हिमाचल की उत्कृष्ट कलाएं एवं वास्तुकला विश्वभर में विख्यात

हिमाचल की उत्कृष्ट कलाएं एवं वास्तुकला विश्वभर में विख्यात

  • भित्ति-चित्र कला

भित्ति चित्र, पहाड़ी चित्रकला का अभिन्न अंग है। दीवारों पर बनाए जाने वाले ये चित्र अत्यंत सजीव है तथा लोककला के श्रेष्ठ उदाहरण

भित्ति चित्र, पहाड़ी चित्रकला का अभिन्न अंग

भित्ति चित्र, पहाड़ी चित्रकला का अभिन्न अंग

हैं। इन चित्रों के लिए सतह धज्जी दीवारों पर बड़े परिश्रम से बनाई जाती थी। इसके लिए मिट्टी, चूने, गारे, गोलू आदि का प्रयोग किया जाता है। अंतर में इसे कोमल पत्थरों की घोटनियों से घोटकर मुलायम बनाया जाता है। पक्की दीवारों पर स्थानीय रूप से तैयार रसायनों से युक्त लेप किया जाता है। स्थानीय कलाकार संस्कारों तथा व्रत, अनुष्ठान आदि पर इन्हें बनाते हैं। स्त्रियां भी घरों में स्वयं चित्र अंकित करती हैं।

हिमाचल में प्राप्त भित्ति चित्रों में चंबा, मंडी, कांगड़ा, कुल्लू, बिलासपुर आदि स्थानों पर बने राजभवनों, किलों तथा मंदिरों में बने चित्र महत्वपूर्ण हैं। चंबा का रंगमहल भित्ति-चित्र शैली का अदभूत नमूना है जिसे कई राजाओं के समय में पूरा किया गया। अखनचंडी महल, लक्ष्मीनारायण मंदिर, दुर्गा मांगणु के निजी घरों की बैठकों में इस कला के नमूने मिल जाते हैं। देवी कोठी और छतराहड़ी के शक्ति मंदिरों में भी भित्ती-चित्र लुभावने हैं। कहा जाता है कि यह चित्र दुर्गा और मियां तारा सिंह द्वारा बनाए गए थे। मंडी के राजा सूरजसेन (1637-64) का दमदमा भवन तथा मियां भाग सिंह (1846-51) की हवेली भी भित्ति चित्रों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। मंडी के चित्रकारों में महुम्मदी, गहियाराम, गोवर्धन कायस्थ के नाम लिए जाते हें। गोविदंसागर में विलीन बिलासपुर के राजमहलों में भी ऐसे संकेत मिलते थे। कांगड़ा दुर्ग, सुजानपुर के नर्वदेश्वर मंदिर, आलमपुर व विजयपुर के राजभवनों तथा मंदिरों में भी इस कला-रूप के दर्शन होते हैं। कुल्लू के राजा प्रीतम सिंह के राज्यकाल में राजभवनों को भित्ति चित्रों से सजाने का काम प्रारंभ हुआ था। यहां के शीशमहल पर कांगड़ा-कलम का प्रभाव है।

  • पहाड़ी रूमाल, हस्तशिल्प-कलाएं

पहाड़ी हस्तकला लोक-शिल्प में पहाड़ी-रूमाल का महत्वूपर्ण स्थान है। ये रूमाल चंबा, कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर व कुल्लू में बनते हैं। यह कला जम्मू के बसोहली से चंबा आई थी। राजा संसार चंद के काल में यह कांगड़ा में लोकप्रिय हुई और वहां से हिमाचल के अन्य भागों में गई। चंबा में राज राज सिंह और रानी शारदा के समय इसे विशेष प्रोत्साहन मिला और इसे कहीं-कहीं आयताकार कपड़े पर बनते हैं। इन पर रंग-बिरंगे पक्के रेशमी धागों द्वारा रासलीला, कृष्णलीला, राग-रागनियों तथा पौराणिक चित्रों का मनोहरी चित्रण मिलता है। फुलहारी में कशीदे गए चित्रों के मध्य गोलाकार शीशे भी जड़े जाते हैं। इस कला में थापड़ा (विशाल चादरनुमा कपड़ा), कोहरा (दीवार पर लटकाने का कपड़ा), तकिए के कवर, गिलाऊ, चोलियों, टोपियों आदि

