आधुनिकता की दौड़ में भी मिट्टी के बर्तनों का अपना महत्व

हिमाचल: गांवों में आज भी हाथों से बने “मिट्टी” के बर्तनों को ही प्राथमिकता

  • आधुनिकता की दौड़ में भी मिट्टी के बर्तनों का अपना महत्व
  • घरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का अपना ही स्थान
  • गांवों में आज भी हाथों से बनाई हुई वस्तुओं को ही प्राथमिकता
घरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का अपना ही स्थान

घरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का अपना ही स्थान

बदलते परिवेश में भले ही आधुनिक चीजों ने काफी जगह बना ली हो, परन्तु गांवों में आज भी हाथों से बनाई हुई वस्तुओं को ही प्राथमिकता दी जाती है। पहले जहां शहरों में हस्तकला लुप्त हो रही थी वहीं अब केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रदेश सरकार द्वारा इन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है और इनके संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई गई हैं जिससे गांव के साथ-साथ बड़े-बड़े शहरों में भी इन कारीगरों को अपनी पहचान मिलनी शुरू हुई है तो वहीं युवाओं के लिए रोजगार में भी एक अच्छा विकल्प है। समाज के सभी वर्गों का कर्तव्य होना चाहिए कि प्रदेश की इन दस्तकारी और हस्त कलाओं को महत्ता दें तथा बाहरी सामान को खरीदने की बजाए हाथ से बनी चीजों को तवज्जो देकर शिल्पकारों और कारीगरों को सम्मान दें। क्योंकि हिमाचल की कला-संस्कृति, शिल्पकारी, दस्तकारी विश्वभर में विख्यात है। इसको जीवित रखना व संजोए रखना हम सभी का दायित्व है। रसोई घर से लेकर पूजा स्थल हो या खेत-खलिहान, या फिर लोगों के पहनने के परिधान, हर जगह न केवल हिमाचल में ही बल्कि विश्व भर में यह कला और दस्तकारी अपना विशेष महत्व रखती है। इस लुप्त होती कारीगरी को जीवित रखने के लिए केन्द्र और प्रदेश सरकार के साथ-साथ हम लोगों को भी इसे सराहना चाहिए।

हिमाचल प्रदेश में विभिन्न प्रकार की कला और दस्तकारी की जाती है। यह कला और दस्तकारी लोगों की संस्कृति और परम्पराओं पर विस्तृत प्रकाश डालती है। समय के साथ-साथ दस्तकारी उद्योग लोगों का विरासती व्यवसाय बन गया। जीवन के भीतर तक जुड़ा होने के कारण और सदैव परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों से सम्बन्ध रखने के कारण इस उद्योग ने लोगों को प्रभावित किया। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, इतिहास तथा धार्मिक विश्वास ने हिमाचल प्रदेश की दस्तकारी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

  • मिट्टी के बर्तन बनाना
  • मिट्टी के बर्तन बनाना उतना ही पुराना जितना कि मानव उद्गम
  • ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के घड़े और अन्य बर्तन
  • विभिन्न आकारों में रंगों व कला से सजे हुए मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए कांगड़ा सबसे प्रसिद्ध

मिट्टी के बर्तन बनाना और टोकरियां बुनना उतना ही पुराना है जितना मानव उद्गम। नि:संदेह पूर्व मानव ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तन बनाने सीखे होंगे और इनका उपयोग किया होगा। मिट्टी के बर्तन बनाने की कला धीरे-धीरे परिपक्व होने लगी। हिमाचल प्रदेश में भी इसका प्रचलन होने लगा। प्रत्येक खण्ड अथवा क्षेत्र में मिट्टी के बर्तनों का भिन्न-भिन्न रूप है। यह स्थानीय परम्परा पर निर्भर करता है। प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के घड़े और अन्य बर्तन प्रयुक्त किए जाते हैं। कुम्हारों के गांव का अर्थ-व्यवस्था के साथ सम्बंध है। विभिन्न आकारों में रंगों तथा कला से सजे हुए मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए कांगड़ा सबसे प्रसिद्ध है। शापड़ा शिमला जिला की चौपाल तहसील का एक गांव है जो मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए प्रसिद्ध है। इसी तरह मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए सरकाघाट भी काफी मशहूर है।

कांगड़ा में मिट्टी के बर्तन प्राय: लाल रंग के बनाए जाते हैं जिन पर ब्राउन और सफेद रंग के आकर्षक डिजाइन बने होते हैं। प्रत्येक कुम्हार कुछ काले बर्तन भी बनाता है और इनकी बनावट साधारणत: एक सी होती है। काला रंग कच्चे बर्तनों में बन्नी करके दिया जाता है जो बर्तन के पकने पर निखर जाता है। बर्तनों को पकाने के लिए एक गड्ढा खोदकर बर्तन इसमें रख दिए जाते हैं। उनके चारों ओर चीड़ की छोटी लकडिय़ा रखकर उनमें आग लगा दी जाता है। उसके बाद गड्ढे को मिट्टी से ढक दिया जाता है।

  • घी तथा झोल रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है पारू

    घी तथा झोल रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है पारू

    घी तथा झोल रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है पारू

हिमाचल प्रदेश में एक सामान्य बर्तन होता है जिसे घड़ा, घड़ी या घड़ोली कहा जाता है। इसे पानी भरने और अनाज आदि रखने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। हांडकू (तिरकू भी कहा जाता है) एक छोटा बर्तन होता है। इसे घरों में घी, दूध और लस्सी आदि रखने के लिए प्रयोग किया जाता है। कांगड़ा में इसे गिदयां कहते हैं परन्तु सिरमौर में घी रखने के ऐसे बर्तन को घाली कहा जाता है। पारू हांडकू से भी छोटा बर्तन होता है और इसे भी घी तथा झोल आदि रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पातड़ी एक कटोरे की तरह होती है और इसे दही तथा मक्खन रखने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। नरेला हुक्के के रूप में चिल्लम तम्बाकू पीने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। कटोरियां, मिट्टी के दीपक झावां (पैरों को साफ करने के लिए) प्रयुक्त किया जाता है और फूलदान प्रमुख होते हैं। प्रदेश के प्रत्येक घर में आज भी ये पहले की भांति प्रयोग होते हैं। हालांकि आज कांसा, पीतल और स्टील का प्रचलन काफी है, फिर भी मिट्टी के बर्तनों का अपना ही स्थान है।

  • लाहौल-स्पीति और किन्नौर के मन्दिरों में मिट्टी से बनी बुद्ध की सुन्दर मूर्तियां

मिट्टी से खूबसूरत खिलौने, जैसे घोड़े, भेड़ें, कबूतर और अन्य बच्चों के खेलने की चीजें भी बनाई जाती हैं। मेलों और त्यौहारों के समय इन्हें बेचा जाता है। लाहौल-स्पीति और किन्नौर के मन्दिरों में बुद्ध की सुन्दर मूर्तियां मिट्टी की बनी हुई हैं। हिमाचल की ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था में कुम्हार लोगों की प्रतिदिन की आवश्यक्ताओं को पूरा करते हैं। विशेषकर शादी-विवाह, त्यौहारों, श्राद्धों आदि के अवसर पर वे घरों के लिए ईंटे और मिट्टी आदि की आपूर्ति करते हैं।

सम्बंधित समाचार

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *