कृषि विभाग द्वारा शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन

प्राकृतिक खेती को लागू करने की पहल, किसान व कृषि वैज्ञानिक खुले मन से अपनाएं प्राकृतिक खेती

  • पहले ही वर्ष में 25 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान
  • किसान समुदाय और कृषि वैज्ञानिक खुले मन से प्राकृतिक खेती को अपनाएं : राज्यपाल
  • प्राकृतिक खेती में किसानों को खुशहाल बनाने की क्षमता :मुख्यमंत्री
  • सम्मेलन में कृषि विभाग के 430 से अधिक अधिकारियों तथा सभी जिलों के किसानों ने भाग लिया

शिमला: किसान समुदाय तथा कृषि वैज्ञानिकों को अपनी सोच में बदलाव लाकर खुले मन से शून्य लागत प्राकृतिक खेती के आदर्श को अपनाने का राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने आग्रह किया, जो रासायनिक खेती की मौजूदा प्रणाली को बदलने में मददगार होगा।  राज्यपाल आज यहा पीटरहॉफ में कृषि विभाग द्वारा शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। सम्मेलन में कृषि विभाग के 430 से अधिक अधिकारियों तथा सभी जिलों के किसानों ने भाग लिया।

आचार्य देवव्रत ने कहा कि उन्होंने हाल ही में नीति आयोग के साथ बैठक की थी और यह संतोष का विषय है कि उन्होंने स्वीकार किया कि केवल शून्य लागत प्राकृतिक खेती ही किसानों की आय को दोगुना कर सकती है और इसके बिना हम अपने किसान समुदाय को बचाने के बारे में नहीं सोच सकते। उन्होंने राज्य में प्राकृतिक खेती को लागू करने की पहल तथा पहले ही वर्ष में 25 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान करने के लिए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर की सोच तथा दृढ़ निश्चिय की सराहना की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने वास्तविकता को स्वीकार किया है और राज्य में प्राकृतिक कृषि की क्रियान्वयन में हर सम्भव सहायता प्रदान करने में रूची दिखाई है।

कृषि विभाग द्वारा शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन

कृषि विभाग द्वारा शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन

उन्होंने कहा कि हमें अपनी मानसिकता में बदलाव लाने तथा बैठकें करने के बजाय ज़मीनी स्तर पर शून्य लागत प्राकृतिक खेती को क्रियान्वित करने का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष के दौरान राज्य के विभिन्न भागों में प्राकृतिक कृषि पर छः बड़े शिविरों का आयोजन किया जा चुका है और इनमें बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया, जो यह दर्शाता है कि किसान समुदाय खेती की इस प्रणाली को लेकर उत्साहित है। उन्होंने राज्य में इस प्रकार के और अधिक शिविरों का आयोजन करने तथा प्रत्येक पंचायत को इससे जोड़ने का आग्रह किया ताकि वे लाभान्वित हो सके।

राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप किसानों की आय को दोगुना करने के लिए देश में अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे वैज्ञानिक जो रसायनिक खेती की सिफारिश करते हैं, वे इस दिशा में समाधान प्रदान करने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कि आन्ध्र प्रदेश तथा हमारे गुरूकुल के लाखों किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद आश्चर्यजनक वृद्धि और तीन गुणा आय दर्शाई है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव का एकमात्र कारण यह है कि उन्होंने इस मॉडल को ईमानदारी से अपनाया है।

