सतलुज नदी के किनारे बसा तत्तापानी

लोहड़ी व मकर संक्रांति के दिन पूजा-अर्चना व तुला दान धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण

 निचले पहाड़ी प्रदेशों में माघी खुशियां मनाने का दिन होता है लोहड़ी

निचले पहाड़ी प्रदेशों में माघी खुशियां मनाने का दिन होता है लोहड़ी

देशभर में जहां लोहड़ी खूब धूमधाम से मनायी जाती है। वहीं हिमाचल में भी पौष के मासांत में लोहड़ी खूब धूमधाम से मनाई जाती है। इससे पूर्व लड़के-लड़कियां घर-घर जाकर लुहकडिय़ां गाती हैं। निचले पहाड़ी प्रदेशों में लोहड़ी या माघी खुशियां मनाने का दिन होता है। ऊपरी हिमाचल में यह उत्सव माघी का साजा कहलाता है। यह प्रथम माघ को मनाया जाता है जोकि त्यौहारों का ऋतु है। रबी की फसल बीजे जाने के पश्चात खुशियां मनाते हैं और दिन के समय का उपयोग मित्रों और संबंधियों से मिलने में करते हैं। यह हंसना-खेलना न केवल उन्हें अपने भावों की अभिव्यक्ति का अवसर देता है बल्कि सामाजिक एकता को भी दृढ़ करता है। पूरा महीना प्रीतिभोजों और खुशियां मनाने में बीतता है। मित्रों और संबंधियों की सेवा स्वादिष्ट, सामिस भोजन से की जाती है। गांव के लोगों को प्रतिदिन एक-दूसरे के यहां आते-जाते देखा जा सकता है। इन दिनों लोग अपने घरों पर रामायण, महाभारत और भरथरी गाने वालों को बुलाते हैं जो स्थानीय बोलियों में गाए जाते हैं। यह गायन कई-कई रातों तक चलता रहता है। कुछ स्थानों पर रात्रि के पश्चात बच्चे और बूढ़े मिलकर नाचते हैं। यह खुशियां मनाने का महीना माना जाता है।

  • “माघी साजा” के दिन विशेष रूप से बनाई जाती है माह की दाल की खिचड़ी

लोहड़ी से पूर्व एक मास तक ग्रामीण कृषक एवं श्रमिक बालाएं घर-घर जाकर लोहड़ी संबंधी गीत लुहकडिय़ां गाती हैं। लोग उनका आदर करते हैं और उन्हें अन्न-धन देते हैं। लोहड़ी की रात को गांव के लडक़े हरन गाते हें। इसमें हिरन का स्वांग बनाकर

"माघी साजा" के दिन माह की दाल की खिचड़ी को विशेष रूप से जाता है बनाया

“माघी साजा” के दिन माह की दाल की खिचड़ी को विशेष रूप से जाता है बनाया

एक लडक़े को आंगन में नचाया जाता है। शेष लड़के गाते हैं और इस प्रकार सारी रात गांव में नाच-गाना चलता रहता है। रात में घरों के बाहर आग जलाकर गुड़, तिल, चावल, मूडी आदि से लोहड़ी होमी जाती है। मीठे तथा नमकीन बबरू पकाए जाते हैं। दूसरे दिन मकर संक्रांति को ऊषाकाल होते ही लड़कियां राजड़े गाती लोगों को अन्न-धन, पुत्रादि से संपन्न होने का आशीष देती घूमती हैं। लोग स्नानादि कर खिचड़ी पकाते हैं। बहू-बेटियों को खिचड़ी खाने हेतु बुलाया जाता है। पितरों के नाम भी खिचड़ी रखी जाती है। कुछ जातियों में कन्याएं गले में गरी, दाख, अखरोट की गिरी आदि की मालाएं पहनती हैं। इस दिन खिचड़ी को भी विशेष रूप से बनाया जाता है और आपसी रिश्तेदारों और संबंधियों को खिचड़ी खाने का दिया निमंत्रण जाता है। इस दिन माह की दाल की खिचड़ी बनाई जाती है । जिसके साथ घी, लस्सी या फिर दूध के साथ भी खाने को दिया जाता है।

 

