किमी. दूर स्थित मशरूर नगर समुद्र तल से 800 मीटर की ऊंचाई पर है। इस नगर में 15 शिखर मंदिर है। चट्टानों को काटकर बनाए गए इन मंदिरों का संबंध दसवीं शताब्दी से है। यह मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना हुआ हैं। इन मंदिरों की तुलना अजंता और एलौरा के मंदिरों से की जाती है।

करौरी झील: यह झील घने जंगलों से घिरी है। इसकी पृष्ठभूमि में धौलाधार पर्वत श्रृंखलाएं इसे एक बेहद खूबसूरत स्थान बनाते हैं। करौरी झील इस क्षेत्र में ट्रैकिंग का प्रकाश स्तम्भ है।

सुजानपुर किला: कांगड़ा राज्य की सीमाओं के नजदीक ही सुजानपुर किला है। सुजानपुर किले का निर्माण 1758 में कांगड़ा के शासक रजा अभय सिंह ने कराया था। ये किला हमीरपुर के सुन्दर भवनों में से एक है। इस किले की आकर्षक पेंटिंग इसे और भी मनमोहक बनाती है जो इसकी लोकप्रियता में चार चाँद लगाता है जब कांगड़ा के शासक अंग्रेजों से हार गए थे तो उन्होंने अपने पूरे परिवार के साथ इसी किले में शरण ली थी। इस किले की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यहां पर अलग-अलग हिस्सों से आने वाले राजाओं के लिए अलग-अलग खण्डों का निर्माण कराया गया था ताकि उनके आराम में कोई कमी न हो ये किला ब्यास नदी के किनारे स्थित है जहां पर राज्य के अलग-अलग मामलों की सुनवाई का आयोजन किया जाता था। साथ ही इस किले के विशाल बरामदे में होली पर्व का आयोजन किया जाता था इस जगह के अन्य आकर्षण नरबदेश्वर, गौरीशंकर और मुरली मनोहर मंदिर हैं।

चिन्मय तपोवन: कांगड़ा से 10 किमी. दूर चिन्मय तपोवन एक पहाड़ी पर स्थित है। इस आश्रम परिसर की स्थापना हाल ही में गीता के व्याख्याता स्वामी चिन्मयानंद ने की थी। इस खूबसूरत स्थान पर हनुमान की एक विशाल मूर्ति स्थापित है। साथ ही एक विशाल शिवलिंग भी यहां दूर से देखा जा सकता है।

कांगड़ा क्वीन नूरपुर : मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां के नाम पर बसा यह एक छोटा-सा पहाड़ी शहर है। यहां एक किला एवं कृष्ण मंदिर दर्शनीय है। आज यह शहर कुल्लू शॉल की बुनाई का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। नूरपुर के बाद रेलमार्ग दक्षिण पूर्व दिशा को मुड़ता है। नंदपुर, भीताली, गुलेर जैसे स्टेशनों को पीछे छोड़ यह रेलगाड़ी सबसे पहले ज्वालामुखी रोड़ स्टेशन है। यह स्टेशन समुद्रतल से 379 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

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