राज्यपाल ने कहा कि मौजूदा परिपेक्ष्य में रसायनिक खेती तथा जैविक खेती की पुरानी परम्परा सहज नहीं है। जहां तक रसायनिक खेती का सम्बन्ध है, इसके उत्पाद नुकसानदायी और जहरीले हैं और साथ ही महंगे भी है। इसी प्रकार, जैविक खेती में उत्पादन की लागत काफी अधिक है और यह मिट्टी से काफी अधिक आवश्यक तत्वों को अवशोषित करती है। इसलिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती ही कृषि का सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। उन्होंने कहा कि रसायनिक खेती के विपरित प्रभावों को प्राकृतिक खेती से हल किया जा सकता है। उन्होंने प्राकृतिक कृषि अपनाने के विभिन्न कारणों तथा फायदों के बारे में जानकारी के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं कृषि विश्वविद्यालय हिसार की हाल ही की रिपोर्ट की भी जानकारी दी, जो प्राकृतिक खेती को हितकारी दर्शाति है। उन्होंने गुरूकुल, कुरूक्षेत्र भूमि पर कृषि विश्वविद्यालय हिसार की रिपोर्ट और आंकड़ों का भी ब्योरा दिया और कहा कि रिपोर्ट के अनुसार कुछ भागों में ऑगेर्निक कार्बन 1.12 तक पहुंच गया है और इसमें एक वर्ष के दौरान 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि इस उपाय के परिणाम प्रोत्साहित करने वाले है और खेतों में आश्चर्यजनक बदलाव आया है।

राज्यपाल ने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक खेती किसानों को सुरक्षित करने तथा उनकी आय को दोगुना करने का एकमात्र समाधान है। इस प्रणाली के अन्तर्गत किसानों को एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है, बल्कि बंजर भूमि के पुनरूत्थान, पानी का न्यूनतम उपयोग, स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित उत्पादन, पर्यावरण के लिए सुरक्षित इत्यादि अनेक लाभ हैं। उन्होंने प्राकृतिक कृषि अपनाने के लिए किसानों से भारतीय नस्ल की गाय पालने का आग्रह किया। उन्होंने राज्य नीति में साहिवाल, लाल सिन्धी तथा धरपरकार जैसी स्वदेशी नस्ल की गायों को शामिल करने का आग्रह किया।

राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित ‘हिमाचल प्रदेश विजन-2022’ का विमोचन किया।

इस अवसर पर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसानों को खुशहाल बनाने की क्षमता रखती है और राज्य सरकार इसे बढ़ावा देने के लिये हर संभव समर्थन प्रदान करेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की लगभग 90 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती-बाड़ी उनकी आजीविका का मुख्य साधन है। उन्होंने कहा कि प्राचीन समय से किसानों ने अपने फसल उत्पादन में वृद्धि के लिए अनेक तरीके और तकनीकें अपनाई हैं, लेकिन उत्पादन बढ़ाने की इस आकांक्षा के चलते किसानों ने रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग करना शुरू कर दिया।

जय राम ठाकुर ने कहा कि रसायनों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता समाप्त होने के कारण भूमि बंजर हो गई। उन्होंने कहा कि इससे लोगों के स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि अधिकांश फलों, सब्जियों तथा अनाज में नुकसानदायी रसायनों की काफी अधिक मात्रा विद्यमान है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अब प्राकृतिक खेती को प्रभावी ढंग से प्रोत्साहित करना चाहती है। उन्होंने कहा कि राज्य में शून्य लागत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बजट में 25 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश को देश का प्राकृतिक कृषि राज्य बनाने के लिए सांझे प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक खेती न केवल लोगों को स्वस्थ भोजन और फल सुनिश्चित करेगी, बल्कि किसानों की आर्थिकी को भी मजबूत करेगी। उन्होंने प्रभावी शून्य लागत प्राकृतिक खेती सुनिश्चित करने के लिए देसी नस्ल की गायों के प्रोत्साहन पर बल दिया।

पदमश्री डॉ. सुभाष पालेकर, जो शून्य लागत प्राकृतिक खेती के जन्मदाता है, ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने किसान समुदाय तथा बड़ी संख्या में लोगों की सुरक्षा के लिए राज्य में प्राकृतिक कृषि को क्रियान्वित करने के लिए सही समय में सही फैसला लिया है। उन्होंने इस दिशा में अपना सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया और कहा कि पशुपालन, बागवानी जैसे अन्य सम्बद्ध विभागों को भी इसके साथ जोड़ना चाहिए। उन्होंने शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर चर्चा की और कहा कि रसायनिक कृषि महज़ एक तकनीक है, न कि प्राकृतिक प्रक्रिया, जबकि प्राकृतिक खेती एक विज्ञान है और इसे किसी बाह्य समर्थन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता है तो केवल इसे अपनाने की।

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