बुजुर्ग दम्पति

उम्र रूकती नहीं, वक्त ठहरता नहीं…..

बुजुर्गों का करें सम्मान

 

छोटा सा बचपन कब यौवन से बुढ़ापे में
चला जाता है पता नहीं चलता।
कब एक नन्हा पौधा, पेड़ से सूखी लकड़ी
बन जाता है पता नहीं चलता।
कब एक जीवन कई परिस्थितियों से होकर
बीत जाता है पता नहीं चलता।
हम ओर, ओर करते रहे जाते हैं, लेकिन
कुछ ओर तो होता ही नहीं, पर पता नहीं चलता।
छोटा सा जीवन, करोड़ों की भूख
छोटी सी भूख, रोटी की, लेकिन पता नहीं चलता।

आज उम्र की जिस दहलीज़ पर मैं हूं कल कोई ओर होगा और उधर जिस दहलीज़ पर वो बुजुर्ग हैं वहां मैं। जीवन के कितने उतार-चढ़ाव को पार करती जिंदगी आखिर एक ना एक दिन थक ही जाती है। इसलिए आवश्यक हैं कि जीवन के उस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते हम इस सच्चाई को अपनी युवावस्था में भी कभी नज़र अंदाज़ न करें।

बुजुर्गों का सम्मान करें। उन्हें सम्मान दें क्योंकि बुजुर्ग हर युवावस्था के आने वाले कल का आईना होते हैं जो हमें जीवन में हर कदम पर शिक्षा, संस्कृति, हमारे धर्म और हमारी एकता से अक्सर अवगत करवाते हैं। वो बोलकर भी शिक्षा देंगे जीवन का हर पड़ाव आपको जीवन में बहुत कुछ सीखा जाता है। लेकिन जीवन का ही एक पड़ाव ऐसा भी आता है जिसे देखकर हमें सीखने को बहुत कुछ मिलता है। एक दिन इस मोड़ पर पहुंचना तो सभी को है, फिर भी हम जान बुझकर उस सच्चाई से आंखें चुराते हुए आगे निकल जाते हैं। दूर जाने की शायद आवश्यकता नहीं होती हमें तो अपने आस-पास ही देखने-सुनने और समझने को बहुत कुुछ मिल जाता है। जी हां यहां बात हो रही है हमारे बुजुर्गों की।

कुछ ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति जो आज भी एक-दूसरे के साथ हैं। या फिर हमारे भरोसे पर हमारे साथ हैं। उम्र के उस दौर पर जहां बहुत कम लोग साथ होते हैं, जहां शरीर ठीक ढंग से उनका साथ नहीं निभा पा रहा। फिर भी पूरे परिवार को अपने साथ जोड़े हैं। हर रिश्ते को बांधे है। जो आज भी एक-दूसरे का साथ निभा रहे हैं साथ ही पूरे परिवार को प्यार के साथ एकता के धागे में पिरोए हुए हैं। हमें शिक्षा देते हैं कि जीवन में रिश्तों की अहमियत को समझें। जो रिश्ते हम बनाते हैं उन्हें जीवन भर प्यार और विश्वास से निभाएं क्योंकि बहुत कम लोगों को उम्र के इस पड़ाव तक साथ आने का अवसर मिलता है।

अपनी सेहत का ख्याल रखें सादा जीवन जीएं सादा भोजन खाएं। ताकि उम्र के हर पड़ाव में कुछ हद तक आपको अपने को संभालने की शक्ति हो। एक ऐसे ही डोगरा दपंति से मेरा मिलना हुआ जो उम्र के उस पड़ाव में एक-दूसरे के साथ हैं जहां बहुत कम एक लोग एक-दूसरे के साथ होते हैं।

जीवन के हर व्यक्ति की कोई न कोई व्यथा जरूर होती है। जैसे मैंने शुरू में कहा कि जीवन का हर पड़ाव शिक्षा जरूर देता

Baddu

वडओ माता जी

है। जी पहले बात करते हैं उस इंसान की जो अपने आस-पास के लोगों के बीच बचपन से पुरूषों के मुकाबले काम करने के लिए वडडे के नाम से जानी जाती रही हैं। इनके लिए कहा जाता है कि पुरूष भी इनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। चूल्हा चोका, बेटियों का पालन-पोषण, उन्हें पढ़ाना, खेतों को देखना, पशु पालना इत्यादि और भी न जाने क्या-क्या। कमर तोड़ मेहनत।

वहीं जब मुझे आज उनसे मिलने का सौभागय प्राप्त हो तो भी वो वैसीं ही नजर नहीं आईं जैसे बरसों पहले मैंने उन्हें देखा था। सफेद बाल, भोलापन तो आज भी वही था, आवाज़ अब भी दमदार है जैसे पहले हुआ करती थी। लेकिन आंखों में एक उदासी बातों में एक मायूसी जरूर थी। उन्हें उनकी बेटी ने कोई भी कमी नहीं रखी थी, लेकिन जिदंगी ने उन्हें उनको दुखों से तोड़ कर रख दिया था। उस पर शरीर ही साथ नहीं देता। हालांकि वे आज भी सब कुछ खुद करना चाहती हैं अपने दुखों से लडऩा चाहतीं हैं लेकिन कभी-कभी उनके मन का अकेलापन उन्हें उनके दुख से दूर नहीं होने देना चाहता। मन काम करना चाहता है लेकिन शरीर चलते तक की इजाजत नहीं देता।

