मनाली के देवदार जंगलों में बसा पैगोडा शैली का कलात्मक मंदिर "हिडिम्बा"

मनाली के देवदार जंगलों में बसा पैगोडा शैली का कलात्मक मंदिर “हिडिम्बा”

  • हिडिम्बा को कहा जाता है ढूंगरी देवी
  • हिडिम्बा को राजपरिवार मानता है अपनी दादी
हिडिम्बा को राजपरिवार मानता है अपनी दादी

हिडिम्बा को राजपरिवार मानता है अपनी दादी

हिडिम्बा मंदिर के बारे में हमने बहुत कुछ पढ़ा व सुना है। वास्तव में खुद वहां जाकर एक अद्भुत् अनुभूति  का जो अनुभव होता है वह वास्तव में अनोखा है। मनाली बाजार से करीब तीन किलोमीटर ऊपर देवदार के जंगल में बसा हिडिम्बा मंदिर है। अब मंदिर तक छोटे वाहन योगय सडक़ बन गई है, लेकिन पुराने समय में यह स्थान जंगल होने से डरावना रहा होगा। जंगलों के बीचोंबीच हिडिम्बा माता के मन्दिर का बहुत खूबसूरत और एक दम शांत से वातावरण कुछ देर के लिए आपको एक दूसरी ही दुनिया का अनुभव करवाता है। हिडिम्बा को ढूंगरी देवी कहा जाता है अत: इस स्थान का नाम ढूंगरी है।

  • चट्टान के बाहर पैगोडा शैली का कलात्मक मंदिर निर्मित
  • हिडिम्बा ने ही कुल्लू के प्रथम शासक विहंगमणिपाल को यहां का शासन बख्शा था
  • छह मास में ढूंगरी जातर
  • पैगोडा शैली का कलात्मक मंदिर  “हिडिम्बा”

मंदिर के भीतर एक चट्टान है जिसके नीचे देवी का स्थान माना जाता है। चट्टान अर्थात “ढूंग” के कारण ही इसे ढूंगरी देवी कहा जाता है। इस चट्टान के बाहर पैगोडा शैली का कलात्मक मंदिर निर्मित है। मंदिर में शिला पर महिषासुरमर्दिनी अंकित है स्थानीय परम्परा के अनुसार लाक्षागृह से पाण्डवों के वन गमन के समय भीम का विवाह हिडिम्बा से हुआ। इस पौराणिक आख्यान के साथ-साथ हिडिम्बा को राजपरिवार अपनी दादी मानता है। लोककथा के अनुसार हिडिम्बा ने ही कुल्लू के प्रथम शासक विहंगमणिपाल को यहां का शासन बख्शा था। अब भी कुल्लू दशहरा का आरंभ हिडिम्बा के रथ के आगमन के बिना नहीं हो सकता। यहां छह मास में ढूंगरी जातर लगती है। इस जातर में पहले भैंसा काटा जाता था। जे. कैलवर्ट ने अपनी पुस्तक दि सिलवर कण्ट्री” में भैंसा काटने का एक चित्र दिया है। अत: देवी का महिषासुरमर्दिनी रूप में जनमानस में रहा है।

  • वर्तमान मंदिर से पहले भी रहा है देवी का अस्तित्व

हिडिम्बा एक ऐसी देवी है जिसका मंदिर भी है जिसमें विधिवत पूजा होती है और रथ भी है जो उत्सवों के समय सजता है। प्राय: उन देवताओं के नित्यप्रति पूजा वाले मंदिर नहीं जिनके रथ बने हैं।

देवी के मोहरे (मास्क) में इसके राजा उद्धरणपाल के समय सन 1418 में बने होने का उल्लेख है। जबकि मंदिर के द्वार पर टाकरी के लेख के अनुसार पानी निर्माण राजा बहादुर सिंह (1546-1569) ने सन् 1553 में करवाया। अत: स्पष्ट है कि वर्तमान मंदिर से पहले भी देवी का अस्तित्व रहा है और देवी किसी न किसी रूप में, चाहे लोक देवी के रूप में ही सही पूजी जाती रही है।

  • वर्तमान मंदिर पैगोडा शैली और उत्कृष्ट काष्ठकला का आकर्षक उदाहरण
  • मंदिर का निर्माण पहाड़ी शैली में हुआ है परम्परागत ढंग से

वर्तमान मंदिर पैगोडा शैली और उत्कृष्ट काष्ठकला का आकर्षक उदाहरण है। मंदिर के प्रवेश द्वार पहुंचने के लिए सीढिय़ां हैं। सीढिय़ों के ऊपर समतल जगह में मंदिर निर्मित है। पैगोडा की तीनों ढलवां छतों पर लकड़ी लगायी गई है। सबसे ऊपर का हिस्सा शंकु की तरह है। पैगोडा नीचे ऊपर पतला होता गया है। गर्भगृह के बाहर प्रज्ञक्षेणा पथ बरामदे में है। मंदिर का निर्माण पहाड़ी शैली में परम्परागत ढंग से हुआ है। देवदारों के शहतीरों के भीतर लगाए गए हैं। दीवारों मिट्टी का पलस्तर और गोबर की पुताई हुई है। निचली मंजिल में गर्भगृह के बाहर बरामदा है।

  • द्वार पर लगा है सिंह मुख का कुंडा

दक्षिणेश्वर महादेव निरमंड की भांति इस मंदिर के द्वार पर भी उत्कृष्ट नक्काशी हुई है। द्वार पर सिंह मुख का कुंडा (हैण्डल) लगा है। द्वार के ऊपर बारहसिंगा भेडे भांति व सींग लगाए गए हैं जिनकी यहां बलि दी गई होगी। दरवाजे की द्वारसाखों पर ऊपर तथा नीचे दोनों और सुंदर नक्काशी है। द्वार के निचले भाग में एक ओर महिषासुरमर्दिनी और दूसरी ओर दुर्गा अंकित है। सामने दोनों ओर साधक खड़े हैं। गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण के चित्र भी काष्ठ में उकेरे गये हैं। इन पट्टिकाओं को फूल-पत्रों को आकर्षण बनाया गया है। प्रवेश द्वार के मध्य में गणेश प्रतिमा के साथ नवग्रह, नृत्य करते हुए गन्धर्व चित्रित हैं। कृष्ण लीला के कुछ चित्र भी पट्टिका में अंकित है। द्वार की पट्टिकाओं पर घुड़सवार और उपासक के चित्र भी अंकित हैं जो राजा बहादुर सिंह के हो सकते हैं।

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