  • सतलुज नदी के किनारे बसा तत्तापानी
  • छोटा हरिद्वार का मिला है दर्जा
  • लोग तत्तापानी जाकर करते हैं इस दिन स्नान, पूर्णिमा के दिन यहां स्‍नान करना बेहद पवित्र माना जाता है
सतलुज नदी के किनारे बसा तत्तापानी

सतलुज नदी के किनारे बसा तत्तापानी

राजधानी शिमला में सतलुज नदी के किनारे बसा तत्तापानी शहर अपने धार्मिक महत्व के लिए देश भर में विख्यात है। हर साल भारी तादात में लोग तत्तापानी जाकर इस दिन स्नान करते हैं।

 प्राकृतिक गंधकयुक्त गर्म पानी के स्रोतों के लिए प्रसिद्ध तत्तापानी सतलुज नदी के किनारे बसा हुआ है, जहां हर वर्ष लोहड़ी व मकर संक्रांति के पावन अवसर पर हजारों की संख्या में लोग स्नान कर स्वयं को धन्य मानते हैं। तत्तापानी में पूजा-अर्चना तथा तुला दान धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। तत्तापानी में महर्षि जमदग्नि और उनके बेटे परशुराम ने इस स्थल पर तपस्या कर इसे एक तीर्थ बनाकर ऊपरी हिमाचल का हरिद्वार बना दिया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने परिजनों की अस्थियां हरिद्वार में नहीं प्रवाह कर सकता है वह तत्तापानी में उन्हें प्रवाहित कर सकता है। इसी कारण इसे लघु हरिद्वार का दर्जा भी मिला है। विद्वानों का कहना यह भी है कि महर्षि जमदग्नि ने काफी समय अपनी पत्नी रेणुका के साथ सतलुज के किनारे व्यतीत किया था। जमदग्नि ऋषि अपने आश्रम में नित्य यज्ञ का आयोजन किया करते थे। यज्ञ में आने वाले लोगों को श्रद्धा से भोजन भी करवाते थे। विद्वानों के अनुसार जब परशुराम स्नान कर रहे थे तो उनकी गीली धोती से निकले पानी से यहां पर गंधयुक्त गर्म पानी उत्पन्न हुआ और तभी से यह स्थल आस्था का प्रतीक बना गया लेकिन उक्त क्षेत्र के जलमग्न होने के साथ तत्तापानी अब इतिहास बन गया है।

शिमला से करीब 51 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह नगरी सतलुज नदी के किनारे पर है। यहां गर्म पानी भी निकलता है जिसकी वजह से यह एक धार्मिक स्थल के रूप में विकसित है। करीब एक किलोमीटर एरिया में फैले इस स्‍थल पर हर साल हजारों सैलानी और लोग पहुंचते हैं। पूर्णिमा के दिन यहां स्‍नान करना बेहद पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन यहां का पानी गंगा की तरह पवित्र हो जाता है। जो भी इसमें स्‍नान करता है उसके सारे पाप धुल जाते हैं। साथ ही इस गर्म पानी में डुबकी लगाने से चर्म रोगों के साथ साथ जोड़ों के दर्द भी ठीक हो जाते हैं। नदी किनारे गर्म और ठंडे पानी में स्‍नान करने और सूर्य स्‍नान के लिए सुबह के समय काफी लोग यहां पहुंचते हैं। हर साल पूर्णिमा को यहां मेला लगता है और मनोकामना पूर्ण होने पर लोग अपने बच्चों का मुंडन भी करवाते हैं। हाल ही में यह स्‍थल अब साहसिक खेलों जैसे राफ्टिंग के लिए भी प्रसिद्ध हो रहा है। हर साल यहां इन खेलों का आयोजन होता है।

ततापानी शिमला से सड़कमार्ग से जुड़ा हुआ है। यहां लोग अपनी गाड़ियों और बसों के माध्यम से पहुंच सकते हैं। यहां हिमाचल पर्यटन निगम के अलावा कई प्राइवेट होटल भी हैं ‌जहां आप ठहराव कर सकते हैं।

  •   फसल पकने पर किसान खुशी को जाहिर करता “लोहड़ी पर्व”

