मोदी सरकार नहीं ले रही किसानों की सुध : रोहित ठाकुर

मोदी सरकार नहीं ले रही किसानों की सुध : रोहित ठाकुर

  • बेरोजगारी दर पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ रही हैं और निजीकरण को दिया जा रहा है बढ़ावा

शिमला: मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था जहां पूरी तरह से चरमरा गई हैं वहीं कृषि क्षेत्र भी पूरी तरह से आर्थिक मंदी की चपेट में आ चुका हैं, ये बात जुब्बल-कोटखाई के पूर्व विधायक व पूर्व मुख्य संसदीय सचिव रोहित ठाकुर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कही। आगे उन्होंने कहा कि गत 5 महीनों में मोदी सरकार ने आर्थिक मंदी से निपटने के लिए हर  क्षेत्र को राहत पैकेज दिए हैं जबकि कृषि क्षेत्र को  नजरअंदाज किया गया। नोटबन्दी व जीएसटी के ग़लत क्रियान्वयन से पूरे भारतवर्ष की अर्थव्यवस्था अर्श से फर्श पर आ गई हैं। नोटबन्दी का सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ा हैं । कृषि क्षेत्र में नकदी की कमी से स्थिति बद से बदतर हो चुकी है ।  किसानों को उत्पादन लागत भी नहीं मिल पा रही  जिससे किसानों पर कर्जा बढ़ता जा रहा है । पिछले वर्षों में कृषि क्षेत्र पर हुए सर्वेक्षण से पता चला हैं कि प्रति वर्ष  लगभग 10 हज़ार किसान आत्महत्या करते हैं।  कृषि विकास दर जो पहले 5% प्रतिशत हुआ करती थी अब 15 वर्षो के सबसे न्यूनतम स्तर 2% पर आ गई हैं।  देश की कुल आबादी की लगभग 70% जनसँख्या  ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं जिनका मुख्य व्यवसाय खेती हैं। देश की कुल आर्थिकी में  कृषि क्षेत्र का 18% योगदान  हैं और साथ ही  50% आबादी को कृषि क्षेत्र के माध्यम से रोज़गार मिलता हैं। जब तक कृषि क्षेत्र को राहत नही दी जाती तब तक आर्थिक मंदी को समाप्त करने के लिए उठाए गए कदम कारगर साबित नहीं हो सकते। जहां भारत को दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता था वही मोदी सरकार की ग़लत नीतियों से कृषि, व्यापार और रोजगार के क्षेत्रों में घोर संकट छा गया हैं। इन क्षेत्रों से चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं जिससे देश की साख पर भी असर पड़ा हैं। भूखमरी और कुपोषण में 117 देशों में भारत 102वे स्थान पर हैं । हैरानी की बात है कि भारत इस मामले में नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पिछड़ गया हैं ।

