अटूट आस्था व श्रद्धा के लिए विश्व विख्यात सराहन का "भीमाकाली मन्दिर"

अटूट आस्था व श्रद्धा का केंद्र सराहन का “भीमाकाली मन्दिर”

हिन्दू-बौद्ध शैलियों का संगम सराहन का "भीमाकाली मन्दिर"

हिन्दू-बौद्ध शैलियों का संगम सराहन का “भीमाकाली मन्दिर”

हिमाचल जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां बहुत से प्राचीन मंदिर हैं। हर मंदिर की अपनी खास महत्ता है। उन्हीं में से एक विश्वभर में प्रसिद्ध है सराहन का “भीमाकाली मन्दिर”। जहां इस मंदिर से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है वहीं पर्यटन की दृष्टि से भी यह मन्दिर काफी विख्यात है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त भीमाकाली मन्दिर में आकर माँ के चरणों में शीश झुकाता है उसे अपार शांति का अनभुव होता है और माँ उसकी हर दुःख तकलीफ दूर करती है।

मन्दिर परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव के अन्य महत्वपूर्ण मन्दिर

कहा जाता है कि राजाओं का यह निजी मन्दिर महल में बनवाया गया था जो अब एक सार्वजनिक स्थान है। मन्दिर के परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव (लांकडा वीर) के अन्य महत्वपूर्ण मन्दिर भी हैं। लांकडा वीर को मां भगवती का गण माना जाता है। यह पवित्र मन्दिर लगभग सभी ओर से सेबों के बागों से घिरा हुआ है और श्रीखण्ड की पृष्ठभूमि में इसका सौंदर्य देखते ही बनता है।

बुशहर राजवंश की देवी भीमाकाली में अटूट श्रद्धा

सराहन गांव बुशहर रियासत की राजधानी रहा है। इस रियासत की सीमाओं में पूरा किन्नर देश आता था। मान्यता है किन्नर देश ही कैलाश है। बुशहर राजवंश पहले कामरू से सारे प्रदेश का संचालन करता था। राजधानी को स्थानांतरित करते हुए राजाओं ने शोणितपुर को नई राजधानी के रूप में चुना। कल का शोणितपुर ही आज का सराहन माना जाता है। अंत में राजा रामसिंह ने रामपुर को राज्य की राजधानी बनाया। बुशहर राजवंश की देवी भीमाकाली में अटूट श्रद्धा है। सराहन में आज भी राजमहल मौजूद है।

सराहन में एक ही स्थान पर भीमाकाली के दो मंदिर हैं। प्राचीन मंदिर किसी कारणवश टेढ़ा हो गया है। इसी के साथ एक नया

 सराहन में एक ही स्थान पर भीमाकाली के दो मंदिर

सराहन में एक ही स्थान पर भीमाकाली के दो मंदिर

 हिंदू और बौद्ध शैली में बना है भीमाकाली मंदिर

मंदिर पुराने मंदिर की शैली पर बनाया गया है। यहां 1962 में देवी मूर्ति की स्थापना हुई। इस मंदिर परिसर में तीन प्रांगण आरोही क्रम से बने हैं जहां देवी शक्ति के अलग-अलग रूपों को मूर्ति के रूप में स्थापित किया गया है। देवी भीमा की अष्टधातु से बनी अष्टभुजा वाली मूर्ति सबसे ऊपर के प्रांगण में है। भीमाकाली मंदिर हिंदू और बौद्ध शैली में बना है जिसे लकड़ी और पत्थर की सहायता से तैयार किया गया है। पगोडा आकार की छत वाले इस मंदिर में पहाड़ी शिल्पकारों की दक्षता देखने को मिलती है। दिवारों पर लकड़ी की सुंदर छिलाई करके हिंदू देवी-देवताओं के कलात्मक चित्र बनाए गए हैं। फूल पत्तियां भी दर्शाए गए हैं। मंदिर की ओर जाते हुए जिन बड़े-बड़े दरवाजों से गुजरना पड़ता है उन पर चांदी के बने उभरे रूप में कला के सुंदर नमूने देखे जा सकते हैं। भारत के अन्य भागों की तरह सराहन में भी देवी पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है, विशेषकर चैत्र और आश्विन नवरात्रों में। मकर संक्रांति, रामनवमी, जन्माष्टमी, दशहरा और शिवरात्रि आदि त्योहार भी बड़े हर्षोल्लास व श्रद्धा से मनाए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि भीमाकाली की प्राचीन मूर्ति पुराने मंदिर में ही है। हर कोई उसके दर्शन नहीं कर सकता। हिमाचल प्रदेश के भाषा व संस्कृति विभाग के एक प्रकाशन के अनुसार बुशहर रियासत तो बहुत पुरानी है ही, यहां का शैल (स्लेट वाला पत्थर) भी अत्यंत पुराना है।भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार यह शैल एक अरब 80 करोड़ वर्ष का है और पृथ्वी के गर्भ में 20 किलोमीटर नीचे था।