लोहड़ी का त्यौहार खुद  में अनेक सौगातों को लिए होता है। फसल पकने पर किसान खुशी को जाहिर करता है जो लोहड़ी पर्व,

फसल पकने पर किसान खुशी को जाहिर करता लोहड़ी पर्व

फसल पकने पर किसान खुशी को जाहिर करता लोहड़ी पर्व

जोश व उल्लास को दर्शाते हुए सांस्कृत्तिक जुड़ाव को दर्शाता है , पंजाब और हरियाणा में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोहडी केवल पंजाब तक ही सीमित नहीं है बल्कि संपूर्ण भारत में मनाई जाती है। अलग-अलग नामों से फसल पकने की खुशी यहां पूरे जोश के साथ लोहड़ी के रुप में मनाई जाती है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार लोहड़ी “मकर संक्रांति” के एक दिन पहले मनाई जाती है। लोहडी त्यौहार है, प्रकृति को धन्यवाद कहने का, यह मकर संक्रान्ति के आगमन की दस्तक भी कहा जाता है।

  • लोहड़ी से जुड़ी मान्यताएं

लोहड़ी के पर्व के संदर्भ में अनेकों मान्यताएं हैं जैसे कि लोगों के घर जाकर लोहड़ी मांगी जाती हैं और दुल्ला भट्टी के गीत गाए

जाते हैं। कहते हैं कि दुल्ला भट्टी एक लुटेरा हुआ करता था लेकिन वह हिंदू लड़कियों को बेचे जाने का विरोधी था और उन्हें बचा कर वह उनकी हिंदू लड़कों से शादी करा देता था इस कारण लोग उसे पसंद करते थे और आज भी लोहड़ी गीतों में उसके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।

हिन्दु धर्म में यह मान्यता है कि आग में जो भी समर्पित किया जाता है वह सीधे हमारे देवों-पितरों को जाता है। इसलिए जब लोहड़ी जलाई जाती है तो उसकी पूजा गेहूं की नयी फसल की बालियों से की जाती है। लोहड़ी के दिन अग्नि को प्रजव्व्लित कर उसके चारों ओर नाच-गाकर शुक्रिया अदा किया जाता है।

यूं तो लोहड़ी उतरी भारत में प्रत्येक वर्ग, हर आयु के जन के लिये खुशियां लेकर आती है। परन्तु नवविवाहित दम्पतियों और नवजात शिशुओं के लिये यह दिन विशेष होता है। युवक -युवतियां सज-धज, सुन्दर वस्त्रों में एक-दूसरे से गीत-संगीत की प्रतियोगिताएं रखते है। लोहड़ी की संध्यां में जलती लकडियों के सामने नवविवाहित जोड़े अपनी वैवाहिक जीवन को सुखमय व शान्ति पूर्ण बनाये रखने की कामना करते हैं। सांस्कृतिक स्थलों में लोहड़ी त्यौहार की तैयारियां समय से कुछ दिन पूर्व ही आरम्भ हो जाती है।

  • लोहड़ी पर भंगड़ा और गिद्दा की धूम

लोहड़ी के पर्व पर लोकगीतों की धूम मची रहती है, चारों और ढोल की थाप पर भंगड़ा-गिद्दा करते हुए लोग आनंद से नाचते नज़र आते हैं। स्कूल व कालेजों में विशेष तौर पर इस दिन को मनाते हैं बच्चे नाच गाकर मजे करते नज़र आते हैं। मन को मोह लेने वाले गीत कुछ इस प्रकार के होते हैं कि एक बार को जाता हुआ बैरागी भी अपनी राह भूल जाए।

लोहड़ी के दिन में भंगडे की गूंज और शाम होते ही लकडियों की आग और आग में डाले जाने वाले खाद्धानों की महक एक गांव को दूसरे गांव व एक घर को दूसरे घर से बांधे रखती है। यह सिलसिला देर रात तक यूं ही चलता रहता है। बड़े-बड़े ढोलों की थाप, जिसमें बजाने वाले थक जायें, पर पैरों की थिरकन में कमी न हों, रेवडी और मूंगफली का स्वाद सब एक साथ रात भर चलता रहता है।

  • माघ का आगमन
लोहडी पर्व क्योंकि मकर-संक्रान्ति से ठीक पहले की संध्या में मनाया जाता है

