सेब को गहरा लाल रंग देने व अधिक दाम की चाहत में “एथेरल” का प्रयोग फलों के साथ-साथ पौधों के लिए भी खतरनाक : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

“एथेरल” का प्रयोग फलों के साथ-साथ पौधों के लिए भी हानिकारक : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

  • सेब बागीचों में अप्राकृतिक रूप से एथेरल का प्रयोग करने से बचें बागवान : बागवानी विशेषज्ञ
  • प्राकृतिक पक्के हुए फल पौष्टिक गुण, भंडारण क्षमता तथा पोषण तत्वों से भरपूर

गत कुछ वर्षों से सेब बागीचों में अप्राकृतिक रूप से एथेरल का प्रचलन आवश्यकता से अधिक देखने में आया है। जिसका मुख्य कारण मंडियों में सेब का अधिक लाल रंग की मांग का होना है। अधिक रंग की चाहत में सेब बागवान एथेरल जो पौध हारमोन है, कि अवांछित मात्रा प्रयोग करते हैं और कुछ बागवान सेब के फल का कुछ दाम भी प्राप्त करते हैं।

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

अन्य बागवान भी इसी चाहत में कि इन्हें भी सामान्य से अधिक मूल्य प्राप्ति होगी, की इच्छा से इस हार्मोन का प्रयोग करते हैं जो अवांछनीय व अनावश्यक है। भारतीय उपभोक्ता भी अनजाने में फलों का प्राकृतिक रंग के महत्व को लगभग भूलता जा रहा है और अत्याधिक रंग व चमक वाले फलों की भूल-भूलैया में फंसता जा रहा है बिना यह जाने कि फलों के इन रंगों का मनुष्य की चमड़ी के रंग का कोई योगदान नहीं है। संपूर्ण विश्व में किसी भी फल जिसमें सेब भी सम्मिलित है, के प्राकृतिक रंग को ही महत्व दिया जाता है आरै पंसद भी किया जाता है। प्राकृतिक पक्के हुए फल पौष्टिक गुण, भंडारण क्षमता तथा पोषण तत्वों से भरपूर होते हैं और अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं जो विभिन्न आवश्यक तत्वों, विटामिन तथा फाइबर की आपूर्ति करके रोगमुक्त रखते हैं।

  • समुद्रतल से बागीचे की ऊंचाई के आधार पर ही सेब की किस्मों का चयन करना जरूरी

सेब बागीचों में पर्याप्त रंग में विकास की कमी के मुख्य कारणों में पौधों में आवश्यकता से अधिक वनास्पतिक विकास का होना, पौधों में आपसी दूरी कम होना, अधिक फल लगने के कारण टहनियों की आपसी दूरी कम होना, समर प्रूनिंग न करना, कम रंग वाली किस्में, हवा के आदान-प्रदान में कमी, प्रकाश का पौधों के भीतरी भाग में कम पहुंचना, नत्रजन उर्वरक का अधिक उपयोग, तौलिए में खर-पतवार की सफाई न करना, पोटाटा, मैगनिशियम तथा कैलशियम की कमी होना भी है।

बागीचे की समुद्रतल से ऊंचाई के आधार पर सेब की किस्मों का चयन करना आवश्यक है निचले क्षेत्रों में अधिक रंग वाली किस्मों को प्राथमिकता दें तथा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मध्यम या कम रंग वाली किस्में लगाने से इस समस्या का निवारण हो जाता है।

सेब बागीचों में जहां प्रयत्न करने के पश्चात भी पर्याप्त रंग नहीं पनप पाया हो, में ही एथेरल को प्रयोग किया जाना चाहिए और वह भी जब फलों में कम से कम 30 प्रतिशत तक प्राकृतिक रंग आ गया हो। एथेरल की स्वीकृत मात्रा 500-600 मि.लि. प्रति 200 लिटर पानी में घोलकर छिडक़ें तथा इस घोल में किसी अन्य रसायन को न मिलाएं। इस घोल में केवल प्लैनोफिक्स 45 मि.लि. प्रति 200 लीटर पानी में मिलाएं जिससे फल झडऩे न पाए।

सेब बागीचों में अप्राकृतिक रूप से एथेरल का प्रयोग करने से बचें बागवान : बागवानी विशेषज्ञ

सेब बागीचों में अप्राकृतिक रूप से एथेरल का प्रयोग करने से बचें बागवान : बागवानी विशेषज्ञ

