सोलन: नौणी-जर्मनी शैक्षणिक साझेदारी से अनुसंधान एवं सहयोग को मिलेगा बढ़ावा
सोलन: नौणी-जर्मनी शैक्षणिक साझेदारी से अनुसंधान एवं सहयोग को मिलेगा बढ़ावा
नौणी विश्वविद्यालय और जर्मनी के विश्वविद्यालय के बीच शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग की पहल
सोलन: डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी तथा जर्मनी के वाइहेनस्टेफन-ट्राइज़डॉर्फ यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेज के बीच शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग को लेकर महत्वपूर्ण पहल की गई है। इसी सिलसिले में जर्मनी के प्रो. डॉ. डिट्रिच डार ने 20 और 21 अक्तूबर को नौणी विश्वविद्यालय का दौरा किया।दौरे के दौरान प्रो. डार ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एच.एस. बवेजा के साथ बैठक कर दोनों संस्थानों के बीच सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा की। इस दौरान विभिन्न शैक्षणिक एवं अनुसंधान गतिविधियों में साझेदारी को लेकर एक औपचारिक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। प्रो. डार ने अपने प्रस्तुतीकरण में दोनों विश्वविद्यालयों के बीच विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के आदान-प्रदान और संयुक्त अनुसंधान की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से खाद्य प्रौद्योगिकी, सतत विकास के प्रभावों के आकलन तथा आपूर्ति शृंखला प्रबंधन के क्षेत्रों में सहयोग की रुचि दिखाई। इस अवसर पर डॉ. के.के. रैना, वैज्ञानिक सलाहकार, डॉ. बी.एस. दिल्टा, ओएसडी (परियोजनाएं एवं योजना), डॉ. कपिल कथूरिया, विभागाध्यक्ष, कृषि व्यवसाय प्रबंधन विभाग, डॉ. पीयूष मेहता और डॉ. रश्मि चौधरी उपस्थित रहे।
प्रस्तावित सहयोग के तहत औद्यानिकी, वानिकी और इनसे जुड़े विषयों में शैक्षणिक कार्यक्रमों तथा अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा। जैव प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रौद्योगिकी, भू-दृश्य वास्तुकला तथा कृषि-खाद्य अर्थव्यवस्था जैसे विषयों में डुअल डिग्री कार्यक्रम शुरू करने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा।
कुलपति प्रो. बवेजा ने कहा कि नौणी विश्वविद्यालय के प्रस्तावित दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम को जर्मन विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सेमेस्टर कार्यक्रम से जोड़ने की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी। इससे विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन के नए अवसर मिलेगें। उन्होंने कहा कि भविष्य में पाठ्यक्रमों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु-अनुकूल कृषि, पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन, कृषि व्यवसाय, डिजिटल तकनीक तथा कौशल एवं उद्यमिता विकास जैसे विषयों को अधिक महत्व दिया जाएगा। व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योगों के साथ सहयोग से विद्यार्थियों को रोजगार, नवाचार और स्वरोजगार के लिए तैयार करने में मदद मिलेगी।
अनुसंधान के संभावित क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील बागवानी फसलें, हिमालयी जैव विविधता का संरक्षण, पर्यावरण-अनुकूल खेती, मधुमक्खी पालन एवं मधुमक्खी उत्पादों का चिकित्सकीय उपयोग, पारंपरिक ज्ञान, खाद्य प्रसंस्करण, वन संसाधनों का सतत प्रबंधन, कृषि वानिकी, औषधीय एवं सगंध पौधे तथा कीट एवं रोगों का एकीकृत प्रबंधन शामिल हैं।
इस साझेदारी से संयुक्त अनुसंधान, शोध प्रकाशनों, शिक्षक एवं विद्यार्थी आदान-प्रदान तथा अल्पकालिक शैक्षणिक कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे दोनों संस्थानों के बीच ज्ञान और विशेषज्ञता साझा करने के साथ-साथ कृषि एवं खाद्य प्रणालियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान की दिशा में भी काम किया जा सकेगा।