हरी भरी वादियों से दूर, बर्फ से ढके पर्वतों का नूर : किब्बर

हरी भरी वादियों से दूर, बर्फ से ढके पर्वतों का नूर : किब्बर

  • चमचमाती झीलें, बर्फ की चादर ओढ़े पर्वत, पर्यटकों को खींच लाते हैं किब्बर
  •   किब्बर विश्व का सबसे ऊंचा ‘शीत मरुस्थल’ गांव
चमचमाती झीलें, बर्फ की चादर ओढ़े पर्वत, पर्यटकों को खींच लाते हैं किब्बर

चमचमाती झीलें, बर्फ की चादर ओढ़े पर्वत, पर्यटकों को खींच लाते हैं किब्बर

प्रदेश के कई दुर्गम जनजातीय क्षेत्र हैं, लेकिन इन कई दुर्गम जनजातीय क्षेत्रों की

विश्व का सबसे ऊंचा 'शीत मरुस्थल' गांव : किब्बर

विश्व का सबसे ऊंचा ‘शीत मरुस्थल’ गांव : किब्बर

अपनी खास विशेषता है। इन्हीं में से एक है किब्बर। किब्बर हिमाचल प्रदेश के दुर्गम जनजातीय क्षेत्र स्पीति घाटी में स्थित एक गांव है। किब्बर को हिमाचल के सबसे ऊँचे गांवों में शुमार किया जाता है। यह गांव काफी उंचाई पर बसा है यानि एवरेस्ट की लगभग आधी उंचाई। इसे ‘शीत मरुस्थल’ के नाम से भी जाना जाता है। गोंपाओं और मठों की इस धरती में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। कभी घाटियों में फिसलती धूप देखते ही बनती है तो कभी खेतों में झूमती हुई फ़सलें मन को आकर्षित करती हैं। कभी यह घाटी बर्फ की चादर में छिप सी जाती है, तो कभी बादलों के टुकड़े यहांके खेतों और घरों में बगलगीर होते दिखते हैं। किब्बर की घाटी में कहीं-कहीं पर सपाट बर्फीला रेगिस्तान है तो कहीं हिमशिखरों में चमचमाती झीलें नजर आती हैं।

समुद्र तल से इतनी ऊंचाई पर स्थित किब्बर ग्राम में खड़े होकर ऐसा लगता है मानो आसमान अधिक दूर नहीं है। बस थोडा़ सा हवा में ऊपर उठो और आसमान छू लो। यहां खड़े होकर दूर-दूर तक बिखरी मटियाली चट्टानों, रेतीले टीलों और इन टीलों पर बनी प्राकृतिक कलाकृतियों से परिचित हुआ जा सकता है। लगता है कि इस धरती पर कोई अनाम कलाकार आया होगा जिसने अपने कलात्मक हाथों से इन टीलों को कलाकृतियों का रूप दिया और फिर इन कलाकृतियों में प्राण फूंककर यहां से विदा हो गया।

बादल तो यहां पर कम ही बरसते हैं पर बर्फ ज्यादा ही मेहरबान : यहां पर इसी वजह से थोड़े बहुत पर्यटक आ जाते हैं। बादल तो यहां पर

बादल तो यहां पर कम ही बरसते हैं पर बर्फ ज्यादा ही मेहरबान

बादल तो यहां पर कम ही बरसते हैं पर बर्फ ज्यादा ही मेहरबान

कम ही बरसते हैं पर बर्फ ज्यादा ही मेहरबान रहती है। इस गांव की अपनी एक छटा है ज्यादातर घर एक से बने हुए हैं गांव के प्रवेश करने की जगह पर एक गोल चक्कर सा बना है। यहां पर आने के रास्ते में शानदार गाटा लूप भी पड़ते हैं। काजा से कुछ किलोमीटर पहले एक पुल पड़ता है जिसे रंगरिक ब्रिज कहा जाता है।

