सोलन: राष्ट्रीय संगोष्ठी में नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जीते शीर्ष सम्मान

 नौणी: डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के पादप रोग विज्ञान विभाग ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए पोस्टर एवं मौखिक प्रस्तुति, दोनों श्रेणियों में शीर्ष सम्मान प्राप्त किए हैं। ये पुरस्कार 22-23 अक्तूबर, 2026 को आईसीएआर-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई), शिमला में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘जलवायु सहनशीलता, खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के लिए पादप स्वास्थ्य की भावी रणनीतियां’ में प्रदान किए गए।

दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से प्रख्यात वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों, किसानों, उद्योग प्रतिनिधियों और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। संगोष्ठी में पादप स्वास्थ्य से जुड़ी उभरती चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के साथ-साथ जलवायु-अनुकूल कृषि, खाद्य सुरक्षा और सतत फसल संरक्षण के लिए नवीन रणनीतियों पर चर्चा की गई। इसका संयुक्त आयोजन इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी, इंडियन पोटैटो एसोसिएशन, इंडियन सोसाइटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट्स तथा हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी ने आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केंद्र, शिमला के सहयोग से किया।

विश्वविद्यालय लौटने पर कुलपति प्रो. एच.एस. बवेजा ने पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों से मुलाकात कर उन्हें इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने विशेष रूप से पादप रोग विज्ञान विभाग के विभाग अध्यक्ष डॉ. अनिल हांडा और उनकी वैज्ञानिक टीम की सराहना की, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित मंच पर उच्च गुणवत्ता वाला वैज्ञानिक शोध प्रस्तुत कर विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ाया। प्रो. बवेजा ने कहा कि ये उपलब्धियां न केवल विभाग में हो रहे उत्कृष्ट शोध कार्यों को रेखांकित करती हैं, बल्कि विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि अन्य विभाग भी इससे प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहेंगे।

पुरस्कार विजेताओं में डॉ. अमन चौहान ने पोस्टर प्रस्तुति श्रेणी में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। उनका शोध ‘चेरी और प्लम के पेड़ों में फाइटोप्लाज्मा संक्रमण की त्वरित पहचान के लिए LAMP-आधारित परीक्षण’ विषय पर था। इस शोध में डॉ. अनिल हांडा, डॉ. भूपेश गुप्ता और डॉ. अजय ब्राक्टा सह-लेखक थे। यह तकनीक एक घंटे के भीतर फाइटोप्लाज्मा संक्रमण की त्वरित एवं विशिष्ट पहचान करने में सक्षम है। इससे बागवानी फसलों में खेत स्तर पर रोग निदान और बड़े पैमाने पर रोग निगरानी की संभावनाएं मजबूत होती हैं।

मौखिक प्रस्तुति श्रेणी में डॉ. शालिनी वर्मा, निकिता नेगी, डॉ. सतीश कुमार शर्मा, डॉ. गोपाल सिंह और अनन्या बेनल की टीम ने जापानी फल के पत्तों के झुलसा रोग के उभरने के कारणों की पहचान’ विषय पर अपने शोध के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। इस अध्ययन में हिमाचल प्रदेश में इस रोग से जुड़े रोगजनकों की पहचान की गई।

मौखिक प्रस्तुति श्रेणी में तृतीय पुरस्कार डॉ. मीनू गुप्ता, मुस्कान ठाकुर, डॉ. भूपेश गुप्ता और डॉ. अनुपमा सिंह को लहसुन में बैंगनी धब्बा रोग उत्पन्न करने वाले आल्टर्नेरिया प्रजाति के विभिन्न आइसोलेट्स में सांस्कृतिक, आकारिकी एवं रोगजनकता संबंधी विविधताओं पर किए गए शोध के लिए प्रदान किया गया। यह अध्ययन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फसल लहसुन को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोग के रोगजनकों में पाई जाने वाली विविधताओं को समझने में सहायक है। ये उपलब्धियां पादप रोगों के निदान, रोगजनकों पर अनुसंधान तथा बागवानी एवं कृषि फसलों की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक आधार पर प्रभावी रणनीतियों के विकास में विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण योगदान को पुनः स्थापित करती हैं।

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