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इतिहास: कुल्लू दशहरे का आरम्भ देवी हिडिम्बा के आगमन के बिना सम्भव नहीं

हिमाचल इतिहास: कुल्लू दशहरे का आगाज देवी हिडिम्बा के आगमन बिना सम्भव नहीं

सात दिवसीय आयोजन

अब आरम्भ होता है विजयदशमी का सात दिवसीय आयोजन। रघुनाथ जी अपने कैम्प में रहते हैं। राजा को अपने कैम्प में रहना होता है। राजा के कैम्प में महाराज के सब निशान पंखे, छत्र आदि रखे जाते हैं। प्रतिदिन नृसिंहजी को भोग लगता है। उधर रघुनाथ जी के कैम्प में नित्य पूजा-अर्चना चलती रहती है। भजन-कीर्तन होता है।

देवी हिडिम्बा

सब देवता अपने स्थान में बैठते हैं। नाचते हैं। दिन में, रात में ग्रामीण अपने देवता के चारों ओर नाचते हैं। रात-रात भर नृत्य चलता रहता है। दिन में कभी भविष्यवाणी होती है कभी श्रद्धालु मनौतियां मनाते हैं। भविष्य पूछते हैं। देवता अपनी इच्छा से मेले में घूमता है, दूसरे देवता से मिलने जाता है। कई बार समीपस्थ ग्रामवासी देवता को अपने यहां आमंत्रित करते हैं। कुछ देवता, देवियां, नाग इक्टठे हो-होकर नाचते हुए चलते हैं। कई बार ऐसा भी देखने में आया कि एक देवता अपने टैंट में चुप बैठता है कि अचानक उसे उठाने वाले तेजी से उठते हैं और देवता भागता हुआ दूर निकल जाता है। दूसरे देवता के आने पर भी देवता उठकर उसका स्वागत करता है।

देवताओं के इस तरह भागने-दौडऩे, एक दूसरे से गले मिलने, नमस्कार करने की क्रिया में कहा जाता है कि देवता को उठाने वालों पर देवता स्वत: भार डालता है। इस भार के प्रभाव से उठाने वाले भागते हैं, रूकते हैं, झुकते हैं या बैठते हैं।

प्रतिदिन सायं नृसिंह जी की घोड़ी और राजा रूपी पालकी में बैठ निश्चित रास्ते से मेले की परिक्रमा करते हैं। इसके साथ दो-तीन देवता व बाजा चलता रहता है।

लंका दहन

अंतिम दिन होता है लंका दहन। दोपहर बाद राजा का शामियाना कला केन्द्र के सामने लगता है,  जहां राजा कुछ समय तक बैठता है। यहां भी कुछ देवता साथ होते हैं और नृत्य होता है। फिर रघुनाथ जी के बुलावे पर राजा कला-केन्द्र के पहले गेट से होकर रघुनाथ जी के कैम्प में हाजिर होता है। सायंकाल राजा के कैम्प में बलियों का पूजन होता है और निश्चित समय पर रघुनाथ जी का रथ पुन: चल देता है नीचे की ओर रावण को मिटाने।

मैदान के निचले छोर पर व्यास के किनारे झाडिय़ां एकत्रित की होती हैं, जिन पर रावण का मुखौटा रखा जाता है। इसे ही लंका समझा जाता है। वास्तव में पहले इस स्थान पर व्यास का पानी दो धाराओं में बंट जाता था और बीच में टापू लंका समझा जाता था। यहां राजा अपनी छड़ी हडमानी बाग के महंत के पास देता है। फिर तीर निकालकर कोठी लग या सारी के किसी आदमी को दिए जाते हैं। वह आदमी तीर रावण को लगाकर राजा को वापस कर देता है। राजा इन तीरों को रघुनाथजी को सौंपता है जिसके बदले रघुनाथजी की ओर से बगा-साफा दिया जाता है। जिस समय तीर मारकर रावण व लंका जलाई जाती है, उसी समय पांच बलियां-भैंसा, भेड़ा, सुअर, मुर्गा तथा केंकड़ा की दी जाती है। इस कृत्य में देवी हिडिम्बा भी उपस्थित रहती है। भैंसे का सिर देवी के आदमियों के सम्मुख पेश किया जाता है। जो आदमी जलती लंका से रावण का मुखौटा उठा लाता है उसे भी इनाम दिया जाता है।

इस कृत्य में पंचबलि के सम्बंध में ऐसा विश्वास है कि ये प्रथा राजमहल में काली के आगमन पर आरम्भ की गई, उससे पूर्व सम्भवत: बलियां न दी जाती हों। यद्यपि दशहरे पर भैंसे की बलि देना आश्चर्यजनक नहीं है, अन्य संस्कृतियों में भी यह प्रथा विद्यमान है। हिडिम्बा के मंदिर में भी भैंसे की बलि दी जाती थी। जे. कैलवर्ट ने अपनी पुस्तक द सिलवर कण्ट्री में हिडिम्बा के मंदिर में एक ऐसे कृत्य का चित्र दिया है जिसमें भैंसे की बलि दी जा रही थी (यद्यपि चित्रकार ने भैंसे को बैल जैसा बनाया है)। कैलवर्ट ने 1869 के हिडिम्बा मंदिर में हुए उत्सव की चर्चा की है जिसमें भैंसा तथा सौ भेड़ें बलि किए गए थे।

लंका-दहन के पश्चात पुन: यात्रा मुड़ती है। उधर से सीताजी की मूर्ति कैम्प से लाकर रथ में बिठा दी जातीं हैं, जैसे अब इन्हें लंका से लाया गया हो। अब होता है विजय का उल्लास। आगे-आगे रघुनाथजी। कुछ दूर पर नृसिंहजी व राजा। पुन: रथ मैदान के सिरे पर खड़ा कर दिया जाता है। रघुनाथ को छोटी पालकी में बिठा सुलतानपुर ले जाया जाता है। कुछ देवता उनके साथ सुलतानपुर तक जाते हैं, अधिकतर उसी समय अपने-अपने स्थानों को लौट जाते हैं।

साभार: सुदर्शन वशिष्ठ जी

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