नौणी विवि में फ्रूटस एंड वेजीटेबल प्रोसेसिंग एवं बेकरी प्रोडक्टस डिप्लोमा के लिए करें आवेदन

नौणी विवि को मिली अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान परियोजना

  • अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी परियोजना के लिए चुना
  • यह परियोजना प्रतिष्ठित न्यूटन भाभा फंड यूके- इंडिया पल्स एंड ऑयलसीड रिसर्च इनिशिएटिव के तहत हुई मंजूर
  • नौणी विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम के सात और देश के नौ प्रसिद्ध अनुसंधान संस्थानों के साथ करेगा काम

सोलन: डॉ. वाईएस परमार औदयानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के पादप रोग विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों को सरसों एवं अन्य ऑइलसीड्स में जैविक एवं अजैविक तत्वों के प्रभाव के प्रति सहनशीलता के लिए अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी परियोजना के लिए चुना गया है।

यह परियोजना प्रतिष्ठित न्यूटन भाभा फंड यूके- इंडिया पल्स एंड ऑयलसीड रिसर्च इनिशिएटिव के तहत मंजूर हुई है। यह फंड यूनाइटेड किंगडम के बीबीएसआरसी और भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा बनाया गया है। इस परियोजना में नौणी विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम के सात और देश के नौ प्रसिद्ध अनुसंधान संस्थानों के साथ काम करेगा। तीन साल की इस सयुंक्त परियोजना का भारतीय व्यय 7.27 करोड़ रुपये है, जिसे परियोजना के लिए चुने गए 10 भारतीय संस्थानों में वितरित किया जाएगा। प्रत्येक भारतीय संस्थान परियोजना के एक अलग पहलू पर काम करेगा जबकि उसी क्षेत्र में एक ब्रिटेन का शोधकर्ता भी कार्य करेगा।

बीबीएसआरसी, जो यूके रिसर्च एंड इनोवेशन का हिस्सा है,एक ऐसी संस्था है जो शोध,नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों,अनुसंधान संगठनों और सरकार के साथ साझेदारी में काम करती है। इस शोध के लिए वह ब्रिटेन से चुने गए शोधकर्ताओं के लिए करीब 3.5 मिलियन पाउंड उपलब्ध करा रही है।

पादप रोग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ एचआर गौतम ने बताया कि प्लांट पैथोलॉजी के प्रोफेसर डॉ अनिल हांडा इस परियोजना के प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर और समन्वयक होंगे जबकि जैव प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ रजनीश शर्मा सह-जांचकर्ता के रूप में कार्य रेंगे। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि विभाग के 55 वर्षों के इतिहास में एक गौरव का क्षण है। इस अवसर पर नौणी विवि के अनुसंधान निदेशक डॉ जेएन शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय विभिन्न वित्त पोषण एजेंसियों से परियोजनाएं प्राप्त करने और सहयोगी कार्य में संलग्न होने के निरंतर प्रयास कर अपनी अनुसंधान क्षमताओं और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है।

भारत दुनिया में तिलहन फसलों के प्रमुख उत्पादकओं और उपभोक्ताओं में से एक है। नौणी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक क्रिस्टल / कैस 9 जैसे अत्याधुनिक उन्नत आण्विक तकनीक का उपयोग करके तरनीप मोज़ेक वायरस(टीयूएमवी) के प्रतिरोध को प्रदान करने वाले जीन पर कार्य करेगें। इस विभाग की प्लांट वायरोलॉजी प्रयोगशाला एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशाला है जहां उत्तरी भारत में टीयूएमवी की अनुवांशिक विविधता को निर्धारित करने और भारतीय टीएमएमवी के एक पैनल को विकसित करने के लिए शोध के लिए सुविधाएं हैं। यहाँ यूरोपीय और भारतीय प्रतिरोध के स्रोतों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

नौणी विश्वविद्यालय के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय; एनआईपीजीआर, नई दिल्ली; एनबीपीजीआर, नई दिल्ली; एनआरसीपीबी, नई दिल्ली; आईएआरआई, नई दिल्ली; पंजाब कृषि विश्वविद्यालय  लुधियाना; सीएजेआरआई, जोधपुर; डीआरएमआर, भरतपुर और आईआईटी खड़गपुर परियोजना का हिस्सा होंगे। यॉर्क विश्वविद्यालय, हर्टफोर्डशायर विश्वविद्यालय, वारविक विश्वविद्यालय, एसेक्स विश्वविद्यालय, अर्लहम संस्थान और रोथमस्टेड रिसर्च ब्रिटेन के जांचकर्ता होंगे।

वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए, कुलपति डॉ. एचसी शर्मा ने कहा कि यह परियोजना सरसों और तोरिया फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए रोग प्रबंधन के लिए जैव प्रौद्योगिकी में नवीनतम तकनीकों का उपयोग करने का सुनहरा अवसर है। इसके अलावा फसल सुधार के लिए आणविक मार्करों का उपयोग करने में हमारे छात्रों को भी प्रशिक्षित करने में मदद करेगी।

भारत में दालें और तिलहन महत्वपूर्ण फसलें हैं। दालें यूके में अपेक्षाकृत कम उपयोग की जाने वाली फसलें हैं, लेकिन भारत में आहार में प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत हैं। दोनों देशों में तिलहन उगाए जाते हैं और विभिन्न प्रकार के उपयोगों के साथ-साथ पशु फ़ीड के लिए और तेल का एक मूल्यवान स्रोत हैं। इस सहयोगी परियोजना का उद्देश्य टिकाऊ फसल उत्पादन के लिए बेहतर किस्मों के विकास में सहायता के लिए जीनोमिक और बायोइनफॉर्मेटिक संसाधनों का दोहन करना है।

 

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