सराहन के अमूल्य सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक भीमाकाली मंदिर

समुद्र तल से 2165 मीटर की ऊंचाई पर बसे सराहन गांव को प्रकृति ने पर्वतों की तलहटी में अत्यंत सुंदर ढंग से सुसज्जित किया है। सराहन को किन्नौर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। यहां से 7 किलोमीटर नीचे सभी बाधाओं पर विजय पाकर लांघती और आगे बढ़ती सतलुज नदी है। इस नदी के दाहिनी ओर हिमाच्छादित श्रीखण्ड पर्वत श्रृंखला है। समुद्र तल से पर्वत की ऊंचाई 18500 फुट से अधिक है। माना जाता है कि यह पर्वत देवी लक्ष्मी के माता-पिता का निवास स्थान है। ठीक इस पर्वत के सामने सराहन के अमूल्य सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक भीमाकाली मंदिर अद्वितीय छटा लिए स्थित है। राजाओं का यह निजी मंदिर महल में बनवाया गया था जो अब एक सार्वजनिक स्थान है। मंदिर के परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव (लांकड़ा वीर) के अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी हैं। लांकड़ा वीर को मां भगवती का गण माना जाता है। यह पवित्र मंदिर लगभग सभी ओर से सेबों के बागों से घिरा हुआ है और श्रीखण्ड की पृष्ठभूमि में इसका सौंदर्य देखते ही बनता है।

बुशहर राजवंश: सराहन गांव बुशहर रियासत की राजधानी रहा है। इस रियासत की सीमाओं में पूरा किन्नर देश आता था। मान्यता है किन्नर देश ही कैलाश है। बुशहर राजवंश पहले कामरू से सारे प्रदेश का संचालन करता था। राजधानी को स्थानांतरित करते हुए राजाओं ने शोणितपुर को नई राजधानी के रूप में चुना। कल का शोणितपुर ही आज का सराहन माना जाता है। अंत में राजा राम सिंह ने रामपुर को राज्य की राजधानी बनाया। बुशहर राजवंश की देवी भीमाकाली में अटूट श्रद्धा है। सराहन में आज भी राजमहल मौजूद है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार शोणितपुर का सम्राट वाणासुर उदार दिल और शिवभक्त था जो राजा बलि के सौ पुत्रों में सबसे बड़ा था। उसकी बेटी उषा को पार्वती से मिले वरदान के अनुसार उसका विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। परंतु इससे पहले अचानक विवाह के प्रसंग को लेकर वाणासुर और श्रीकृष्ण में घमासान युद्ध हुआ था जिसमें वाणासुर को बहुत क्षति पहुंची थी। अंत में पार्वती जी के वरदान की महिमा को ध्यान में रखते हुए असुर राज परिवार और श्रीकृष्ण में सहमति हुई। तदोपरांत पिता प्रद्युम्न और पुत्र अनिरुद्ध के वंशजों की राज परंपरा चलती रही। महल में स्थापित भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में से एक है। मत्स्य पुराण में भीमा नाम की एक मूर्ति का उल्लेख आता है। एक अन्य प्रसंग है कि मां पार्वती जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में सती हो गई थीं तो भगवान शिव ने उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया था। हिमालय में जाते हुए कई स्थानों पर देवी के अलग-अलग अंग गिरे। एक अंग कान शोणितपुर में गिरा और भीमाकाली प्रकट हुई। मंदिर के ब्राह्मणों के अनुसार पुराणों में वर्णन है कि कालांतर में देवी ने भीम रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भीमाकाली कहलाई। कहा जाता है कि आदि शक्ति तो एक ही है लेकिन अनेक प्रयोजनों से यह भिन्न-भिन्न रूपों और नामों में प्रकट होती है जिसका एक रूप भीमाकाली है।