लोहडी पर्व क्योंकि मकर-संक्रान्ति से ठीक पहले की संध्या में मनाया जाता है

लोहड़ी पर्व क्योंकि मकर-संक्रान्ति से ठीक पहले की संध्या में मनाया जाता है तथा इस त्यौहार का सीधा संबन्ध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से होता है। लोहड़ी पौष की आख़िरी रात को मनायी जाती है जो माघ महीने के शुभारम्भ व उत्तरायण काल का शुभ समय के आगमन को दर्शाता है और साथ ही साथ ठंड को दूर करता हुआ मौसम में बदलाव का संकेत बनता है।

पंजाब का परंपरागत त्योहार लोहड़ी केवल फसल पकने और घर में नए मेहमान के स्वागत का पर्व ही नहीं, यह जीवन में उल्लास बिखेरने वाला उत्सव है। लोहड़ी के मौके पर ऐसा ही उत्साह और उमंग पंजाबी समाज की विशेषता गुरुबानी व कुर्बानी का पर्व है। पंजाबी हमेशा गुरू की बानी और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों पर चलने की कोशिश करते हैं और कुर्बानी में भी आगे रहते हैं चाहे वह धर्म के लिए हो या देश के लिए।

लोहड़ी के दिन गुरुद्वारों में भी इस पर्व पर श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ रहती है। गुरुद्वारा बंगला साहिब एवं अन्य गुरुद्वारों के सरोवरों में लोग डूबकी लगाकर पुण्य प्राप्त करते हैं। गुरुद्वारों में विशेष शबद कीर्तन भी हो‍ता है। इस उत्सव के दिन का अनोखा ही नजारा रहता है जिसमें श्रद्धालुजन यमुना स्नान, गुरुद्वारों के पवित्र सरोवरों में स्नान एवं दान-पुण्य में मशगूल रहते हैं।

मकर संक्राति से पूर्व शाम के समय लोग लकड़ियां जलकर आग सेंकते हुए लोक गीतों का आनंद लेते हैं। ढोल की थाप पर थिकरते लोग गिद्दा और भांगड़ा करते हुए लोहड़ी पर्व मनाते हैं। इस उत्सव को विशेषकर पंजाब के लोगों द्वारा बड़े उत्साह के साथ बनाया जाता है। इस अवसर पर खुशी मनाते हुए रेवड़ी, गजक, मूंगफली एवं गुड चना बांटते हुए बधाइयां दी जाती हैं। नर-नारी, बालक-वृद्ध सभी एक साथ इस उत्सव में नाचने लगते हैं।

वस्तुतः इसके पीछे मकर संक्राति को प्रातः काल नदियों में स्नान करने के बाद आने वाले लोगों के लिए आग जलाकर रखने

मकर संक्राति से पूर्व शाम के समय लोग लकड़ियां जलकर आग सेंकते हुए लोक गीतों का आनंद लेते हैं

मकर संक्राति से पूर्व शाम के समय लोग लकड़ियां जलकर आग सेंकते हुए लोक गीतों का आनंद लेते हैं

का धार्मिक महत्व भी छिपा हुआ है। भारत की लोक संस्कृति में परोपकार की भावना निहित होती है। देश भर में लोहड़ी की धूम मची रहती है। लोग ढोल नगाड़ों के साथ मस्ती में झूमते हुए एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

पंजाबी लोग जहां भी जाते हैं अपने गीत, त्योहार और संस्कृति से हमेशा जुड़े रहते हैं। पंजाब का आदमी कहीं भी रहे वह अपनी मेहनत से अपनी पहचान बना लेता है। पंजाबी समाज देश-प्रदेश व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। लोहड़ी जैसे परंपरागत त्योहार सभी को उत्साह व उमंग से भर देते हैं। इस त्योहार के माध्यम से समाज में आपसी मेल-मिलाप व भाईचारा बढ़ता है। ऐसा लगता है कि पूरा पंजाब उमड़कर एक जगह आ गया हो।

लोहड़ी खुशहाली का संदेश लेकर आती है। नए साल का यह पहला त्योहार लोगों के दिलों को खुशियों से भर देता है।

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