तिब्बत के लिए पुराना रास्ता यहीं से

किब्बर यह संसार का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित गांव है। इसकी ऊंचाई 13444 फीट है। यहां का बौद्ध-मठ दर्शनीय है। यहीं से परांगल होते हुए तिब्बत को रास्ता है। किब्बर को लोग खाईपुर भी कहते हैं। तिब्बत के लिए पुराना रास्ता यहीं से जाता है। पैदल यात्रा से 18500 फुट की ऊंचाई पर स्थित पारगंला पास को पार करके यह रास्ता केलांग भी पहुंच जाता है।

विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित किब्बर– समुद्र तल से 4205 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित यातायात से जुड़े गांवों में से एक है। किब्बर गांव के ऊपर याकतिन छूलिंग बौद्ध लामा मंदिर है। यह सन् 1983 में बना था। यहीं पर

किब्बर गांव के ऊपर याकतिन छूलिंग बौद्ध लामा मंदिर

किब्बर गांव के ऊपर याकतिन छूलिंग बौद्ध लामा मंदिर

लामा गुरु सिकुंग दयंचक्र रिंबुछ की मृत्यु हुई थी। उसकी प्रतिमा बनाई गई है, जिसमें लामा की हड्डियां कूट-कूट कर भरी गई हैं। मूर्ति को सोने- चांदी और तांबे से सुसज्जित किया गया है। उस लामा ने एक बच्चे के रूप में जन्म लिया और वह बच्चा ताबो में शिक्षा ग्रहण कर रहा है। उसे लामा गुरु का अवतार माना गया है। जब दलाईलामा ताबो आए तो उन्होंने उस बच्चे को भावी धर्म का प्रचारक और गुरु बनने की भविष्यवाणी की। जिस लामा का मंदिर बना है वह 1983 में किब्बर के एक जमींदार लोभजंग छेरिंग के यहां ठहरा था। मान्यता है कि 1983 में लामा गुरु ने लरी गांव के एक परिवार में जन्म लिया था। किब्बर हिमाचल प्रदेश के दुर्गम जनजातीय क्षेत्र स्पीति घाटी में स्थित एक गाँव है। इसे ‘शीत मरुस्थल’ के नाम से भी जाना जाता है।

दुर्गम रास्ते, फिर भी किब्बर पहुँचने की चाहत : हिमाचल प्रदेश के इस गांव तक पहुंचना आसान नहीं है। कुंजम दर्रे को नापकर सैलानी स्पीति घाटी में दस्तक देते हैं। इसके बाद 12 किलोमीटर का रास्ता काफ़ी कठिन है, लेकिन ज्यों ही लोसर गांव में पहुंचते हैं, शरीर तरोताजा हो उठता है। स्पीति नदी के दायीं ओर स्थित लोसर, स्पीति घाटी का पहला गांव है। लोसर से स्पीति उपमण्डल के मुख्यालय काजा की दूरी 56 किलोमीटर है और रास्ते में हंसा, क्यारो, मुरंग, समलिंग, रंगरिक जैसे कई ख़ूबसूरत गांव आते हैं।

संस्कृति : काजा से किब्बर 20 किलोमीटर दूर है। यहां के लोग नाच-गाने के बहुत शौकीन हैं। यहां के लोक नृत्यों का अनूठा ही आकर्षण है। यहां की युवतियां जब अपने अनूठे परिधान में नृत्यरत होती हैं तो नृत्य देखने वाला मंत्रमुग्ध हो उठता है। ‘दक्कांग मेला’ यहां का मुख्य उत्सव है, जिसमें किब्बर के लोक नृत्यों के साथ-साथ यहां की अनूठी संस्कृति से भी साक्षात्कार किया जा सकता है।

