हिमाचल के अन्य भागों से भिन्नता लिए “लाहुल” के लोगों का खान-पान

लाहुल के लोगों का आचार-व्यवहार हिमाचल के अन्य भागों के निवासियों से अनेक रूपों में भिन्नता लिए हुए

हिमाचल प्रदेश के हर जिले की अपने खान-पान की अलग विशेषता है। खासतौर पर त्यौहारों में खाने के लिए बनाए जाने वाले व्यंजन न केवल प्रदेश में अपितु देश व विदेश में भी अपना विशेष महत्ता लिए हुए हैं। यही वजह है कि हिमाचल प्रदेश की जहां धर्म-आस्था, संस्कृति, परंपरा, वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज अपनी विभिन्नता के चलते अपनी पहचान कायम किये हुए है वैसे ही हिमाचल के खान-पान की भी हर जिले की अपनी खास विशेषता है। खान-पान के संबंध में लाहुल के लोगों का आचार-व्यवहार हिमाचल प्रदेश के अन्य भागों के निवासियों से अनेक रूपों में भिन्नता लिए हुए है। यहां के लोगों का मुख्य आहार है काठु/कठु, जौ तथा मांस जो अनेक रूपों में वर्ष भर खाया जाता है। सब्जियों में ग्रीष्मकाल (मई से सितम्बर)में आलू तथा शलगम तथा शीतकाल (अक्तूबर से अप्रैल) में मांस का शोरवा विषेष रूप से प्रयोग में लाया जाता है। पेय पदार्थों में नमकीन चाय तथा लुगड़ी अथवा चकती का प्रमुख स्थान है। कठु को साबुत ही उबालकार व सुखाकर भून लिया जाता है। इसमें जौ के दाने डालकर तथा पीसकर छङ् के साथ भी खाया जाता है। जौ को भूनकर तथा पीसकर उसका आटा (सत्तू) बना लिया जाता है तथा फिर उसे मक्खन तथा हरी सब्जियों या मांस के साथ उबालकर सूप के रूप में खाया जाता है।

जौ को भूनकर तथा पीसकर बनाया जाता है सत्तू

जौ को भूनकर तथा पीसकर बनाया जाता है सत्तू

  • लोगों का प्रिय भोजन है युद या सम्पा
  • भोजनकाल व भोज्य पदार्थ

इस क्षेत्र में सभी जातियों तथा सभी धर्मों के लोग सामिष भोजी हैं। सत्तू (युद/विशी/सम्पा), विशी/सम्पा (गा.), कठु कठु की रोटियां (ल्वाड़), आलू तथा मांस यहां के सर्व सामान्य भोज्य पदार्थ हैं। अब गेहूं, चावल तथा सब्जियों, दालों आदि का भी प्रयोग किया जाने लगा है। सब्जियां तो अब यहां पर भी उगाई जाने लगी हैं किन्तु गेहूं और चावल का आयात अभी कल्लू, मनाली आदि से किया जाता है। लोग दिन में तीन बार भोजन करते हैं जो इस प्रकार हैं:

  • प्रातराश : इसे पट्टी में सुद तथा गारी में केन या छेमा कहा जाता है। इसमें मुख्य भोज्य पदार्थ होते हैं-ल्वाड़ (कठु के आटे की रोटियां) थुगपा (सब्जी या मांस के साथ पका हुआ सत्तू का घोल) अथवा दाल रोटी।
  • मध्याह्न का भोजन : इसे शोद या छिकेन कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से युद (प.), सम्पा (गा.) सत्तू, ल्वाड़ (मोटी-मोटी रोटियां), टुरेपल (चावल), बोती (लस्सी), छाती (मांस के शोरबे तथा सत्तू से निर्मित पदार्थ) का प्रयोग किया जाता है।
  • रात्रि भोज : इसे पट्टी में ह्याग तथा गारी में यांगङस-केन या गोङ्सल कहा जाता है। इसमें सामान्यत: ल्वाड्, उबले हुए चावल (टुर), छाती, उबले हुए आलू तथा सत्तू का उपयोग किया जाता है।

विभिन्न भोज्य पदार्थों की आधारभूत सामग्री तथा उनकी निर्माण प्रक्रिया ऊपर जिन भोज्य पदार्थों का नामोल्लेख किया गया है उनकी आधारभूत सामग्री का तथा उनकी निर्माण-विधि का रूप इस प्रकार है।

युद या सम्पा (सत्तू) : सत्तू यद्यपि अन्य अन्नों से भी बनाया जा सकता है, पर मुख्यत: यह जौ का ही बनाया जाता है। इसके लिए पहले जौ के दानों को एक्कर (प.) इस् (गा.) में हल्का-हल्का भून लिया जाता है फिर उन्हें साफ करके पनचक्की में ले जाकर पिसवा लिया जाता है। कुछ लोग उसे घरों में ही पत्थर की चक्की (लाखुर) हाथ से घुमाना में पीस लेते हैं। इसका प्रयोग भोजन के अतिरिक्त सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों आदि में किया जाता है। यह यहां के लोगों का प्रिय भोजन है तथा कई प्रकार से इसका उपयोग विभिन्न भोज्य पदार्थों के साथ किया जाता है।