चंबा में सोलहवीं शताब्दी में पहाड़ी चित्रकला भित्ति चित्रों के रूप में उभर कर आई

चंबा में सोलहवीं शताब्दी में पहाड़ी चित्रकला भित्ति चित्रों के रूप में उभर कर आई

की कशीदाकारी भी पहाड़ी हस्तशिल्प कला के नमूने हैं। ये वस्तुएं प्राय: घर-गृहस्थी की शोभा बढ़ाने के लिए बनाई जाती हैं। इसी प्रकार कुल्लई, सिरमौरी, किन्नौरी तथा लाहौली टोपियों की साज-सज्जा में भी इस कला रूपों के संकेत मिलते हैं। कुल्लू के शाल-दुशाले, लाहैल के नमदे, गलीचे आदि भी कलात्मक होते हैं। नए कपड़ों में फटे-पुराने चीथड़े भरकर गुडिय़ां और हाथी आदि बनाने की परंपरा हिमाचल में हैं जो कि दहेज में भी दिए जाते हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरने जोडक़र बनाए गए बिछौने भी आकर्षक होते हैं।

कपड़ों की रंगाई, बांस के विभिन्न प्रकार के औजार और बर्तन जिन्हें डोम बनाते हैं, साज-सज्जा संबंधी उपकरण जिन पर लाल-पीले रंग से चित्रकारी की जाती है, लोक-कलाओं के नमूने हैं। छक्कू, पटारू, टोकरियां, पेडू , किरनियां, श्रृंगारदान, फूलदान, कुर्सियां, मेज, कौच और बुक रैक आदि वस्तुएं कलात्मक अभिरूचि का परिचय देती है।

हिमाचल की दुर्लभ कलाकृतियों की विरासत को बचाने के लिए प्रदेश में चार संगहालय कार्यरत हैं। सबसे पुराना संग्रहालय भूरि सिंह संग्रहालय है। राजा भूरि सिंह ने 1908 में इसकी स्थापना की थी। 1974 में हिमाचल प्रदेश राज्य संग्रहालय की स्थापना की, चौड़ा मैदान शिमला में की गई। 1991 में कांगड़ा कला संग्रहालय स्थापित किया गया। 2006 में केलंग में संग्रहालय बनाया गया। 2012 में कुल्लू में नगर में रोरिक आर्ट-कालेज की स्थापना की गई। अन्दरेटा कांगड़ा में प्रसिद्ध चित्रकार शोभा सिंह की कला-दीर्घा को शोभ सिंह आर्ट संग्रहालय में बदल दिया गया।

  • मंडी कलम”

हिमाचल प्रदेश के केंद्र में स्थित मंडी नगर अपने आपमें ऐतिहासिक , पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत का समावेश है। ब्यास नदी के किनारे बसा यह शहर तिब्बत से होशियारपुर के ऐतिहासिक सिल्करूट का पड़ाव रहा है। पाणिनी की अष्टध्यायी में मंडवती नगरी के नाम से इसका उल्लेख है। ईसा की आठवीं शताब्दी में बौद्ध दार्शनिक और तिब्बत में लामा समुदाय के संस्थापक गुरू पदम संभव का यह भूभाग कर्मक्षेत्र रहा है। बौद्ध ग्रंथों में इस क्षेत्र का जौहर के रूप में वर्णन है। संस्कृत साहित्य में मंडी को मंडयिका के नाम से पुकारा जाता है, जिसका अर्थ खुला हाल या गौशाला होता है। आठवीं से बाहरवीं शताब्दी तक चार सौ साल के काल खंड में हिमालय क्षेत्र विभिन्न ठकुराइयों के प्रभाव में रहा। ईसा के 765 में सुकेत रियासत का आरंभ हो चुका था। सुकेत से मंडी रियासत का अलगाव कणिघम के अनुसार एक हजार ई. में शुरू हुआ। सेन वंश के साहुसेन और बाहुसेन में अनबन के कारण सुकेत और मंडी दो रियासतें बनीं। बाहुसेन ने पांगणा छोड़कर कुल्लू के मंगलौर क्षेत्र में प्रवास किया। यहां छोटे—छोटे राणाओं को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार करने लगा। यहीं से उसने मंडी राज्य की नींव रखी। इसके पश्चात बाण सेन के पुत्र कल्याण सेन ने भ्यूली में राजधानी बसाई। बटोहली में मंडी रियासत की राजधानी बनने के बाद पंद्रहवीं शताब्दी में राजा अजबर सेन ने आधुनिक मंडी नगर की स्थापना की। इसके पश्चात से ही मंडयाली लोक संस्कृति और लोक कला के उत्थान की प्रक्रिया भी आम जनमानस के बीच शुरू हुई। जिसमें पहाड़ी चित्रशैली में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली मंडी कलम भी एक है।

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