प्रदेश का शिक्षा स्तर : बातें, आलोचनाएं, चर्चाएं व दावे तो बहुत, पर वास्तविकता...क्या !

शिक्षा : बातें, आलोचनाएं, चर्चाएं व दावे तो बहुत, पर वास्तविकता…क्या !

विशेष लेख :

  • जिसकी चलती है वो चला रहा है, जिसकी नहीं चलती वो धक्के खा रहा है…
  • शिक्षा स्तर पर भी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं
  • किस-किस सिस्टम पर बात की जाए, सभी सवालों के कटघरे में?
  • शिक्षा प्रणाली में सुधार तो क्या लाना, जो समस्याएं हैं वो भी सुलझा दें तो बहुत
शिक्षा स्तर पर भी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं

शिक्षा स्तर पर भी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं

आलोचनाएं और चर्चाएं तो बहुत होती हैं लेकिन सुधार पर भी कभी ध्यान दिया जाए तो कुछ बेहतर हो। किस-किस सिस्टम पर बात की जाए, सभी पर सवालिया निशान हैं? फिलहाल आज शिक्षा की बात करते हैं… शिक्षा स्तर पर भी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं। नीतियां बनेंगी सब समान दायरे में होंगे? लेकिन जनाब ये नीतियां, ये तबादले, किसके लिए? जिसकी चलती है उसके लिए नीतियां कोई मायने नहीं रखती। पिसता कौन है! ईमानदारी, मेहनत और काम करने वाला शिक्षक। सरकारी स्कूलों की हालत खराब क्यों न हो! कहीं स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं, तो कहीं स्कूलों में एक विषय को पढ़ाने के लिए दो-दो शिक्षक बैठे हैं। तो कहीं स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए भवन व पर्याप्त कमरों की व्यवस्था ही नहीं। यह है शिक्षा व्यवस्था हमारे प्रदेश की! शिक्षा प्रणाली में सुधार तो क्या लाना, जो समस्याएं हैं वो भी सुलझा दें प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग तो वही बहुत है।

आज माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूल के बजाय निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए ज्यादा तव्वजो देते हैं शहर क्या,गांव क्या, हर जगह अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए गांव से शहरों की ओर रुख कर रहे हैं बहुत गंभीर और चिंता का विषय है। स्वयं शिक्षक माता-पिता के बच्चों को आप निजी स्कूलों में पढ़ते देख सकते हैं। हालांकि कुछ उच्च अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालने की रवायत भी शुरू कर रहे हैं लेकिन अधिकतर अभिभावकों को फिर भी निजी स्कूल ही भा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में सुविधाएं बच्चों को कई तरह की मिल भी रही हैं लेकिन फिर वजह क्या है कि हम बच्चों को सरकारी स्कूलों में निजी स्कूलों की चकाचौध से हटा नहीं पा रहे हैं। ये सरकारी शिक्षकों के लिए भी, विभाग के लिए भी और सरकार के लिए भी चिंता का विषय है कि हम जो सुविधाएं सरकारी स्कूलों के बच्चों को पहुंचा रहे हैं उसका लाभ क्यों सभी बच्चे नहीं उठा रहे हैं। खामियां तो हैं… कहीं कुछ शिक्षकों की, कहीं प्रशासन की, कहीं अभिवावकों की, तो कहीं सरकार की जो हर बार अपने वायदों पर खरा नहीं उतर पाती।

  • विद्यार्थियों में शिक्षा में प्रतिभा, योग्यता, हुनर व रुचि को तलाश कर उनकी नींव को मजबूत बनाना हर शिक्षक का एक अहम कर्तव्य

खैर….शिक्षा स्तर पर गंभीरता से विचार किया जाना चहिये। हमारे प्रदेश के बच्चे होनहार हैं उनकी प्रतिभा को विकसित और उनकी नींव को मजबूत करना शिक्षकों की अहम जिम्मेदारी है। उस जिम्मेदारी को अधिकतर शिक्षक बखूबी निभाते हैं तो कुछ अपनी जिम्मेदारियों से महत्वपूर्ण अपनी निजी जिम्मेदारी को समझते हुए शिक्षक की भूमिका को दरकिनार करते हुए जीवन बसर करते हैं। बच्चे देश का वो भविष्य हैं जो आने वाले कल की एक नई कहानी लिखेंगे। उनकी शिक्षा में प्रतिभा, योग्यता, हुनर और रुचि को तलाश कर उनकी नींव को मजबूत बनाना हर शिक्षक का एक अहम कर्तव्य है जिसे हर शिक्षक को निभाना होता है। लेकिन उस शिक्षक पर स्कूल प्रबंधन, शिक्षा विभाग से लेकर, सरकार तक उठक-पठक की जो दौड़ है वो भी निर्भर करती है कि वो किस दिशा में है।

  • तबादलों की राजनीति में उलझी प्रदेश की शिक्षा प्रणाली

यहां तो शिक्षा स्तर ज्यादातर तबादलों की फाइलों में ही उलझा पड़ा है जिसकी चलती है वो चला रहा है, जिसकी नहीं चलती वो धक्के खा रहा है। स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों के भविष्य की चिंता भाषणों से नहीं खत्म होने वाली। पहले सभी शिक्षकों को समान रूप से तबादलों की नीति में लाया जाए वो भी निष्पक्ष। हर स्कूल में शिक्षकों की जो कमी है उसे जल्द से जल्द दूर करने पर काम किया जाए। “शिक्षा” और “शिक्षक” दोनों ही नौनिहालों के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए आवश्यक बन जाता है कि सरकार तबादलों में उलझने की बजाय “शिक्षा” और “शिक्षकों” की कार्यप्रणाली को सुधारने में विचार करें। वरना क्या पिछली सरकार क्या अब की….!

  • राजनीति में उलझी बदलाव की बयार

बदलाव की बयार अच्छे के लिए बहे तो ठीक, वरना राजनीति हर बार बदलाव की राजनीति में उलझी रहे तो सरकार किसी की भी आए जिसकी चलेगी वो चलाएगा, जिसकी नहीं चलेगी वो बेचारा धक्के खाएगा। विकास, सुधार, बदलाव,  बेहतरीन और नए होने की उम्मीद फिर बेकार है। बातें नहीं अब काम होना चाहिए जो जनता को दिखना भी चाहिए। चाहे वो शिक्षा पर हो या फिर अन्य विकासात्मक स्तर पर।

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