प्रकृति की जन्नत: किन्नौर

प्रकृति की जन्नत: किन्नौर

किन्नौरकल्पा

यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कड़े पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साड़ी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है। किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शॉल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है। उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपड़े, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्तूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है। इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कड़ों का सैलाब उमड़ता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बड़े चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा

कल्पा- ओल्ड हिन्दुस्तान तिब्बत रोड़ पर स्थित कल्पा किन्नौर का प्रारंभिक जिला मुख्यालय था। समुद्र तल से 2759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव शिमला से 260 किमी. दूर है। हेरिटेज विलेज की तमाम खूबियां यहां देखी जा सकती हैं। प्रात: काल में बर्फीले पहाड़ों के बीच में उगता हुआ सूर्य की स्वर्णिम आभा यहां से बेहद खूबसूरत लगती है। यहां का नारायण नागनी मंदिर स्थानीय कला का बेजोड़ उदाहरण है। कल्पा में अनेक प्राचीन बौद्ध मठ बने हुए हैं। यह गांव 6०5० मीटर ऊंचे किन्नर कैलाश के बहुत ही निकट स्थित है। किन्नर कैलाश को भगवान शिव का शीतकालीन आवास माना जाता है।

  • सांगला- किन्नौर का यह लोकप्रिय गांव बास्पा नदी के दायें तट पर स्थित है। समुद्र तल से 2621 मीटर ऊंचा स्थित यह गांव अपनी अति
सांगला

सांगला

उपजाऊ भूमि के लिए लोकप्रिय है। यह गांव ढलान पर बसा हुआ है जिसके पीछे रालदांग पर्वत की विशाल चोटियां देखी जा सकती हैं। यहां के जंगलों और सदैव बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुंदरता इसे अन्य स्थानों से अलग बनाती है। बास्पा नदी के बहने के कारण इस स्थान को बस्पा घाटी भी कहा जाता है। यह घाटी किन्नौर जिले की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। सांगला – (2,860 मी.) किन्नौर क्षेत्र में सबसे बड़ा एवं दर्शनीय गांव हैं, जो करचम से 18 कि.मी. दूर हैं। यहां केसर के खेत, फलोद्यान और ऊपर जाने पर आल्पस के चरागाह हैं। किन्नौर कैलाश चोटी मन मोह लेती हैं। यहां से काली देवी का किले जैसा मंदिर ‘कमरू फोर्ट‘ भी देखा जा सकता हैं।

सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है। रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड़ गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड़ दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पड़ता है। करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढ़ाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पड़ती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं।

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2 Responses

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  1. Dalbir Singh
    Jun 05, 2016 - 11:20 PM

    अति सुंदर

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    • मीना कौंडल
      Jun 06, 2016 - 12:14 PM

      धन्यवाद दलबीर जी।

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