चामुंडा में होगा “गुरु- शिष्य” परंपरा के अंतर्गत विश्वविख्यात पहाड़ी चित्रकला प्रशिक्षण केंद्र स्थापित

चामुंडा में पहाड़ी चित्रकला प्रशिक्षण शिविर आज से शुरू

शिमला: हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी की अनेक महत्त्वपूर्ण योजनाओं में से एक योजना है “गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत पहाड़ी चित्रकला एवं लोक कलाओं और लुप्त हो रही प्राचीन लिपियों के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना”। सचिव अकादमी अशोक हंस ने बताया कि अकादमी ने लगभग 25 वर्ष पहले विश्वविख्यात पारंपरिक पहाड़ी लघु चित्रकला शैली के आठवीं पीढ़ी के विख्यात चित्रकार चंदू लाल रैणा (स्व.) को गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत गुरु तैनात करके धर्मषाला में पहाड़ी चित्रकला प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया था, जिसमें 9 शिष्यों को प्रशिक्षण दिया गया था। बाद में यह प्रशिक्षण केंद्र ज़िला कांगड़ा के लदवाड़ा गांव में स्थानांतरित किया गया और गुरु चंदू लाल रैणा ने वहां भी 4 शिष्यों को पहाड़ी चित्रकला में प्रशिक्षण दिया।

सचिव अकादमी अशोक हंस ने आगे बताया कि चंदू लाल रैणा के उन शिष्यों में से ही एक षिष्य मुकेश कुमार धीमान, जो वर्तमान में चामुंडा मंदिर में पहाड़ी चित्रकला के कलाकार के रूप में कार्य कर रहे हैं, को वर्तमान में अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. प्रेम शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित कार्यकारी परिषद द्वारा अकादमी की ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ के अंतर्गत गुरु तैनात किया गया है। वे पांच शिष्यों को पहाड़ी चित्रकला का प्रशिक्षण देंगे।

इस प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन चामुंडा मंदिर में 19 नवंबर, 2015 को किया जाएगा। गुरु द्वारा शिष्यों को एक मास में कम-से-कम 20 दिनों तक 2 घंटे प्रतिदिन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। अकादमी द्वारा गुरु को 3000 रुपये प्रति मास का मानदेय तथा प्रत्येक शिष्य को 700 रुपये प्रतिमास की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी गुरु चंदू लाल रैणा के उपरांत अकादमी द्वारा पहाड़ी चित्रकला में गुरु ओम प्रकाश सुजानपुरी और गुरु विजय शर्मा के अधीन शिमला और चंबा में ऐसे प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए थे। हाल ही में अकादमी द्वारा नाहन में मास सितंबर में गुरु नरेश पाबुच के अधीन पाबुची लिपि का भी एक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया गया है। इससे पहले टांकरी लिपि का भी गुरु हरि कृष्ण मुरारी के अधीन एक केंद्र अकादमी द्वारा स्थापित किया गया था।

सचिव अकादमी अशोक हंस ने बताया कि वर्तमान में स्थापित ये केंद्र एक वर्ष तक चलेंगे, तदुपरांत अन्य लोक कलाओं व लिपियों के केंद्र स्थापित किए जाएंगे।

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