कैसे जाएं

ठंडा, शीतल जलवायु वाला स्थान सराहन आज भी शायद देवी कृपा से व्यवसायीकरण से बचा हुआ है। तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को सुगमता से यहां ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। हिमपात के समय भले ही कुछ कठिनाइयां आएं अन्यथा भीमाकाली मंदिर में वर्ष भर जाया जा सकता है। शिमला से किन्नौर की ओर जाने वाले हिंदुस्तान-तिब्बत राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 22 पर चलें तो एक बड़ा स्थान रामपुर बुशहर आता है जहां से सराहन 44 कि.मी. दूर है। कुछ आगे चलने पर ज्यूरी नामक स्थान से सराहन के लिए एक अलग रास्ता जाता है। ज्यूरी से देवी मंदिर की दूरी 17 कि.मी. है।हिमाचल प्रदेश के रामपुर बुशहर से करीब 30 किलोमीटर आगे सराहन नाम की जगह है जहां पर भीमाकाली माता का सुप्रसिद्ध मंदिर स्थित है । रामपुर से 17 किलोमीटर के करीब ज्यूरी नामक कस्बा पडता है जहां से सराहन के लिये रास्ता कटता है । सराहन नाम की जगह दोनो तरह से श्रेष्ठ है ।

धार्मिक लिहाज से देखा जाये तो यहां पर काली माता का विख्यात और प्राचीन मंदिर है जो कि अपने आप में अनुठी शैली में तो है ही करीब 1000 से 2000 वर्ष पुराना भी माना जाता है। दूसरा यदि कोई हिल स्टेशन के रूप में देखे तो ये पहाड़ों में बहुत ही सुंदर जगह है जहां पर ठंडे मौसम के अलावा शांति और सुकून से एक दिन से लेकर एक हफते तक भी आप आराम से बिता सकते हो।

रामपुर बुशहर के राजाओं की प्राचीन राजधानी के रूप में भी जाना जाता है सराहन

हिंदू और बौद्ध शैली का मिश्रण है ये मंदिर। प्राचीन मंदिर केवल आरती या विशेष मौको पर ही खुलता है। नया मंदिर 1943 में बनाया गया था। इसी परिसर में भैरो और नरसिंह जी को समर्पित दो अन्य मंदिर भी हैं पहाडो की बैकड्राप इस मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती है। इस मंदिर को शक्तिपीठो में भी गिना जाता है जहां पर देवी सती का बांया कान गिर गया था। इस लिहाज से ये मंदिर काफी महत्वपूर्ण बन जाता है। शिमला से करीब 175 किलोमीटर पड़ती है ये जगह। आम प्रचलित हिल स्टेशनों के मुकाबले यहां पर काफी शांति और नैसर्गिक सुंदरता है। सराहन शहर को रामपुर बुशहर के राजाओं की प्राचीन राजधानी के रूप में भी जाना जाता है।

मन्दिर के परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव (लांकडा वीर) के अन्य महत्वपूर्ण मन्दिर भी हैं

मन्दिर के परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव (लांकडा वीर) के अन्य महत्वपूर्ण मन्दिर भी हैं

यादवों के शासन काल में बनवाया गया था मंदिर

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से 180 किलोमीटर दूर सराहन में व्‍यास नदी के तट पर स्थित है भीमाकाली मन्दिर, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह देवी तत्कालीन बुशहर राजवंश की कुलदेवी है जिसका पुराणों में उल्लेख मिलता है। यह मंदिर बेहद सुंदर है जहां कई भगवानों की मूर्ति को प्रर्दशित किया गया है। इस मंदिर को यादवों के शासन काल में बनवाया गया था। हर साल यहां बड़े स्‍तर पर काली पूजा की जाती है जिसमें लाखों लोग भाग लेते है।

