विजय दिवस: कारगिल शहीदों को शत-शत नमन

विजय दिवस: कारगिल शहीदों को शत-शत नमन

 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है। इसी दिन 1999 में भारत ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर जीत का परचम लहराया था। इस दौरान फौज ने तमाम मुश्किलों के बीच बहादुरी और जांबाजी की अनोखी मिसालें पेश की थीं। इन्हीं में से एक फौजी थे, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव। कारगिल के टाइगर हिल पर यादव ने 19 गोलियां खाने के बावजूद चार दुश्मनों को ढेर कर दिया। उन्होंने दुश्मनों पर हथगोला फेंका, जिससे उनमें खलबली मच गई और वे टाइगर हिल से भाग गए। योगेंद्र ने पहाड़ी से नीचे उतरकर अपने साथियों को दुश्मनों की सटीक जानकारी दी। उसके बाद भारत ने टाइगर हिल पर कब्जा किया। ऐसे ही जांबाजों के तजुर्बे पर नजर डालिए:

योगेंद्र सिंह यादव: शादी के 15 दिन बाद चले गए दुश्मनों के दांत खट्टे करने

वर्ष 1999 की है। मैं अपने नई जिंदगी की शुरुआत कर रहा था। पांच मई, 1999 को मेरी शादी थी। शादी के लिए अपने गांव गया था। 20 मई को जम्मू वापस ड्यूटी पर लौटा, तो पता चला कि मेरी बटालियन कारगिल कूच कर गई है। हमें जंग के मैदान से खबरें मिल रही थीं। हमारे कई जवान शहीद हो चुके थे। इसी दौरान टाइगर हिल पर फतह करने के लिए ‘घातक’ टुकड़ी बनाई गई। मुझे भी इस टुकड़ी में शामिल किया गया। सबसे अच्छी बात यह थी कि मुझे इस टुकड़ी में सबसे आगे चलने का मौका मिला।

72 घंटे तक आधा बिस्कुट खाकर गुजारा किया

दो जुलाई को हमने टाइगर हिल के लिए चढ़ाई शुरू की। हम पांच जुलाई को इस पहाड़ी पर चढ़ गए। रास्ता बहुत मुश्किल था, बर्फीली आंधी चल रही थी। 72 घंटे तक आधा बिस्कुट खाकर गुजारा करना पड़ा। हम आगे बढ़ रहे थे, तभी दुश्मन सेना ने हमारे ऊपर फायरिंग शुरू कर दी। दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई। दुश्मन सेना के आठ जवान मारे गए। हम सिर्फ सात जवान थे। जब दुश्मन टुकड़ी थोड़ा करीब आई, तो उसे पता चल गया कि हम सिर्फ सात हैं। उन्होंने लौटकर अपने कमांडर को इसकी जानकारी दी। उन्होंने अपनी रणनीति बदली। आधे घंटे बाद उन्होंने नारेबाजी शुरू कर दी। हमने तय किया कि जब वे थोड़ा करीब आएंगे, तो हम फायर करेंगे। हमारे पास गोली-बारूद की कमी होने लगी थी। नीचे से सप्लाई नहीं आ पा रही थी। दोनों तरफ से फायरिंग जारी थी। जंग में हमारे छह साथी शहीद हो गए। वे खुद तो हमेशा के लिए सो गए, पर शहीद होने से पहले उन्होंने दुश्मन सेना के 35 सैनिकों को मार गिराया।

मेरे साथियों के शवों को बूटों से धक्का दिया

मेरे शरीर से खून बह रहा था, मैं गंभीर रूप से घायल था। साथियों के शव चारों तरफ पड़े थे। तभी दुश्मन सेना के सैनिक वहां आए। हमारे शहीदों के शवों पर वे दोबारा गोलियों की बौछार करने लगे। उन्होंने हमारे शहीदों के शवों को बूट से धक्का दिया। वे हमें गालियां भी दे रहे थे। मैंने उन्हें बात करते सुना। उनके अफसर ने हमारी चौकी को तबाह करने का आदेश दिया था। मैं चुपचाप पड़ा रहा। उन्हें एहसास भी नहीं हुआ कि मैं जिंदा हूं। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी कि मुझे बस इतनी देर के लिए जीवित रखो ताकि मैं नीचे चौकी तक जाकर अपने साथियों को दुश्मन के इरादों की जानकारी दे सकूं।

एक हाथ बेकार होने पर भी दुश्मनों पर फेंक दिया हथगोला

दुश्मन हमारी राइफलें लेकर भागे। मेरे पास एक हथगोला बचा था। मैंने दुश्मनों पर हथगोला फेंक दिया। उसके फटते ही दुश्मनों में खलबली मच गई। उन्होंने कहा कि नीचे से भारतीय फौज आ गई, पर किसी ने कहा कि शायद सात में से कोई जवान जीवित बच गया हो। तभी मैंने पास में पड़ी एक राइफल देखी। मेरा एक हाथ बेकार हो चुका था, मैंने दूसरे हाथ से राइफल उठाई और उनके चार जवानों को मार गिराया। मैंने उठने की कोशिश की और घूमकर चारों तरफ से फायरिंग कर दी। उन्हें लगा कि नीचे से फौज आ गई है। वे भाग गए।

टाइगर हिल फतह

मैंने अपने साथियों के शवों को गौर से देखा, मुझे लगा कि शायद इनमें से कोई जिंदा बचा हो। वे सब शहीद हो चुके थे। मैंने नीचे की चौकी पर पहुंचने का फैसला किया, ताकि दुश्मनों के इरादे विफल कर सकूं। मैं एक नाले के सहारे नीचे लुढ़क गया, यह सब काफी मुश्किल था। नीचे आते ही मैंने अपने कुछ साथियों को देखा। मैंने कमांडर को आवाज दी। मेरा एक हाथ टूट गया था, पूरी पोशाक चिथड़े-चिथड़े हो चुकी थी। मेरी हालत देखकर उन्हें लगा कि मैं बच नहीं पाऊंगा। मैंने उनसे कहा, सर यहां हमला होने वाला है। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना सीओ को दी। मेरा फर्स्ट एड (प्राथमिक इलाज) हो चुका था, लेकिन खून बहना जारी था। सीओ साहब के पास पहुंचने तक शाम के सात बज चुके थे। उस समय मैं बोल पा रहा था, लेकिन आंखों से कुछ दिख नहीं रहा था। मैं अपने अधिकारी को पहचान नहीं पाया। पर मैंने उनको ऊपर की सारी घटना बता दी। उन्होंने तुरंत रणनीति बनाई, जवानों को तैयार किया और उसी रात हमने टाइगर हिल पर फतह का तिरंगा फहरा दिया।

योगेंद्र को लगी थीं 19 गोलियां

योगेंद्र सिंह यादव के शरीर पर पाकिस्तानी सैनिकों की 19 गोलियां लगी थीं। उन्हें मिलिट्री हॉस्पिटल ले जाया गया। करीब एक साल के बाद योगेंद्र पूरी तरह से स्वस्थ हुए। योगेंद्र की इस बहादुरी के लिए उन्हें 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र सम्मान से नवाजा गया। वह भारतीय सेना में आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। योगेंद्र सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गांव में 1980 में हुआ था।

 

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