नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा व महत्व

नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा व महत्व

शैलपुत्री : मां दुर्गा का पहला रूप है शैलपुत्री, शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की बेटी हैं। इन्हें करुणा और ममता की देवी माना जाता है। मान्‍यता है कि जो भी भक्‍त श्रद्धा भाव से मां की पूजा करता है उसे सुख और सिद्धि की प्राप्‍ति होती है।

  • ब्रह्मचारिणी: मां दुर्गा का दूसरा रूप है ब्रह्मचारिणी, मान्यता है कि इनकी पूजा करने से यश, सिद्धि और सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है। इन्होंने भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसलिए इन्हें तपश्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है।
  • चंद्रघंटा: मां दुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, मान्यता है कि शेर पर सवार मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। इन्हें पूजने से मन को शक्ति और वीरता मिलती है।
  • कूष्माण्डा: मां दुर्गा का चौथा रूप है कूष्माण्डा, मान्यता है कि मां कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी पूजा से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।
  • स्कंदमाता: मां दुर्गा का पांचवा रूप है स्कंदमाता, मान्यता है कि यह भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। इन्हें मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता के रूप में भी पूजा जाता है।
  • कात्यायनी : मां दुर्गा का छठा रूप है कात्यायनी, इन्हें गौरी, उमा, हेमावती और इस्वरी नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यह महर्षि कात्यायन को पुत्री के रूप में मिलीं इसीलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा। माना यह भी जाता है कि जिन लड़कियों की शादी में देरी हो रही होती है, वह मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए कात्यायिनी माता की ही पूजा करती हैं।
  • कालरात्रि: मां दुर्गा का सातवां रूप है कालरात्रि, मान्यता है कि मां कालरात्रि की पूजा करने से काल और असुरों का नाश होता है। इसी वजह से मां के इस रूप को कालरात्रि कहा जाता है। यह माता हमेशा शुभ फल ही देती हैं इसीलिए इन्हें शुभंकारी भी कहा जाता है।
  • महागौरी: मां दुर्गा का आठवां रूप है महागौरी। यह भगवान शिवजी की अर्धांगिनी या पत्नी हैं। इस दिन मां को चुनरी भेट करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
  • सिद्धिदात्री: नवरात्रि क दौरान मां दुर्गा का नौवां रूप होता है सिद्धिदात्री, मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से रूके हुए हर काम पूरे होते हैं और हर काम में सिद्धि मिलती है।

    नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा व महत्व

    नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा व महत्व

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक व्रत और उपवास के साथ माता जी की पूजा की जाती है। नवरात्रि के व्रत और उपवास के साथ पूजा में कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा नौ दिनों में क्या करें और किन बातों से बचें इसका ध्यान भी होना चाहिए।

  • नवरात्रि के पहले दिन 9 दिनों के व्रत और उपवास का संकल्प लें। इसके लिए सीधे हाथ में जल लेकर उसमें चावल, फूल, एक सुपारी और सिक्का रखें। हो सके तो किसी ब्राह्मण को इसके लिए बुलाएं। ऐसा न हो सके तो अपनी कामना पूर्ति के लिए मन में ही संकल्प लें और माता जी के चरणों में वो जल छोड़ दें।
  • इन दिनों व्रत-उपवास में सुबह जल्दी उठकर नहाएं और घर की सफाई करें। पूरे घर में गौमूत्र और गंगाजल का छिड़काव करें। उसके बाद माता जी की पूजा करें। पूजा में ताजा पानी और दूध से माता जी को स्नान करवाएं। फिर कुमकुम, चंदन, अक्षत, फूल और अन्य सुगंधित चीजों से पूजा करें और मिठाई का भोग लगाकर आरती करें। नवरात्रि के पहले ही दिन घी या तेल का दीपक लगाएं। ध्यान रखें वो दीपक नौ दिनों तक बुझ न पाएं।
  • व्रत-उपवास में माता जी की पूजा करने के बाद ही फलाहार करें। यानि सुबह माता जी की पूजा के बाद दूध और कोई फल ले सकते हैं। नमक नहीं खाना चाहिए। उसके बाद दिनभर मन ही मन माता जी का ध्यान करते रहें। शाम को फिर से माता जी की पूजा और आरती करें। इसके बाद एक बार और फलाहार (फल खाना) कर सकते हैं। अगर न कर सके तो शाम की पूजा के बाद एक बार भोजन कर सकते हैं।
  • माता जी की पूजा के बाद रोज 1 कन्या की पूजा करें और भोजन करवाकर उसे दक्षिणा दें।
  • नवरात्रि के दौरान तामसिक भोजन नहीं करें। यानि इन 9 दिनों में लहसुन, प्याज, मांसाहार, ठंडा और झूठा भोजन नहीं करना चाहिए।
  • नवरात्रि के व्रत-उपवास बीमार, बच्चों और बूढ़ों को नहीं करना चाहिए। क्योंकि इनसे नियम पालन नहीं हो पाते हैं।
  • इन दिनों में क्षौरकर्म न करें। यानि बाल और नाखून न कटवाएं और शेव भी न बनावाएं। इनके साथ ही तेल मालिश भी न करें। नवरात्रि के दौरान दिन में नहीं सोएं।
  • नवरात्रि में सूर्योदय से पहले उठें और नहा लें। शांत रहने की कोशिश करें। झूठ न बोलें और गुस्सा करने से भी बचें। इसके साथ ही मन में किसी के लिए गलत भावनाएं न आने दें। अपनी इंद्रियों का काबु रखें और मन में कामवासना जैसे गलत विचारों को न आने दें।

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