एक पौराणिक गाथा के अनुसार शोणितपुर का सम्राट वाणासुर उदार दिल और शिवभक्त था जो राजा बलि के सौ पुत्रों में सबसे बडा था। उसकी बेटी उषा को पार्वती से मिले वरदान के अनुसार उसका विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। परन्तु इससे पहले अचानक विवाह के प्रसंग को लेकर वाणासुर और श्रीकृष्ण में घमासान युद्ध हुआ था जिसमें वाणासुर को बहुत क्षति पहुंची थी। अंत में पार्वती जी के वरदान की महिमा को ध्यान में रखते हुए असुर राज परिवार और श्रीकृष्ण में सहमति हुई। तदोपरान्त पिता प्रद्युम्न और पुत्र अनिरुद्ध के वंशजों की राज परम्परा चलती रही।

पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान: सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है वर्तमान भीमाकाली मन्दिर

महल में स्थापित भीमाकाली मन्दिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मन्दिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परन्तु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मन्दिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में से एक है। मत्स्य पुराण में भीमा नाम की एक मूर्ति का उल्लेख आता है। एक अन्य प्रसंग है कि मां पार्वती जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में सती हो गई थीं तो भगवान शिव ने उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया था। हिमालय में जाते हुए कई स्थानों पर देवी के अलग-अलग अंग गिरे। एक अंग कान शोणितपुर में गिरा और भीमाकाली प्रकट हुई। मन्दिर के ब्राह्मणों के अनुसार पुराणों में वर्णन है कि कालांतर में देवी ने भीम रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भीमाकाली कहलाई।

हिमाचल प्रदेश के भाषा व संस्कृति विभाग के एक प्रकाशन के अनुसार बुशहर रियासत तो बहुत पुरानी है ही, यहां का शैल

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से 180 किलोमीटर दूर सराहन में व्‍यास नदी के तट पर स्थित है भीमाकाली मन्दिर

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से 180 किलोमीटर दूर सराहन में व्‍यास नदी के तट पर स्थित है भीमाकाली मन्दिर

(स्लेट वाला पत्थर) भी अत्यंत पुराना है। भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार, यह शैल एक अरब 80 करोड वर्ष का है और पृथ्वी के गर्भ में 20 किलोमीटर नीचे था। ठण्डा, शीतल जलवायु वाला स्थान सराहन आज भी शायद देवी कृपा से व्यवसायीकरण से बचा हुआ है। तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को सुगमता से यहां ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। हिमपात के समय भले ही कुछ कठिनाइयां आयें अन्यथा भीमाकाली मन्दिर में वर्ष भर जाया जा सकता है। शिमला से किन्नौर की ओर जाने वाले हिंदुस्तान-तिब्बत राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 22 पर चलें तो एक बड़ा स्थान रामपुर बुशहर आता है जहां से सराहन 44 किलोमीटर दूर है। कुछ आगे चलने पर ज्यूरी नामक स्थान से सराहन के लिये एक अलग रास्ता जाता है। ज्यूरी से देवी मन्दिर की दूरी 17 किलोमीटर है।

वर्तमान में कोटशैली में बने पांच मंजिलों के दो भव्य भवन

भीमाकाली मंदिर अनेक विशिष्टताओं को अपने में समेटे हुए है जहाँ पर वर्ष भर लोगों का आना जाना लगा रहता है। मंदिर में वर्तमान में कोटशैली में बने पांच मंजिलों के दो भव्य भवन हैं। नए भवन की सबसे ऊपरी मंजिल में मूल प्रकृति आदि- शक्ति देवी कन्या रूप में पूजित है तथा उससे निचली मंजिल में सतीमाता का हिमालयपुत्री पर्वत रूप दिखाया गया है। अद्भुत पहाड़ी शैली में निर्मित इस मंदिर में कारीगरों की मेहनत तथा भव्य काष्ठशिल्प का हुनर देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में भगवान रघुनाथ , नरसिंह तथा पाताल भैरव (लंकड़ा वीर ) के अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी हैं। राजधानी शिमला से ठियोग, कुमारसैन, रामपुर से ज्यूरी होने के पश्चात लगभग 160 किलोमीटर की दूरी तय करने पर आप यहां सराहन पहुंच सकते हैं।