किब्बर के लोगों का पहनावा निराला

खेती करतीं किब्बर की महिलाए

खेती करतीं किब्बर की महिलाए

किब्बर के लोगों का पहनावा निराला

किब्बर के लोगों का पहनावा निराला

किब्बर के निवासियों का पहनावा भी काफ़ी निराला है। औरतें और मर्द दोनों ही चुस्त पायजामा पहनते हैं। सर्दी से बचने के लिये पायजामे को जूते के अन्दर डालकर बांध दिया जाता है। इस जूते को ‘ल्हम’ कहा जाता है। इस जूते का तला तो चमड़े का होता है और ऊपरी हिस्सा गर्म कपड़े से निर्मित होता है। गांव की औरतों के मुख्य पहनावे हुजुक, तोचे, रिधोय व लिगंचे शमों हैं। सर्दियों में यहाँ की औरतें ‘लोम’, फर की एक ख़ूबसूरत टोपी पहनती हैं। इसे ‘शमों’ कहा जाता है। गांव के लोग गहनों के भी बहुत शौकीन होते हैं।

विवाह की परम्पराएं : किब्बर गांव में विवाह की परम्पराएं भी निराली हैं। प्राचीन समय से ही यहां विवाह की एक अनूठी प्रथा रही है। इस प्रथा के अनुसार अगर किसी युवती को कोई लड़का पसंद आ जाये तो वह युवती से किसी एकांत स्थल में मिलता है और उसे कुछ धनराशि भेंट करता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘अंग्या’ कहा जाता है। यदि लड़की इस भेंट को स्वीकार कर लेती है तो समझा जाता है कि वह विवाह के लिये राजी है। लेकिन यदि लड़की भेंट स्वीकार करने से इंकार कर दे तो यह उसकी विवाह के प्रति अस्वीकृति मानी जाती है

पहुंचने का मार्ग

किब्बर ग्राम में पहुंचने के लिये कुंजम दर्रे से होकर स्पीति घाटी

किब्बर ग्राम में पहुंचने के लिये कुंजम दर्रे से होकर स्पीति घाटी

किब्बर ग्राम में पहुंचने के लिये कुंजम दर्रे से होकर स्पीति घाटी पहुंचना होता है। इसके बाद 12 किमी का रास्ता बहुत कठिन है, लेकिन ज्यों ही लोसर ग्राम में पहुंचते हैं, शरीर ताजादम हो उठता है। स्पीति नदी के दाईं ओर स्थित लोसर, स्पीति घाटी का पहला ग्राम है। लोसर से स्पीति उपमंडल के मुख्यालय, काजा की दूरी 56 किमी. है और रास्ते में हंसा, क्यारो, मुरंग, समलिंग, रंगरिक जैसे जैसे कई सुंदर ग्राम आते हैं। काजा से किब्बर 20 किमी. दूर है। किब्बर में आकर जब पर्यटक यहां की प्राकृतिक छटा, अनूठी संस्कृति, निराली परंपराओं और बौद्ध मठों से परिचित होते हैं तो वे स्वयं को एक नई दुनिया में पाते हैं। किब्बर में एक बार की गई यात्रा की स्मृतियां जीवन भर के लिए उनके मानसपटल पर अंकित हो जाती हैं।

 

किब्बर की धरती पर बारिश का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं

किब्बर की धरती पर बारिश का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। बादल यहां आते तो हैं, लेकिन शायद ही वर्षा होती है। एक तरह से बादलों को सैलानियों का खिताब दिया जा सकता है, जो आते तो हैं लेकिन पर्वतों के दूसरी ओर रुख़ कर लेते हैं। यही वजह है कि किब्बर में बारिश हुए महीनों बीत जाते हैं। यहां के निवासी केवल बर्फ से ही साक्षात्कार करते हैं। बर्फ भी यहां इतनी अधिक होती है कि कई-कई फुट मोटी तहें जम जाती हैं। जब बर्फ पड़ती है तो किब्बर अपनी ही दुनिया में कैद होकर रह जाता है। गर्मियों में धूप निकलने पर बर्फ पिघलती है तो गांव सैलानियों की चहल-कदमी का केंद्र बन जाता है।

 

 

 

 

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