बेरोजगारी दर पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ रही हैं। निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा हैं और सरकारी उपक्रमों में कर्मचारियों के पद समाप्त किये जा रहे हैं। औद्योगिक घरानों को रेवड़ियां की तरह लोन बांटे जाने से बैंकों पर एनपीए बढ़ता जा रहा हैं। केंद्र सरकार के पिछले पांच वर्षो में 10.3 लाख करोड़ रुपया Bad Debts. हो चुका हैं जिससे भारत ने इटली को भी पीछे छोड़ दिया है । सरकार द्वारा बैंक में खाते खोले गए  लेकिन किसानों को ऋण उपलब्ध नहीं करवाया गया हैं।  एक चौथाई से अधिक जनधन खाते न्यूनतम राशि के अभाव के कारण बंद पड़े हैं।  एक तो पहले ही आम आदमी महंगाई की मार झेल रहा है ऊपर से बैंकिंग सिस्टम में मोदी सरकार द्वारा किए गए बदलाव के कारण आम आदमी की  जमा पूंजी पर कई तरह के शुल्क वसूले जा रहे हैं। किसानों को राहत के नाम पर आश्वासन मिल रहे है जबकि औद्योगिक घरानों से ऋण वसूलने की बजाय उन्हें रियायते दी जा रही हैं, मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में औद्योगिक घरानों के लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये माफ किए हैं। केंद्र सरकार के समक्ष चीन सहित 16 देशों के साथ आर०सी०ई०पी० (Regional Comprehensive Economic Partnership)  व्यापार समझौता विचाराधीन  है  जिससे  अंदेशा है कि  कृषि क्षेत्र पर  इसका प्रतिकूल  प्रभाव पड़ेगा। विदेशों  से कृषि उत्पादों पर लगने  वाला आयात शुल्क समाप्त हो जाएगा, विदेशी  बीज कंपनियों का देश में एकाधिकार हो जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में आयात उदारीकरण के कदम आत्मघाती साबित होंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव से एक माह पहले मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना शुरू की थी जिसमें उस समय लगभग 75% किसानों को सम्मान निधि बांटी गई जो कि चुनाव के बाद घटकर  50% ही रह गई हैं।  यह योजना मात्र वोट बटोरने और  किसानों की बुनियादी समस्याओं से ध्यान भटकाने का एक तरीका था। सरकार को मंदी से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी।   कृषि  में  निजी क्षेत्र की भी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।  किसानों को सस्ती दर 4% पर  मिलने वाले ऋण किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की सीमा ₹3 लाख से ₹6 लाख की जाए।  लघु एवं सीमांत किसानों के ₹2 लाख तक के कर्ज माफ किए जाए।   ग्रामीण क्षेत्रों के आधारभूत ढांचे जैसे सड़के, बैंकिंग सुविधा, पशुपालन, भंडारण,कोल्ड स्टोर और  मंडियों का विकेंद्रीयकरण,  शिक्षण संस्थान व बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दी जानी चाहिए तथा समय-समय पर भाजपा द्वारा 2014 के संकल्प पत्र में किए गए वायदे के अनुरूप कृषि उत्पादों पर स्वामी नाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी की जाए। मौसम आधारित बीमा को किसानों के हित में तर्कसंगत बनाया जाए। सिंचाई योजना का नाम बदलकर पीएमकेएसवाई तो रखा गया हैं परन्तु  धरातल पर कोई भी नई सिंचाई योजना दिखाई नहीं दे रही हैं।  सरकार किसानों को बिचौलियों से राहत दे, मंडियों में किसानों को सुविधा मिले। भारतवर्ष में मात्र 2% कृषि व बागवानी उत्पाद का भंडारण (कोल्ड स्टोर) किया जाता है जबकि अमेरिका में 50% उत्पाद भंडारण (कोल्ड स्टोर) किया जाता है जिससे वहां कृषि क्षेत्र की आर्थिकी मजबूत हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार प्रतिवर्ष अमेरिका में सरकार द्वारा एक किसान पर $68910 यू०एस० डॉलर  ख़र्च किया जाता हैं जबकि भारत एक किसान पर प्रतिवर्ष मात्र $306 यू०एस० डॉलर ही ख़र्च कर पाता हैं।  भंडारण (कोल्ड स्टोर) ना होने के कारण भारत मे 20% फल व सब्जियां खराब हो जाती है।  मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात की थी जो कि वर्तमान परिस्थिति के हिसाब से ख्याली पुलाव साबित होती जा रही है । कृषि उत्पादों से आय को बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने जाने आवश्यक हैं। इसी तरह भारत में मात्र 4% खाद्य प्रसंस्करण (Food Processed)  किया जाता है जबकि भारत की तरह विकासशील देश मलेशिया में 83% व ब्राजील में 70% किया जाता हैं, इस क्षेत्र में भी सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता हैं।  मंदी के कारण समाज मे आर्थिक सन्तुलन बिगड़ता जा रहा हैं।  एक आंकलन के अनुसार 1% जनता के पास देश की कुल सम्पति का 73% भाग हैं। यूपीए सरकार के  कार्यकाल के दौरान कृषि  व ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मनरेगा,राष्ट्रीय कृषि विकास योजना तथा सबमिशन ऑन एग्रीकल्चर मैकेनाइजेशन ( Submission on Agriculture Mechanization), एपेड़ा (Agriculture Produce Export Development Authority) जैसी  महत्वकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही थी जिसमें वर्तमान भाजपा सरकार ने उदासीन रवैये के कारण वित्तपोषण में भारी कटौती कर दी गई हैं, इन योजनाओं के लिए पुनः पर्याप्त धनराशि का आवंटन किया जाए। अंत में उन्होंने कहा की ग्रामीण क्षेत्रों में कृषकों की खरीदने की क्षमता को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार  ठोस कदम उठाए।  जब तक किसानों के हाथ में पैसा  नहीं आएगा और केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं देती तब तक पूर्व में भिन्न-2 क्षेत्रों में मंदी से निपटने के लिए दिए गए राहत पैकेज व रियायतें कारगर सिद्ध होने में शंका बनी रहेगी।

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