पौधों के तौलिए में दोरंगी प्लास्टिक शीट बिछाए जिसमें चांदीनुमा रंग ऊपर की ओर हो और काला रंग भूमि की ओर, इससे प्रकाश पौधों के आन्तरिक भागों में पहुंच पाएगा और रंग विकास में वृद्धि होगी।

एथेरल के प्रयोग से पत्तियां समयपूर्व पीली, साथ ही पौधों की गुणवत्ता भी होगी प्रभावित

  • एथेरल के प्रयोग से फलों में रंग विकास के साथ-साथ पत्तियां भी समयपूर्व पीली होकर गिर जाती है जिसके कारण बीमों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता और अगले वर्ष बीमों में कमजोर फूल व फल बनते हैं। पौधों में धीरे-धीरे फल की गुणवत्ता प्रभावित होती है और बहुत कम फल लगते हैं। इस पहलू पर अधिकतर बागवान ध्यान ही नहीं देते हैं।
  • लगातार प्रयोग से फल का स्वाद हल्का व कड़वा, फलों का भंडारण नहीं किया जा सकेगा
  • एथेरल के लगातार प्रयोग से फल का स्वाद हल्का व कड़वा हो जाता है, फलों में रस की मात्रा भी कम हो जाती है और कुछ समय बाद ही फल सडऩे  लगते हैं। ऐसे फलों का भंडारण नहीं किया जा सकता और इन्हें लंबी दूरी तक पहुंचाना भी कठिन हो जाता है।
  • इस छिडक़ाव के कारण पौधों के हरित पदार्थ जिसे क्लोरोफिल कहते हैं, में विघटन आरंभ हो जाता है और बीमों को पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन की पूरी प्राप्ति नहीं हो पाती, अत: वह कमजोर रहते हैं और फल उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • इस छिड़काव से पौधों में वनस्पतिक विकास कम होने के साथ-साथ आगामी वर्ष में नहीं हो पाता फूलों का पर्याप्त विकास
  • एथेरल द्वारा उपचारित फलों में थोड़े समय पश्चात ही रंग हल्का होना आरंभ हो जाता है और कई बार भूरे रंग में भी परिवर्तित हो जाता है।
  • इस छिड़काव से पौधों में वनस्पतिक विकास कम हो जाता है और ऑक्सीजन हारमोन का उत्पादन भी प्रभावित होता है तथा फूलों का पर्याप्त विकास आगामी वर्ष में नहीं हो पाता।

यह समझना आवश्यक है कि एथेरल हारमोन प्राकृतिक रूप से फलों में तब विकसित होना आरंभ होता है जब विकास लगभग पूरा हो गया है और यह धीरे-धीरे फलों की स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित करता है, इसकी 0.1-1.0 पीपीएम मात्रा, जो बहुत कम होती है, में प्रभावकारी है जो फलों को स्वभाविक रूप से आकर्षक, स्वादिष्ट व भंडारण योगयता से भरपूर क्षमता योगय बनाते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया में अनावश्यक बाधा डालकर फलों के उत्पादन व गुणवत्ता को प्रभावित करने की प्रक्रिया से बचना हितकर है। यह न केवल फल पौधों की आयु बढ़ाने में सहायक कदम होगा अपितु फल की गुणवत्ता को भी लंबी अवधि तक रखने में सक्षम होगा।

  • प्राकृतिक रंग द्वारा प्राप्त पैदावार ही बागवानी को सुदृढ़ बनाने में सक्षम

    एथेरल के प्रयोग से पत्तियां समयपूर्व पीली, साथ ही पौधों की गुणवत्ता भी होगी प्रभावित

    एथेरल के प्रयोग से पत्तियां समयपूर्व पीली, साथ ही पौधों की गुणवत्ता भी होगी प्रभावित

बागवानों को यह भी जानना आवश्यक है कि वे फल आढ़तियों, लदानियों व कीटनाशक-फफूंदनाशक विक्रेताओं के झांसे में न आएं। प्राकृतिक रंग द्वारा प्राप्त पैदावार ही बागवानी को सुदृढ़ बनाने में सक्षम होगी।

जम्मू-कश्मीर  सरकार द्वारा एथेरल के प्रयोग पर पाबंदी लगाई गई है। एफएसएसएआई (FSSAI) एक्ट-2006 रूल 2011 के अंतर्गत भी किसी प्रकार से कृत्रिम रूप से पकाए गए फलों पर रोक लगाई गई है।

प्राकृतिक रूप से पक्के फल देश के स्वास्थ्य व समृद्धि में अभिन्न योगदान देने में सक्षम हैं। यह सभी प्रबुद्ध बागवानों व उपभोक्ताओं को समझने की नितांत आवयश्यकता है।

 

 

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