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बुलंद नारों की बुलंद दास्तां, हिली हुकूमत अंग्रेजों की, जब चले शब्दों के बाण

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” : स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से एक बाल गंगाधर तिलक का “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”

रहूँगा” का उद्घोष बेहद लोकप्रिय हुआ। आदर से लोग इन्हें “लोकमान्य” बुलाने लगे थे। उनके मतानुसार ‘स्वराज” भारतीयों का अधिकार है और ब्रिटिश सरकार को सत्ता भारतीयों को सौंप कर देश से चले जाना चाहिए। इसके लिए हक लड़कर भी लेना पड़े तो लिया जाएगा’। आजादी के महानायकों में से एक बाल गंगाधर तिलक ने संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पण कर दिया। जनजागृति के लिए उन्होंने अपनी पत्रकारिता की प्रतिभा का अद्भुत उपयोग किया। उनके दो समाचारपत्रों ‘मराठा’ और ‘केसरी’ ने लोगों को आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। तिलक ने अपने भाषणों और लेखों द्वारा जनता से आग्रह किया कि वह आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, निर्भय और निस्वार्थी बने। उन्होंने आम जनता में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करने के लिए शिवाजी पर्व और गणेश उत्सव की शुरुआत की।

अंग्रेजों भारत छोड़ो” : ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ मात्र एक नारा नहीं था, बल्कि एक आंदोलन था जिसका शंखनाद अहिंसा के प्रतीक महात्मा गांधी द्वारा किया गया था। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधी जी ने एक और बड़ा आंदोलन शुरू करने का निश्चय किया। इसको ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नाम दिया गया और यहीं से शुरुआत हुई ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे की। 9 अगस्त 1942 को आंदोलन की शुरुआत के साथ जब “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के नारे लगने लगे तब अंग्रेजों के हौसले बिल्कुल पस्त हो गए।

हालांकि, अंग्रेजों ने इस आन्दोलन के खिलाफ कड़ा रुख इख्तियार किया और आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी नीतियों का प्रयोग किया, लेकिन वे लोगों के हौसले को दबाने में असफल रहे। द्वितीय विश्व युद्ध में उलझने के कारण इंग्लैंड की ताकत और सत्ता की पकड़ में आई कमी को भांपते हुए एक ही समय पर, महात्मा गांधी द्वारा ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ तथा सुभाष चंद्र बोस द्वारा ‘दिल्ली चलो’ नारे दिए गए थे, जिन्होंने अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अंग्रेजों की ताकत को कमजोर करने में उम्मीद के मुताबिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

करो या मरो” : ‘करो या मरो’ का नारा भी गांधी जी द्वारा ही दिया गया था, जो भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम का ही एक हिस्सा था। 1942 में ‘बॉम्बे में अखिल भारतीय

“अंग्रेजों भारत छोड़ो”

“अंग्रेजों भारत छोड़ो”

कांग्रेस की बैठक को संबोधित करते हुए ‘करो या मरो’ की बात कही थी। उन्होंने कहा था – “एक मंत्र है, छोटा सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूं। उसे आप अपने हृद्य में अंकित कर सकते हैं और प्रत्येक सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। यह मंत्र है: ‘करो या मरो’। या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे, अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे।” यहीं से ‘करो या मरो’ वो नारा बना जिसने जनता में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी जला दी।

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” : स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में जब मुल्क अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मजबूती से खड़ा था और स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों को धूल-चटाने में जुटे थे, तब आजादी के एक और महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद फौज के गठन के साथ ही ब्रिटिश राज के खात्मे की पूरी तैयारी कर ली थी। 4 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद फौज के साथ बर्मा पहुंचने पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा दिया। इस नारे से ऐसी जनजागृति हुई कि लोगों का हुजूम आजादी के महासंघर्ष में कूद पड़ा।

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