हिमाचली पारम्परिक वस्त्र न केवल प्रदेश में अपितु देश-विदेश में भी लोकप्रिय

हिमाचली पारम्परिक वस्त्र न केवल प्रदेश में अपितु देश-विदेश में भी लोकप्रिय

  • हिमाचल के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की पहचान वहां का पहरावा
  • जनजातीय जगहों में स्वयं बनाए हुए वस्त्रों को तरजीह
  • कुल्लुवी पहरावे का अन्य क्षेत्रों के साथ नहीं कोई मेल
  • एक विशेष पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं हिमाचली वस्त्र
  • ‘जैसा देश वैसा वेश’
  • हाथ से बनाए गए पारम्परिक वस्त्रों की मांग प्रदेश में ही बल्कि अन्य राज्यों व देश-विदेश में भी बहुत अधिक

किसी भी देश व प्रदेश की पहचान उसकी वेशभूषा से लगाई जा सकती है। ऐसे ही हिमाचल प्रदेश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की पहचान वहां के पहनावे से की जाती है। पहाड़ी क्षेत्र होने के नाते प्रत्येक ऋतुओं में परिवर्तन के साथ ही लोगों के पहनावे में भी बदलाव होते नजर आते हैं। प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में जैसे कि जिला लाहौल-स्पीति, किन्नौर, कुल्लू, चम्बा, रामपुर व अन्य कई जनजातीय जगहों में स्वयं बनाए हुए वस्त्रों को तरजीह देते हैं और इन पारम्परिक वस्त्रों को बाजार में अच्छे दामों पर बेचा जाता है। हाथ से बने हुए शॉलें, पटॅटू, जुराबें, टॉपी, मफलर, दस्तानें, लोईया, कोट, हाफ जैकेट, सिखी, दोड़ू, ढाटू, इत्यादि उत्पादों को बाजार में बेचकर अच्छे दाम मिल जाते हैं जो कि इन लोगों की आमदनी का एक बेहतर जरिया है। भिन्न-भिन्न देशों व विदेशों से आए पर्यटक इन वस्त्रों को खरीद कर ले जाते हैं, जिससे भी ये वस्त्र एक विशेष पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। हिमाचल का पहनावा इतना प्रसिद्ध है कि यहां की टॉपियां और शॉल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के सिर पर सज चुकी हैं। शिमला में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भेंट की गई टॉपी और मफलर उन्होंने अपने अमरीका और ईज़राइल दौरे पर भी पहने हुए थे। हाथ से बनाए गए पारम्परिक वस्त्रों की मांग न केवल प्रदेश में ही बल्कि अन्य राज्यों व देश-विदेश में भी बहुत ज्यादा है।

कुल्लुवी पहरावे का अन्य क्षेत्रों के साथ नहीं कोई मेल

कुल्लुवी पहरावे का अन्य क्षेत्रों के साथ नहीं कोई मेल

किसी क्षेत्र की सभ्यता, संस्कृति अथवा लोकाचार को समझने के लिए उस क्षेत्र के पहरावे से ही पता चल जाता है कि उस क्षेत्र विशेष का भूगोल, जलवायु, रहन-सहन अथवा परम्पराएं कैसी हैं। सन् 1897 के आसपास लिखी गई जी. गोर नामक अंग्रेज की पुस्तक ट्राईबल्ज ऑफ हिमालयाज इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि उसने समूचे कुल्लू क्षेत्र का गहन अध्ययन किया है। उसने अन्य बातों के अतिरिक्त इस बात का विशेष उल्लेख किया है कि इस क्षेत्र का पहरावा अन्य क्षेत्रों के साथ कहीं भी मेल नहीं खाता।