यात्रा का बेहतर समय मार्च से सितम्बर का

श्री भीमकाली मंदिर ट्रस्ट की बागडोर सरकार के हाथों में है तथा इसी ट्रस्ट के अंतर्गत अन्य 27 मंदिर भी आते हैं। यात्रियों की बेहतर सेवा के लिए सभी वस्तुएं इस स्थान पर आसानी से मिल जाती हैं और सबसे बेहतर यह है कि यहां पर प्राइवेट होटल्स के इलावा मंदिर परिसर की भी सरायं है जिसे यात्री बहुत कम पैसे में किराये पर ले सकते हैं। और यहां से श्रीखण्ड पर्वत की चोटी को निहार सकतें हैं। पर्वतों के ऊपर माँ का यह मंदिर अति सुन्दर दार्शनिक स्थल है। यात्रा का बेहतर समय मार्च से सितम्बर का माना गया है।

भीमाकाली मन्दिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं

एक जनश्रुति के अनुसार कहा कि मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवताओं की प्रार्थना पर दुर्गा अम्बा जी ने यह वचन दिया था कि पृथ्वी पर शुम्भ-निशुम्भ नामक दो दैत्यों को नाश करने हेतु नन्द की पति यशोदा माँ के गर्भ से अवतीर्ण होकर विंध्याचल पर्वत पर रहूंगी तथा उसके बाद अनेको अवतार लेती हुई हिमाचल भूमि पर भीम रूप में प्रकट हो कर ऋषि-मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का भक्षण अर्थात विनाश करूंगी और उस समय जब मुनिजन भक्ति- भाव से नतमस्तक हो कर जब मेरी स्तुति करेंगे तब मेरा नाम भीमा देवी रूप मैं विख्यात होगा। यही श्लोक श्री दुर्गा सप्तशती में भी अंकित है। इस वचन के अनुसार प्राणी मात्र की रक्षा के लिए माँ यहां की प्रमुख देवी के रूप में प्राचीनकाल से अटूट आस्था के साथ पूजित है।

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार देवी का स्थापना का संबंध बाणासुर से भी जोड़ती है। सराहन का प्राचीन नाम शोणितपुर माना जाता है जो की बाणासुर की राजधानी थी। बाणासुर दैत्यकुल में उत्पन भक्त प्रह्लाद के पोत्र दानवीर राजा बलि का ज्येष्ठ पुत्र था जिसकी हजार भुजाएं थी और यह अत्यंत पराक्रमी, बलशाली था। श्रीकृष्ण जी के हाथों युद्ध में इनकी केवल चार भुजाएं ही शेष रह गयी थी। परम शिवभक्त यह बाणासुर किन्नर – कैलाश जा कर आराधना किया करता था, यही वीर सतलुज को मानसरोवर से इस और लाया था। इससे पहले यह किन्नौर के शासक कामरु का मंत्री था, शोणितपुर पहुँच कर वह यहां रूकगे जहां इसने अपनी राजधानी बसाई। इसकी एक पुत्री थी उषा तथा उसकी एक सहेली थी चित्रलेखा। निचार का देवी उखा तथा तरंडा ढांक में माता चित्रलेखा का मंदिर इन दोनों पुराण पात्रों की अमित याद अंकित किये हुए हैं।

लोक आस्था है कि देवी उषा ने शिव पार्वती को प्रेमालाप करते हुए देख लिया था और उसे भी वैसा ही करने की सूझी। माँ पार्वती ने उसे वरदान देते हुए कहा कि जो व्यक्ति तुम्हें एक निश्चित रात्रि को स्वपन में दिखाई देगा वाही तुम्हारा पति होगा। बाणासुर की पुत्री को उस सुन्दर राजकुमार के दर्शन हुए जिसे देख कर वह बैचैन हो उठी। उसने जब यह बात चत्रलेखा जो की चित्रकला मैं बहुत निपुण थी उसने उषा के स्वप्न के अनुसार उस राजकुमार का चित्र अंकित किया जो की द्वारिकाधीश वासुदेव का पोत्र अनिरुद्ध था। उषा की उत्कंठा के अनुरूप योगविद्या मैं निपुण चित्रलेखा द्वारिका पहुंची और सोये हुए अनिरुद्ध को अपहरण कर शोणितपुर ले कर आई जहां उनका गन्धर्व विवाह करवा दिया।

