"किन्नौर" किन्नर कैलाश की विशेष महत्ता के साथ संस्कृति, धर्म-परम्परा, रीति-रिवाज व पर्यटन के लिए भी विख्यात

“किन्नौर” किन्नर कैलाश की विशेष महत्ता के साथ संस्कृति, धर्म-परम्परा, रीति-रिवाज व पर्यटन के लिए भी विख्यात

  • मान्यता : किन्नर कैलाश केवल भगवान शिव का ही निवास स्थान नहीं, बल्कि यहां पर स्वर्ग का राज है

“किन्नौर”  शिव की धरती से जहां विख्यात है वहीं किन्नौर अपनी संस्कृति, धर्म-परम्परा, रीति-रिवाजों, कृषि-बागवानी, पशु-पालन व पर्यटन के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। वहीं हर तरह के कार्यों में महिलाओं की अपनी प्रमुख भूमिका होती है।

  • ऊंचे शिखर पर खड़ी एक अद्भुत चट्टान, जिसे मानते हैं भगवान शिव की प्रतिमा
  • देवताओं ने शिला को स्वयं स्वर्ग से लाकर किया यहां स्थापित
  • कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किन्नर कैलाश की परिक्रमा करना शुभ मानते हैं किन्नौरवासी

किन्नौरों की मान्यता है कि यह चट्टान भगवान शिव की प्रतिमा है। लोग सुबह उठकर इस शिला को श्रद्धा से प्रणाम करते हैं। संकट व दुख में शिव की कृपा हासिल करने के लिए घरों से लोग किन्नर कैलाश की तरफ भोग, पुष्प, जल व मदिरा अर्पित करते हैं। चट्टान रूपी इस शिला पर चढऩा अगम्य है। दूर-दूर से श्रद्धालु और ट्रैकर लोग यहां आकर इसकी परिक्रमा करते हैं। कहते हैं कि इस शिला को देवताओं ने स्वयं स्वर्ग से लाकर यहां पर स्थापित किया है। किन्नौर के लोगों की मान्यता है कि माघ मास में सभी देवता किन्नर कैलाश पर जाते हैं। वैसे तो जुलाई-अगस्त में कभी भी इसकी परिक्रमा की जा सकती है परन्तु किन्नौरवासी कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किन्नर कैलाश की परिक्रमा करना शुभ मानते हैं। इनका यह भी मानना है कि मरने के बाद मनुष्य की आत्मा किन्नर कैलाश जाती है। जिस व्यक्ति ने पुण्यकर्म किए हों, उसकी आत्मा को यहां पहुंचने में कोई कठिनाई नहीं होती, जबकि दुष्ट आत्माओं को यहां पहुंचने के लिए कठिनाइयों से जूझना पड़ता है।

  • “किन्नर कैलाश” कल्पा के ठीक सामने स्थित
  • रलदङ पर्वत के नाम से भी जाना जाता है किन्नर कैलाश

‘सांगला घाटी हरी-भरी है जिसमें हजारों पर्यटक घूमने आते हैं। किन्नौर में सांगला घाटी और किन्नर कैलाश बाहर के लोगों के लिए सदैव आकर्षण

“किन्नर कैलाश” कल्पा के ठीक सामने स्थित

“किन्नर कैलाश” कल्पा के ठीक सामने स्थित

के केंद्र रहे हैं। किन्नौर में किन्नर कैलाश की बहुत महत्ता है। किन्नर कैलाश कल्पा के ठीक सामने स्थित है। इसे रलदङ पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। किन्नौरी लोगों की मान्यता के अनुसार यह केवल भगवान शिव का ही निवास स्थान नहीं है, बल्कि यहां पर स्वर्ग का राज है, जहां से राजा इंद्र अन्य देवताओं के साथ राज करता है तथा पृथ्वीवासियों को सुख-समृद्धि प्रदान करता है। ऊंचे शिखर पर समुद्र तल से 6500 मीटर की ऊंचाई पर 72 फुट ऊंची एक अद्भुत चट्टान खड़ी है। यह चट्टान प्रात: से सायं तक अद्भुत रूप से कई रंग बदलती है। सूर्योदय पर इसका रंग गुलाबी होता है, दोपहर तक हिमश्वेत, सूर्यास्त के समय फिर गुलाबी और सूर्यास्त के बाद अपने असली चट्टानी रंग में आ जाती है।

  • निचले किन्नौर के लोग करछम से आरम्भ करते हैं रलदङ की परिक्रमा

किन्नर कैलाश की परिक्रमा करने को रलदङ कोरा कहा जाता है। डॉ. विद्यासागर नेगी का मानना है कि रलदङ की परिक्रमा निचले किन्नौर के लोग करछम से आरम्भ करके वहीं आकर पूर्ण करते हैं। कल्पा और इसके आसपास के लोग अपनी यात्रा पोवारी से आरम्भ करते हैं। रलदङ पर्वत के परिक्रमा पथ में किसी समय दोनों तरफ पांच-पांच गोपा थे, जिनमें से अधिकांश रखरखाव न होने के कारण जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं, कुछ के अवशेष मात्र रह गए हैं। इनमें चारंग का गोपा एक मंजिला व एक कक्षीय अभी भी सुरक्षित है। ठंगी से किन्नर कैलाश चलने पर पहला पड़ाव चारंग है। इन बौद्ध विहार में सुमा नाम की देवी रक्षिका की मूर्ति विरोचन के आसन से नीचे रखी गई कैलाश परिक्रमा करने वालों को आशीर्वाद देती दिखाई देती है। किन्नौर के लोग कैलाश परिक्रमा करने से पूर्व इसका दर्शन करना शुभ मानते हैं। बौद्ध लोग इन गोपाओं में दीपदान करते हैं। करछम शब्द कर और छम से बना है। कर मेमने और छम पुल को कहा जाता है। अर्थात करछम हुआ मेमने का पुल।

इस स्थान पर किसी समय बहुत छोटा पुल हुआ करता था। जिससे केवल मेमनों को पार किया जा सकता था। इसीलिए इसका नाम करछम पड़ा। करछम से किन्नर कैलाश की परिक्रमा करने के लिए पहले दिन करछम से मेबर, बारङ, तङलिङ, पोवारी, पुखनी होते हुए शाम को रिब्बा पहुंचते हैं। अगले दिन क्युवा, चाङ होते हुए ठंगी पहुंचते हैं। तीसरे दिन ठंगी से चलकर लम्बर, शुरतिङतिङ और कुनू होते हुए शाम को चारङ पहुंचते हैं। चौथे दिन चारङ से ललन्ति जोत पार करके शलप्पा आदि जगहों से होते हुए शाम को छितकुल पहुंचते हैं। अब ठंगी तक वाहन योगय मार्ग होने से ठंगी से ट्रैकर चलते हैं। ठंगी से चारङ 32 किलोमीटर तथा चारङ से ललन्ति तक 15 किलोमीटर सीधी चढ़ाई चढऩी पड़ती है। ललन्ति 5200मीटर की ऊंचाई पर है।

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