  • ऊनी पट्टू ओढ़े महिलाएं

रेखाचित्रों के माध्यम से उसने यहां के लोगों के पहरावे को अंकित किया है। इन रेखाचित्रों को देखें तो पता चलेगा कि ऐसा पहरावा आज कहीं नहीं दिखेगा। महिलाएं मोटे ऊनी पट्टू ओढ़े हैं। कमर पर चौड़ी गाची (कमर बंद) सिर पर थीपू (रूमाल), पट्टू के अन्दर चोलू और इसी प्रकार पैर में पूला। कुछ चित्रों में पाऊछे भी दर्शाए गए हैं। इसी प्रकार कुछ चित्रों में तन पर सेली यानि बकरे की जटाओं का ओवर कोट और पैर में रूंचे। किसी भी चित्र में जूते नहीं दिखे। ऐसा नहीं है कि उस दौर में जूतों का चलन नहीं था, परन्तु यह निश्चित बात है कि इस क्षेत्र में जूतों का चलन नहीं होगा। आज भी मलाणा व कुछ अन्य गांवों में जूतों के साथ प्रवेश वर्जित है। ये देव प्रदत्त नियम ही थे जिनके साथ आज भी लोग बंधे हुए हैं। कुछ ऐसे वस्त्रों का वर्णन किया जा रहा है जो आज प्राय: लुप्त हो चुके हैं। जिनमें कुछ नाम इस प्रकार से हैं:

रूंचै- रूंचे बकरी की जटा से तैयार किए जाते हैं। ये जुराबें होती हैं। इन जुराबों को खूब खुला व घुटनों तक लम्बा बुना जाता है। सर्दियों में जब बर्फ की मोटी तह जम जाती है तो उस समय रूंचै से बढक़र दूसरा कोई जूता क्या हो सकता है? अन्दर गर्म जुराब और उसके ऊपर रूंचा बांधा जाता है।

मघोलड़ी पूला- यह एक प्रकार की चप्पल है जिसे धान के पराल से बनाते हैं। पराल को पहले खूब बटकर रस्सी का रूप दिया जाता है और फिर उसे मजबूती से यूं बुना जाता है कि वह चप्पल सी बन जाए। इन्हें इतना चौड़ा बनाया जाता है कि आसानी से रूंचे के बीच फिट बैठ सके। पूला के बीच पूला डालकर मजबूती से बांधा जाता है। बर्फानी रास्ता कितना भी लम्बा क्यों न हो, रूंचे और पूला से आसानी से नापा जा सकता है। पहनने में हल्का व फिसलने का भी कोई खतरा नहीं होता।

पाऊछे- पुराने समय में जब पाजामें का प्रचलन नहीं था तब पाऊछों का प्रचलन हुआ। पाऊछा एक प्रकार का पाजामा या पाजामी होती है जिसे केवल घुटनों तक ही पहना जाता है। पाऊछे की लम्बाई लगभग एक मीटर होती है। पहनने के बाद यह चूड़ीदार पाजामा लगता है। शायद बाद में पाऊछे ने ही चूड़ीदार पाजामे का रूप ले लिया हो। आज भी कुल्लूवी नाटी के लोक-नर्तक चूड़ीदार पाजामा पहनते हैं परन्तु पाऊछा इतिहास में समा गया है।

सुथण- सुथण भेड़ की ऊन का पाजामा होता है। भेड़ की ऊन जिसे नुआला के नाम से जाना जाता है, को कातकर और फिर रच्छ या खड्डी में बुनकर तैयार किया जाता है। सुथण को तंग सिला जाता है ताकि टांगों के बीच से हवा न गुजरे, परन्तु कमर के नीचे इसे सुविधा के लिए काफी खुला छोड़ा जाता है।

पौटू- पौटू या झिकड़ा ऊनी चादर होती है जो एक सामान्य चादर से लगभग दोगुनी होती है। पौटू में ऊन का बारीक ताना-बाना होता है। कुल्लू में प्राचीन समय से पौटू पहनने का रिवाज है, इसके पहनने का अपना ही अन्दाज है। पीठ के ऊपर दो तहें व शेष तन पर इसे कुछ इस प्रकार से लपेटा जाता है कि बाजू व पैर छोडक़र शेष पूरा शरीर ढक जाता है। तन पर ठीक ये ओढ़ाए रखने के लिए सामने से दो बुमणी (चांदी की सिलाइयां) से इसे गांठा जाता है। इन बुमणियों को भी चांदी की माला से जोड़ा जाता है। कमर बांधने के लिए पतली गाची का प्रयोग किया जाता है। पौटू का स्वरूप भले ही बदल गया हो, परन्तु परम्परा अभी भी बनी हुई है। पौटू को अधिकाधिक आकर्षक व सुरूचिपूर्ण बनाने के लिए अनेक डिजाइनों के पौटू बनने लगे हैं। अब ये पौटू कहलाए जाने लगे हैं। चितरै, दुमखरू, गुड़ी तारै, फूला आलै आदि अनेक नामों से बुने जाने लगे हैं। चितरै, दुमखरू, गुड़ी तारै, फूला आलै आदि अनेक नामों से बुने जाने लगे हैं। पौटू का ही छोटा रूप शाल आज कुल्लू शाल के नाम से देश-विदेश में धूम मचा रहा है।