देवऋषि नारद द्वारा यह सुचना जब द्वारिका पहुंची तब बलराम सेना सहित युद्ध के लिए आये जिसमे उनकी हार हुई तब स्वयं श्री कृष्ण ने आकर इनसे युद्ध किया जिसमे बाणासुर को हार माननी पड़ी। उसके बाद राज्य की बागडोर प्रद्युमन को सौंपी। इतिहास की इस दीर्घ यात्रा में शोणितपुर का नाम सराहन पड़ा बाद में दीर्घ काल तक बुशहर का राजवंश कामरु से ही चलता रहा। राजा छात्र सिंह के समय स्थाई रूप से काम्रो से इसे सराहन स्थान्तरित किया गया। राजवंश ने महल के अंदर ही देवी का मंदिर बना कर यहाँ इन्हे प्रतिष्ठित किया। और मूर्ति को यहां 200 वर्ष पूर्व ही प्रतिष्ठित किया गया, इस मूर्ती का निर्माण सराहन के साथ ही 1 किलोमीटर दूरी पर स्थित गमसोत की गुफा में किया गया था। मूर्ति की ऊंचाई लगभग 4 फुट है।

"भीमाकाली मन्दिर" दूर-दूर से मन्नत ले कर लोग आते हैं और मनचाही मुराद पूरी पाते हैं।

“भीमाकाली मन्दिर” दूर-दूर से मन्नत ले कर लोग आते हैं और मनचाही मुराद पूरी पाते हैं।

एक मत के अनुसार प्राचीनकाल में यह क्षेत्र पानी से पूरा भरा हुआ था। शिव और कूट नमक दो राक्षसों ने भगवान शिव को प्रसन्न कर यह वरदान लिया था की उनकी मृत्यु जल बहुल इलाके में नहीं होगी। ऐसे में यहां के स्थानीय यक्ष देवता जाख ने शिव से रक्षा की याचना की। भगवान शिव ने इन दोनों राक्षसों का वध अपने घुटनों पे उनका सर रख के किया और जख देवता को वरदान दिया की उनके घर भगवती जनम लेंगी। कालांतर में देवी ने जख देवता के घर में जनम लिया। शरीर के डीलडौल को देखते हुए उसका नाम भीमा रखा गया सांवले रंग होने के कारण उसे काली भी कहा जाने लगा। व्यवहार में आते- आते यह दोनों नाम एक हो गए।

एक विशेष बात यह है कि बहुत सालों पहले माँ को हर 10 साल बाद नर बलि दी जाती थी जिसे की बाद में शाली नामक स्थान से थोड़े दूर के गाँव के बदरा पंडित ने माँ से वचन लेकर बंद करवा दिया था और माँ की एक मूरत को अपने साथ शाली लेकर आया था। वहां पर भी इनका स्थान गाँव बधाया में है और मंदिर शाली नामक टिब्बे पर स्थित है। आज हम यह बात भली-भांति जानते हैं कि कभी भी क्षेत्र में किसी प्रकार की समस्या आती है या किसी को कुछ भी हो जाता है है स्वतः ही मुंह से महामाई का नाम निकल पड़ता है और माँ सब गलतियां माफ़ कर के अपने बच्चों की रक्षा के लिए सदा तैयार रहती है। दूर-दूर से मन्नत ले कर लोग आते हैं और मनचाही मुराद पूरी पाते हैं।

शिमला से सराहन की दूरी 180 किलोमीटर है। स्थानीय बस सेवा और टैक्सियां उपलब्ध है। हवाई रास्ते से शिमला तक पहुंचा जा सकता है। मन्दिर परिसर में बने साफ-सुथरे कमरों में ठहरने की व्यवस्था है। सरकारी होटल श्रीखण्ड में उपयुक्त दामों पर ठहरने की व्यवस्था और अन्य स्थान सराहन रिजॉर्ट्स आदि उपलब्ध हैं।

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