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धार्मिक पर्यटन “श्री नैना देवी”

नैना देवीहिमाचल प्रदेश जिसे देव भूमि कहा जाता है यहां बहुत से देवी-देवताओं का वास है। यहां की खास बात यह है कि यहां बहुत से देवी-देवताओं के कई पूजनीय तीर्थ स्थल हैं जहां दूर-दूर से भारी तादात में कई राज्यों व देश-विदेश से श्रद्धालु आकर शीश नवाते हैं। देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में इन देवी-देवताओं के दर्शन करके एक ओर जहां श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं वहीं उनके मन को अपार शांति भी मिलती है। इतने वर्ष बीत जाने के बाद आज भी लोगों का देवी-देवताओं पर अपार विश्वास है क्योंकि यहां आने पर देवी-देवताओं का आशीर्वाद व दर्शन मात्र से उन्हें मानसिक शांति का अनुभव होने लगता है। इसीलिए  न केवल दूसरे देशों से बल्कि विदेशों से भी काफी तादात में श्रद्धालु यहां धार्मिक स्थलों में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। प्रदेश के हर धार्मिक स्थल की एक अपनी पौराणिक कथा है अपना एक विशेष महत्व है। इसी के चलते लोगों की बहुत सी मान्यताएं और विश्वास इन धार्मिक स्थलों से दिल की गहराई से जुड़ी हैं। ऐसा ही एक धार्मिक पर्यटन स्थन हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला में स्थित श्री नैना देवी मंदिर है। यह मंदिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला में स्थित है। कई पौराणिक कथाएं इस मंदिर की स्थापना के साथ जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। श्री नैना देवी मंदिर महाशक्ति पीठ के नाम से भी प्रसिद्ध है क्योंकि यहां पर माँ नैना देवी जी ने दैत्य महिषासुर का वध किया था।
नैना देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में है। यह शिवालिक पर्वत श्रेणी की पहाडिय़ों पर स्थित एक भव्य मंदिर है। यह देवी के 51 शक्ति पीठों में शामिल है। नैना देवी हिंदूओं के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यह स्थान राष्ट्रीय उच्च मार्ग-21 से जुड़ा हुआ है। इस स्थान तक पर्यटक अपने निजी वाहनों से भी जा सकते है। मंदिर तक जाने के लिए उडऩ खटोले, पालकी आदि की भी व्यवस्था है। यह समुद्र तल से 3535 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर में पीपल का पेड़ आकर्षण का मुख्य केन्द्र है जो कि अनेकों शताब्दी पुराना है। मंदिर के मुख्य द्वार के दायीं ओर भगवान गणेश और हनुमान की मूर्ति है। मुख्य द्वार के पार करने के पश्चात आपको दो शेर की प्रतिमाएं दिखाई देंगी। शेर माता का वाहन माना जाता है। मंदिर के गर्भ ग्रह में मुख्य तीन मूर्तियां हंै। दांई तरफ माता काली की, मध्य में श्री नैना देवी की और बांई ओर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थित है। पास ही में पवित्र जल का तालाब है जो मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। मंदिर के समीप में ही एक गुफा है जो कि 7० फीट लंबी है।  जिसे नैना देवी गुफा के नाम से जाना जाता है। पहले मंदिर तक पहुंचने के लिए 1.25 कि.मी. की पैदल यात्रा की जाती थी परन्तु अब मंदिर प्रशासन द्वारा मंदिर तक पहुंचने के लिए उडऩ खटोले का प्रबंध किया गया है।

देवी की उत्पत्ति कथा
दुर्गा सप्तशती और देवी महात्यमय के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच में सौ वर्षों तक युद्ध चला था। इस युद्ध में असुरों की सेना विजयी माँ नवरात्रे हुई। असुरों का राजा महिषासुर स्वर्ग का राजा बन गया और देवता सामान्य मनुष्यों की भांति धरती पर विचलण करने लगे। तब पराजित देवता ब्रहमा जी को आगे करके शिवजी, भगवान विष्णु के पास गये और उन्हें सारी कथा सुनाई। यह सुनकर भगवान विष्णु, शिवजी ने बड़ा क्रोध किया। उस क्रोध से विष्णु, शिवजी के शरीर से एक-एक तेज उत्पन्न हुआ। भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख, विष्णु के तेज से उस देवी की बाहेें, ब्रहमा के तेज से चरण तथा यमराज के तेज से बाल, इन्द्र के तेज से कटि तथा अन्य देवता के तेज से उस देवी का शरीर बना। फिर हिमालय ने सिंह, भगवान विष्णु ने कमल, इंद्र ने घंटा तथा समुद्र ने कभी न मैली होने वाली माला प्रदान की। तभी सभी देवताओं ने देवी की आराधना की ताकि देवी प्रसन्न हो और उनके कष्टों का निवारण हो सके और हुआ भी ऐसा ही। देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को वरदान दे दिया और कहा मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूंगी। इसी के फलस्वरूप देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध प्रारंभ कर दिया। जिसमें देवी की विजय हुई और तभी से देवी का नाम महिषासुर मर्दनी पड़ गया।

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