पूल-यह मघोलड़ी पूला का छोटा रूप है, जिन्हें प्राय: बाथरूम चप्पल के समान बुना जाता है। धान के पराल से निर्मित इन पूलों को घर आंगन में आसानी से पहना जाता है। भांग के शेल (रेशे) को रस्सी का रूप देकर बुना जाता है कि यह एक बूट का सा रूप धारण करे। पराल की पूले से ये कहीं मजबूत होती है, परन्तु इनमें परिश्रम भी खूब है। इन पूलों पर रंग-बिरंगे डिजाइन भी डाले जाते हैं। आज भले ही पराल की पूलें कहीं न दिखती हों, परन्तु सिराजी पूलों का प्रचलन खूब है। अब तो ये पूलें बाजार में भी बिकने लगी हैं।

हाथ से बनाए गए पारम्परिक वस्त्रों की मांग प्रदेश में ही बल्कि अन्य राज्यों व देश-विदेश में भी बहुत अधिक

हाथ से बनाए गए पारम्परिक वस्त्रों की मांग प्रदेश में ही बल्कि अन्य राज्यों व देश-विदेश में भी बहुत अधिक

खुंटी-गद्दियों के चोले के समान यह एक ऐसा वस्त्र होता है जो कि शुद्ध भेड़ की ऊन से बना होता है। बाजू और कमर तक इसे सामान्यत: ढीला बनाया जाता है। कमर के नीचे खूब खुली चौड़ाई दी जाती है जिसमें सलवटें दी जाती हैं। इसे पहनने के बाद कमर में ऊन का काला डोरा डाला जाता है जिसके प्राय: दो दर्जन से ज्यादा लपेटे डाले जाते हैं। खुंटी बहुपयोगी व बहुउद्देश्यीय वस्त्र के रूप में प्रयोग में लाई जाती है। खुंटी का छोटा रूप खुंटलू है जिसे अपेक्षाकृत छोटा रूप दिया जाता है। खुंटी इतनी लोकप्रिय है कि कुल्लू की नाटी में खुंटी के ही प्रकार के चोले को पहना जाता है। ताणी या रफल के महीन धागे से निर्मित चोले को पहन कर जब लोक नर्तक नाचने के लिए सौह (मेला स्थल) पर उतरता है तो वह एक बैरागी योद्धा का सा दृश्य प्रस्तुत करता है। खुंटी आज भले ही अप्रासंगिक हो गई हो परन्तु उसी के दूसरे रूप चोले के बिना नाटी की शान नहीं बन पाती। ऊपरी शिमला का लोईया खुंटी का ही दूसरा रूप है।

सेली-पूर्णतया बकरे की ऊन (जटा) से तैयार किया जाता है। सेली का ताना-बाना जटा से तैयार करने के बाद उसे ओवरकोट का रूप देते हैं। इसमें बाजू नहीं जोड़े जाते। सेली का उपयोग घर के बाहर ही किया जाता है। इस वस्त्र पर पानी नहीं टिक पाता। गीला होने पर स्वत: निचुड़ जाता है। बरसात में चरवाहों को रात बाहर बितानी पड़े तो सेली को ओढ़ व बिछाकर वे रात काट देते हैं। पानी जमीन के नीचे से भले ही गुजर जाए परन्तु सेली को कोई आंच नहीं आती।

 

सम्बंधित समाचार

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *