बागीचे की स्थिति व समस्याओं के आंकलन तथा इनमें हो रहे रोग, कीट, माईट की रोकथाम अथवा पोषक तत्वों के प्रयोग बारे जानकारी दे रहे बागवानी विशेषज्ञ डा. भारद्वाज

बागीचे की स्थिति व समस्याओं के आंकलन तथा इनमें हो रहे रोग, कीट, माईट की रोकथाम अथवा पोषक तत्वों के प्रयोग बारे जानकारी दे रहे बागवानी विशेषज्ञ डा. भारद्वाज

  • कोविड-19महामारी के प्रकोप के चलते बागवानों को अपने स्तर पर जो भी कार्य संभव हैं अवश्य करने चाहिए
  • सेब बागीचों में चूर्ण फफूंद रोग, रैड माईट तथा क्लोरेटिक लीफ स्पाट वायरस रोग का आक्रमण

1कोविड-19 महामारी के प्रकोप के चलते विश्वभर के लगभग सभी देशों में विकास की दर लगभग थम सी गई है और इस अवस्था में सामान्य स्थिति होने में बहुत समय लग सकता है। सेब बागवान भी पिछले 22 मार्च से लगे लॉकडाउन से चिंता में पड़ गए हैं कि आने वाले कुछ महीनों में सेब का व्यापार कैसे हो पाएगा? यदि परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं होगा। हालांकि अभी सेब के फलों को बाजार में आने के

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज

लिए पर्याप्त समय है। वैज्ञानिक दृष्टि से अगर इस समस्या को देखा जाए तो बागवानों को अपने स्तर पर जो भी कार्य संभव हैं अवश्य करने चाहिए। यदि समय रहते इन्हें नहीं किया गया तो फल बागीचों को अप्रत्याशित रूप से हानि तो पहुंचेगी ही, अपितु आने वाले वर्षों में पौध स्वास्थ्य में कमजोरी होने के कारण फल पैदावार भी बहुत अधिक प्रभावित होगी। इसलिए बागीचे की स्थिति व समस्याओं की आंकलन करके इनमें हो रहे रोग, कीट, माईट की रोकथाम व पोषक तत्वों का प्रयोग आवश्कतानुसार निरन्तर करते रहें। इसी प्रकार ही हम वर्तमान की विकट परिस्थितियों का सामना सक्षमता से कर सकते हैं।

  • सेब बागीचों में चूर्ण फफूंद रोग, रैड माईट तथा क्लोरेटिक लीफ स्पाट वायरस रोग का आक्रमण
  • नया विकास नहीं होता तो पौधों की शाखाओं पर नये बीमे भी नहीं बन पाते

2इस विकट समय में सेब बागीचों में जो समस्या सामान्यत: देखने में आई है वह है चूर्ण फफूंद रोग (पाउडरी मिल्डियु), रैड माईट का आक्रमण, तथा क्लोरेटिक लीफ स्पाट वायरस रोग का आक्रमण। चूर्ण फफूंद रोग (पाउडरी मिल्डियु) का प्रकोप अप्रेल-मई के महीनों में पौधों की कोमल पत्तियों पर दिखाई देता है। इसके 3कारण पत्तियों के निचली सतह पर सबसे पहले श्वेत चूर्ण दिखाई देता है और बाद में पत्तियों की ऊपरी सतह पर भी प्रकोप दिखाई देता है। इसके कारण पत्तियों में हो रहे विकास में बाधा उत्पन्न होती है और कोमल नई शाखाओं का विकास नहीं हो पाता। जब नया विकास नहीं होता तो पौधों की शाखाओं पर नये बीमे भी नहीं बन पाते और पौधों में फल बनाने व उत्पादन क्षमता क्षीण होती जाती है।

  • गोल्डन डिलिशियस, रैड गोल्ड, ग्रेनी स्मिथ, गाला समूह  किस्मों पर इस रोग का सबसे अधिक प्रभाव
  • बागीचों में प्रकोपग्रस्त पौधों पर ही फफूंदनाशकों का छिडक़ाव करना उचित

इस रोग का सबसे अधिक प्रभाव गोल्डन डिलिशियस, रैड गोल्ड, ग्रेनी स्मिथ, गाला समूह की किस्मों पर होता है। अन्य किस्मों पर बहुत कम प्रकोप देखा गया है। इसलिए बागीचों में प्रकोपग्रस्त पौधों पर ही फफूंदनाशकों का छिडक़ाव करना उचित है। इस रोग की रोकथाम के लिए कन्टाफ (हैक्जाकेनाज़ोल) 100 मि.लि. या स्कोर (डायफिनकैनाज़ोल) 30 मि.लि. या रोको या टापसिन एम (थायोफिनेट मिथाइल) 100 ग्राम या वैविस्टिन (कारवैन्डाजि़म) 100 ग्राम शमीर 500 मि.लि. का प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें। इसके अतिरिक्त हार्टीकलचरल मिनरल तेल (एच.एम.ओ.) सर्वो, या मैक आल सीजन एचएमओ या आरबोफाईन में से किसी एक में से 2 लिटर 198 लिटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिडक़ें।

  • औद्यानिकी एवं वानिकी विवि द्वारा स्वीकृत एच एम को 2 लिटर प्रति 198 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें

एच एम ओ के छिडक़ाव से न केवल चूर्ण फफूंद रोग (पाउडरी मिल्डियु) का सफल नियंत्रण होता है अपितु, रैड माईट के अण्डों व शिशु माईट अन्य शत्रु कीटों द्वारा दिए गए अण्डों का भी नियंत्रण हो जाता है। औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकृत एच एम को 2 लिटर प्रति 198 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ें। शाम के समय किया गया छिडक़ाव अत्यंत प्रभावकारी होता है। अधिक धूप या दोपहर में किसी भी छिडक़ाव को न करें।

  • इस समय बागवानों की मुख्य समस्या यूरोपियन रैड माईट
  • पत्तियों पर इसके प्रकोप के कारण फलों के विकास व रंग प्रभावित

4इस समय दूसरी मुख्य समस्या है यूरोपियन रैड माईट जो पत्तियों के निचले सतह से लगातार पौध रस चूसती रहती है और हरित पदार्थ (क्लोरोफिल) की मात्रा में कमी लाती हैं। इस समय यदि नाशिजीव की बढ़ती जीवसंख्या का ध्यान न रखा जाए तो शीघ्र ही यह एक विकट समस्या का रूप धारण कर लेती है और इसके नियंत्रण के लिए कई छिडक़ाव लम्बे समय तक करने पड़ते हैं। रैड माईट के शिशु व वयस्कों द्वारा निरंतर पौधरस चूसने के कारण पत्तियों का विकास रूक जाता है और धीरे-धीरे गहरा हरा रंग हल्का हरा तथा अधिक प्रकोप होने पर तांविया रंग में परिवर्तित हो जाता है। पत्तियों पर इस प्रकार के प्रकोप के कारण फलों के विकास व रंग प्रभावित होते हैं और अगले वर्ष की फल उत्पादन क्षमता प्रभावित हो जाती है। सेब बागीचों में 25 पौधों से प्रत्येक दिशा से एक-एक पत्तियों को एकत्र कर 100 पत्तियां हो जाएंगी, इनका निरीक्षण करने पर यदि 3-4 माईट प्रति पत्ती की औसतन जीव संख्या हो तो रैड माईट का नियंत्रण करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा यह अगले एक-डेढ़ महीने में बढ़ जाती है और अत्याधिक हानि पहुंचाने में सक्षम हो जाती है।

  • रैड माईट के नियंत्रण के लिए 2 लिटर एचएमओ प्रति 198 लिटर पानी में मिलाकर बागीचों में करें

रैड माईट के नियंत्रण के लिए सबसे उपयुक्त समय आजकल का है और इसमें भी स्वीकृत एच एम ओ का एक प्रतिशत यानि 2 लिटर प्रति 198 लिटर पानी में मिलाकर शाम के समय बागीचों में करें। इस छिडक़ाव से रैड माईट की विभिन्न अवस्थाओं का नियंत्रण तो होती ही है अपितु पाउडरी मिल्डियु, अन्य कीटों द्वारा दिए गए अण्डों का भी सफलतापूर्वक नियंत्रण होता है। इसके अतिरिक्त यह छिडक़ाव मित्र कीटों के लिए सुरक्षित है और पर्यावरण को भी दूषित नहीं करता है।

  • ग्रसित पौधों से कलमें लेना तथा इनका प्रत्यारोपण करने से पनप रही क्लोरोटिक लीफ स्पाट वायरस की समस्या

क्लोरोटिक लीफ स्पाट वायरस की समस्या भी सेब बागीचों में प्रति वर्ष बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण ग्रसित पौधों से कलमें लेना तथा 7इनका प्रत्यारोपण करना है। बागवान वायरस संक्रमित पौधों की कांट-छांट के समय स्कैचर यानि प्रूनिंग कैंची या नाईफ को एक पौधे से दूसरे पौधे पर निरन्तर प्रयोग करते रहते हैं और इनका कीटाणुनाशन नहीं करते हैं, इसी से यह ग्रसित पौधे से स्वस्थ पौधों में फैलता है। वायरस के लक्षण पौधों में अप्रैल-मई में नई पत्तियां निकलने के बाद लगभग एक महीने में दिखाई देते हैं जो पत्तियों के विकास व परिमाण को प्रभावित करते हैं। कुछ वर्षों में वायरत ग्रस्त पौधों में कल का रंग, साईज़ तथा गुणवत्ता प्रभावित होती है और धीरे-धीरे फल उत्पादन क्षमता में कमी हो जाती है।

  • कलमों का चयन सावधानी से करें और रोगमुक्त पौधों से ही कलमे लें

वायरस के अनेक प्रकारों में प्रदेश में मुख्यत: एप्पल क्लोरोटिक लीफ मौजेक वायरस, क्लोरोटिक स्पौट वायरस, लिटल लीफ, लीफ पकर, 5स्टार क्रैक, एप्पल स्टैम पिटिग वायरस, डैपल एप्पल इत्यादि सम्मिलित हैं। अभी तक इन वायरस का नियंत्रण किसी भी रसायन द्वारा करना संभव नहीं है। अत: इसके बचाव में ही नियंत्रण है। इसलिए कलमों का चयन सावधानी से करें और रोगमुक्त पौधों से ही कलमे लें। कांट-छांट का कार्य भी वायरस ग्रसित पौधों में सबसे अन्त में करें। वायरस संक्रमित पौधों का चिन्हित कर लें और इनमें किसी भी यन्त्र का प्रयोग न करें। यदि करना ही पड़े तो मैथेलेटिड स्पिरिट से कैंची के ब्लेड को रूई के फाहे को डूबोकर कीटाणुमुक्त कर लें।

  • किसी भी रसायन का प्रयोग आवश्यकतानुसार व पौध के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर करें

बागवान हर समय किसी न किसी रसायन का चाहे वह कीटनाशक हों या फफूंदनाशक हों या फिर पोषक तत्व हों, आवश्यकता से अधिक प्रयोग करते हैं। यह सभी पदार्थ भी पौधों की रोगवहन शक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें संवेदनशील बना देते हैं। अत: किसी भी रसायन का प्रयोग आवश्यकतानुसार व पौध के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर करें। अधिक रसायन प्रयोग से हानि ही होती है। संशय होने पर वैज्ञानिक सलाह लेना न भूलें।

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