हाथ-पांव में अब वो ताकत नहीं रही। जो हाथ हज़ारों के काम के लिए उठते थे आज खुद के काम के लिए नहीं हिलते। अक्सर ख्याल आता है जीवन के इस पड़ाव में आकर इंसान इतना बेबस और लाचार क्यों हो जाता है। जब भी वो या फिर

Kusum Sharma

कुसूम शर्मा

शायद रोज़ ही अकेले बैठकर अपने पूरे जीवन का मंथन करती होंगी, क्या पाया क्या खोया। कितने अपने छूट गए। कितने रिश्ते टूट गए। कितने मुझे समझ न पाए और कितने ही मेरा दिन दुखाकर चले गए। तो शायद उनके उस दर्द को समझ पाना किसी के लिए भी इतना आसान न होगा।

कुसुम शर्मा जी जिनकी उम्र 7० के आसपास है। उन्हें

जो अक्सर कभी-कभी अकेली होती हैं और जाने किन विचारों में जीवन के अच्छे-बुरे वक्त के साथ अपने आपको विचारों के मंथन में पाती हैं। हालांकि परिवार और पड़ोस दोनों के लिए ये हमेशा चिंतित रहती हैं क्योंकि इनका कहना है कि परिवार और पड़ोस दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। आज वक्त वैसा नहीं है लेकिन इनकी सोच आज आस-पड़ोस में कहीं न कहीं संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को एक-दूसरे से जोड़े तथा जीवित रखे है।

वहीं सरदार निरंजन जी और उनके मित्र ओमप्रकाश शर्मा जी दोनों की जहां 87 के आसपास की उम्र है। वे अब भी अपनी

Niranjan& Omprakash

निरजन सिंह, ओमप्रकाश शर्मा

सेहत को लेकर हमेशा फिक्रमंद रहते हैं। उनका कहना है कि हमेशा नियम हो सुबह-शाम की वॉक सादा खाना और नशे से दूरी का तो इस उम्र के पड़ाव में काम आता है। अपना ख्याल रखना सबसे जरूरी है। क्योंकि सेहत सही तो सब सही। लेकिन आज के कुछ युवाओं की बात तो कुछ ऐसी है कि न खुद सही, और न ही उनकी सेहत सही। जीवन के इस पड़ाव पर तो शायद वो लोग कभी खुद को ही ठीक से खड़ा भी न कर पाएं। ऐसे लोगों को सरदार जी और शर्मा जी से सबक लेना चाहिए। हमें बड़ों का हमेशा सम्मान करना चाहिए।

Ramesh chand sharma

रमेश चन्द शर्मा

वहीं रमेश शर्मा जी जिनकी उम्र 72 के आसपास है उनका कहना है कि जीवन में समय एक सा नहीं रहता लेकिन हर परिस्थिति में जीना तो है इसलिए जरूरी है कि हर उम्र के पड़ाव में सीखा जाए। पॉजिटिव सोच रखी जाए। बच्चे आज के हमारे समय के बच्चों से बहुत अलग हैं लेकिन पड़ाव तो जीवन के सभी पार करने होगें। इसलिए हमेशा हर व्यक्ति को साधारण जीवन और ऊंची सोच में जीवन जीना चाहिए।

मेरे कहने का मतलब बस इतना ही है कि जैसा आज है वैसा कल नहीं होगा। आपके ओर मेरे सामने सच्चाई है। हमें उस पड़ाव से गुजरना होगा तो फिर आज पर इतना इतराना क्यों? जानते हैं तो हम सभी इस बात को लेकिन दोस्तों समझाना भी तो जरूरी है। इसलिए विनम्र और संवेदनशील बनो। क्योंकि वो दौर भी गुजर गया तो ये दौर भी गुजर जाएगा। आज जहां तू खड़ा है वहां कल कोई ओर तेरी जगह नज़र आएगा।

शीशे में अख्स अपना देखा, तो देखकर खुद को गरूर आ गया
कुछ लोगों ने क्या तारीफ कर दी मेरी, कि मुझपे खुमारी का सरूर छा गया
तभी रास्ते में खड़े बुजुर्ग को देख, मैं कुछ खीज़ सी खा गया
मुमकिन था जोश में था मैं, उस वक्त मुझे मेरा गरूर खा गया
बुजुर्ग ने रोक कर कहा मुझे, मुझसे भी तो मिल
तेरे आने वाले कल का, एक अख्स हूं मैं
आसमां में उडऩे वाले को जैसे ज़मीन में चलने का हुनर आ गया

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