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धार्मिक पर्यटन व आस्था का केंद्र “श्री नैना देवी जी”

पौराणिक सती कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने स्वयं को यज्ञ में जिंदा जला दिया था। इससे भगवान शिव बहुत व्यथित हो गए। उन्होंने सती के शव को अपने कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। तांडव नृत्य ने स्वर्ग में सभी देवताओं को भयभीत कर दिया, क्योंकि भगवान शिव का यह रूप प्रलय ला सकता था। देवताओं ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दें। श्री नैना देवी मंदिर वही जगह में है, जहां पर माता सती की आंखें गिरी थीं।
नैना देवी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है। पूरे भारतवर्ष में कुल 51 शक्तिपीठ  है । जिन सभी की उत्पत्ति कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इन सभी स्थलों पर देवी के अंग गिरे थे। यह कथा इस प्रकार है। कहा जाता है कि शिवजी के ससुर राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नहीं समझते थे। यह बात सती को काफी बुरी लगी और वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयीं। यज्ञ स्थल पर शिव का काफी अपमान किया गया जिसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कूद गयीं। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागों में बांट दिया जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया। मान्यता है कि नैना देवी में माता सती के नयन गिरे थे। इसीलिए इस मंदिर को नैना देवी के नाम से जाना जाता है। देवी सती ने स्वयं को यज्ञ में जिंदा जला दिया था। इससे भगवान शिव बहुत व्यथित हो गए। उन्होंने सती के शव को अपने कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। तांडव नृत्य ने स्वर्ग में सभी देवताओं को भयभीत कर दिया, क्योंकि भगवान शिव का यह रूप प्रलय ला सकता था। देवताओं ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दें। श्री नैना देवी मंदिर वही जगह में है, जहां पर माता सती की आंखें गिरी थीं।
एक अन्य कथा नैना नाम के लडक़े की है। कहा जाता है कि एक बार वह अपने मवेशियों को चराने गया तो देखा कि एक गाय अपने थनों से एक पत्थर पर दूध की धार गिरा रही है। उसने अगले कई दिनों तक इस दृश्य को देखा। एक रात जब वह सो रहा था, उसने देवी माँ को सपने में यह कहते हुए देखा कि वह पत्थर उनकी पिंडी है। नैना ने पूरी स्थिति और उसके सपने के बारे में राजा बीर चंद को बताया। जब राजा ने देखा कि यह वास्तव में हो रहा है, तब उसने उसी स्थान पर नैना देवी नाम के मंदिर का निर्माण करवाया।

नैना देवी मंदिर के प्रमुख त्यौहार

नैना देवी मंदिर में नवरात्र का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। वैसे भी आजकल  नैना देवी मंदिर में नवरात्रों की खूब धूम है। वर्ष में आने वाले दोनोंं नवरात्रि, चैत्र मास और अश्विन मास के नवरात्रों में यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आकर माता नैना देवी की कृपा प्राप्त करते हंै। माता को भोग के रूप में छप्पन प्रकार की वस्तुओं का भोग लगाया जाता है।   देवी सतीश्रावण अष्टमी को यहां पर भव्य व आकर्षक मेले का आयोजन किया जाता है। नवरात्रि में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दोगुनी हो जाती है। बाकि अन्य त्यौहार भी यहां पर काफी धूमधाम से मनाये जाते हैं। आजकल नवरात्रों के शुभ अवसरों पर दूर-दराज से भारी तादात में श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए आ रहे हैं। त्यौहारों के दौरान मंदिर में खूब रौनक लगी हुई है। मंदिर को भव्य रूप से सजाया गया है। नैना देवी के प्रमुख त्यौहारों पर यहां विशाल मेलों का आयोजन किया जाता है।

मंदिर स्थल पर महत्वपूर्ण स्थान

यह शानदार मंदिर संगमरमर से बनाया गया है। मंदिर का मुख्य दरवाजा चांदी से मढ़ा है जिसमें भगवान सूर्य की तस्वीरें और उस पर अन्य देवताओं प्रतिमाएं चित्रकारी द्वारा अंकित की गई हैं।
गुफा
श्री नैना देवी जी की गुफा 70 फीट लंबी है जो मुख्य मंदिर के पास स्थित है। श्रद्धालु श्री नैना देवी मंदिर के दर्शन करने के उपरांत इस गुफा के अंदर भी माता के दर्शनों करने के लिए जाते हैं।

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