ल्वाड़ : यह एक प्रकार की मोटी सी रोटी है। यह भी यहां एक विशिष्ट तथा प्रिय भोज्य पदार्थ है। इसे कठु (बक-ह्वीट) के आटे से तैयार किया जाता है। इसे बनाने की विधि यह है कि पहले आटे को छानकर एक बर्तन में घोल लिया जाता है। इस पात्र को पट्नी में ल्वा र्हेंज तथा गारी में ल्वार कुण्डङ् कहते हैं। इसके उपरांत उसमें खमीर पैदा करने के लिए थोड़ा सा खमीर वाला आटा डाल देते हैं क्योंकि खमीर बने बिना इसकी रोटी नहीं बन सकती है और यदि बनाई भी जाए तो वह कड़वी होती है। इस प्रकार खमीर युक्त घोल तैयार हो जाने पर फिर उसे एक कर्छी से तवे पर फैलाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि यह घोल लेसदार होने के कारण साफ तवे पर चिपक जाता है और कालिख के कारण उस पर चिपकता नहीं है।  अनेक भोज्य पदार्थ ऐसे हैं जो 2०-25 वर्ष पूर्व तक इस क्षेत्र में सामान्य रूप से प्रचलित थे, किन्तु अब बाहर से अन्य प्रकार के भोज्य पदार्थों के लिए पर्याप्त भोज्य सामग्री के सुलभ हो जाने तथा यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति में पर्याप्त उन्नति हो जाने के कारण इनका प्रयोग लुप्त होता जा रहा है। ऐसे ही कुछ पदार्थों का विवरण कुछ इस प्रकार से दिया जा सकता है:

टिशखोड़ी : कठु के छिलकों तथा जौ को पीसकर आटा बना लिया जाता है उसे गूंदकर मोटी रोटियां बनाई जाती हैं जिन्हें टिशखोड़ी कहा जाता है। इन्हें सब्जी, चटनी या नमकीन चाय के साथ खाया जाता है।

थुगपा

थुगपा

अकतौड़ी : कठु की हरी पत्तियों को पानी में उबाल कर उनमें कठु का आटा मिला लिया जाता है। इसमें नमक मिलाकर गूंद लिया जाता है और तवे पर रोटियों के रूप में पका लिया जाता है। इन्हें छाछ (लस्सी) के साथ खाया जाता है।

गङथुर : कठु, पत्तागोभी, शलगम आदि के हरे पत्तों को पानी में उबालकर घी, तेल अथवा भेड़-बकरी की चर्बी में छौंक लिया जाता है और आवश्यक मसाले भी डाल दिए जाते हैं। जब यह ठंडा हो जाता है तो इसमें पर्याप्त मात्रा में मठा डाल दिया जाता है। यह ल्वाड़ के साथ खाया जाता है।

कनी : चावलों को हरी पत्तियों वाली सब्जियों के साथ उबालकर घी, तेल या चर्बी से छोंककर आवश्यकतानुसार नमक, मिर्च मसाला खाया जाता है। इसमें लस्सी नहीं डाली जाती है।

डेगडेगछाती : उबलते हुए पानी में थोड़ा सा जौ का आटा मिलाकर उसे लकड़ी की पतली सीखों (सिल्की) से खूब चलाया जाता है। पक जाने पर इसमें नमक मिलाकर लिया जाता है। यह भी ल्वाड़ के साथ खाने के लिए बनाया जाता है। कभी-कभी इसे भी छोंक लिया जाता है। पर सामान्यत: बिना छोंके ही खाया जाता है।

फेम्प्रा : आटा, चावल तथा सब्जियों को उबालकर एक घोल सा बना लिया जाता है और इसमें नमक डालकर इसके साथ में ल्वाड़ खाये जाते हैं।

टुरछाती : पानी में थोड़े से चावल उबालकर उसमें आलू, सब्जी, पनीर आदि के टुकड़े डाल दिए जाते हैं। इसमें नमक, मिचे, मसाले मिलाकर छौंक लिया जाता है। यह भी ल्वाड़ के साथ खाने के लिए बनाया जाता है।

बोती कुलू : कठु के आटे को मटठे में उबालकर उसमें नमक मिला लिया जाता है। यह एक प्रकार से ल्वाड़ के स्थान पर चटनी, शोरबा या किसी भी घोल के साथ खाया जाता है।

छेम्पा कुलू : कठु के आटे को तथा जौ के सत्तू को गर्म पानी में डालकर पकाया जाता है। पकाते समय इसे लकड़ी की सीखों से चलाते रहते हैं। इसे खूब गाड़ा कर लिया जाता है और नमक मिलाकर लड्डू से बना लिए जाते हैं और मटठे के साथ खाये जाते हैं।

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