गेहूँ विश्वव्यापी फसल...

गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए मटियार दोमट भूमि सबसे अच्छी : डॉ. वालिया

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र उद्यान अमरतारा एवं क्षेत्रीय केंद्र गेहूं टूटीकंडी का समायोजन 1अप्रैल 2००5 को किया गया

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र उद्यान अमरतारा एवं क्षेत्रीय केंद्र गेहूं टूटीकंडी का समायोजन 1 अप्रैल 2005 को किया गया

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र उद्यान अमरतारा एवं क्षेत्रीय केंद्र गेहूं टूटीकंडी का समायोजन 1 अप्रैल 2005 को किया गया। गेहूं व जौ में रतुआ रोग की महत्व व इनकी पुनर्सजृन पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले संबंधित पौधों में शरण लेने से होती है, जिसको ध्यान में रखते हुए डॉ वी.पी. की देखरेख व डॉ. के.सी. मेहता के सहयोग से वर्ष 1935 में एक अनुसंधान परियोजना रतुआ अवरोधक पर्वतीय गेहूं प्रजनन को शुरू किया गया। यह परियोजना जोकि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का हिस्सा थी जिसको वर्ष 1951 में गेहूं प्रजनन उप-केंद्र टूटी कंडी शिमला के रूप में स्थापित किया गया। इस परिसर में प्रयोगशाला भवन, दो गलास हाऊस, एक प्रक्षेत्र प्रयोगशाला भवन तथा लगभग 3 हैक्टेयर भूमि में सीढ़ीनुमा खेत है। यह केंद्र अखिल भारतीय समन्वित गेहूं एवं जौ सुधार परियोजना के अंतर्गत उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए समन्वयक के रूप में भी कार्य कर रहा है। इस बार हम अपने किसानों को गेहूं के विषय में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं ताकि हमारे किसानों को गेहूं की कृषि के बारे में बेहतर और लाभदायक जानकारी प्राप्त हो सके और उन्हें गेहूं की खेती के लिए इसका फायदा मिल सके। इस विषय में हिमाचल प्रदेश के भारतीय अनुसंधान केंद्र टूटीकंडी शिमला के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धर्मपाल वालिया व वैज्ञानिक मधु पटियाल से “हिम शिमला लाइव” की संपादक मीना कौंडल की बातचीत के महत्वपूर्ण अंश:

प्रश्न : गेहूं क्या है?

उत्तर: गेहूं मध्य पूर्व के लेवांत क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व भर में भोजन के लिए उगाई जाने वाली धान्य फसलों में मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है। धान का स्थान गेहूं के ठीक बाद तीसरे स्थान पर आता है। गेहूं के दाने और दानों को पीसकर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबलरोटी (ब्रेड), कुकीज, केक, दलिया, पास्ता, रस, सिवईं, नूडल्स आदि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। गेहूं का किण्वन कर बियर, शराब, वोद्का और जैव ईंधन बनाया जाता है। गेहूं को एक सीमित मात्रा में पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है और इसके भूसे को पशुओं के चारे या छत/छप्पर के लिए निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि दुनिया भर में आहार प्रोटीन और खाद्य आपूर्ति का अधिकांश गेहूं द्वारा पूरा किया जाता है, लेकिन गेहूं में पाये जाने वाले एक प्रोटीन ग्लूटेन के कारण विश्व का 10 से 20 प्रतिशत लोगों में से एक व्यक्ति पेट के रोगों से ग्रस्त है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की इस प्रोटीन के प्रति हुई प्रतिक्रिया का परिणाम है।

प्रश्न : गेहूं का महत्व विस्तृत रूप से बताएं?

उत्तर: गेहूं (ट्रिटिकम जाति) विश्वव्यापी महत्व की फसल है। यह फसल नानाविध वातावरणों में उगाई जाती है। यह लाखों लोगों का मुख्य खाद्य है। विश्व में कुल कृषि भूमि के लगभग छठे भाग पर गेहूं की खेती की जाती है यद्यपि एशिया में मुख्य रूप से धान की खेती की जाती है तो भी गेहूं विश्व के सभी प्रायद्वीपों में उगाया जाता है। यह विश्व की बढ़ती जनसंख्या के लिए लगभग 20 प्रतिशत आहार कैलोरी की पूर्ति करता है। वर्ष 2007-08 में विश्वव्यापी गेहूं उत्पादन 62.22 करोड़ टन तक पच गया था। चीन के बाद भारत गेहूं दूसरा विशालतम उत्पादक है। गेहूं खाद्यान्न फसलों के बीच विशिष्ट स्थान रखता है। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन गेहूं के दो मुख्य घटक हैं। गेहूं में औसतन 11-12 प्रतिशत प्रोटीन होता हैं।

प्रश्न : गेहूं की बुआई कब की जाती है? गेहूं की कौन सी प्रजाति अधिक उपजाऊ मानी जाती है?

उत्तर: गेहूं मुख्यत: विश्व के दो मौसमों, यानि शीत एवं बसंत ऋतुओं में उगाया जाता है। गेहूं की प्रजाति एचएस. 507 को उत्तरी पर्वतीय राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर व उत्तरी पूर्वी राज्यों के सिंचित असिंचित भूमि में बीजाई के लिए अनुमोदित किया गया है। इस किस्म की बीजाई असिंचित दशा में 15-30अक्टूबर व सिंचित दशा में 1 से 15 नवंबर तक करना उपयुक्त है। यह प्रजाति सिंचित व असिंचित क्षेत्रों में क्रमश: 46.8 क्विंटल व 26.6 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की दर से उपज देती है। यह गेहूं में लगने वाले पीला रतुआ, भूरा रतुआ, पत्ती झुलसा व करनाल वंट रोगों के लिए प्रतिरोधक है। शुरूआती बढ़वार के समय इस प्रजाति में कल्ले फैलाव के साथ आने का गुण है जोकि वारानी दशा में नमी सिंचित करने के लिए कारगार सिद्ध होता है। इस प्रजाति के दाने सुनहरे रंग तथा मध्यम कठोर है जो अच्छी चपाती व ब्रैड बनाने की गुणवत्ता रखते हैं। यह किस्म एच.एस. 240 के स्थान पर उपजाने व वी.एल.907 के लिए अच्छा विकल्प है।

प्रश्र: हमारे देश व प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की खेती मुख्यत: रबी के मौसम में की जाती है क्या ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए वातावरण की अनुकूलता को ध्यान में रखकर आपके संस्थान में ऐसी गेहूं की किस्म उपलब्ध है?

उत्तर: जी हां। अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, लाहौल स्पिति, पांगी भरमौर वहीं जम्मू कश्मीर के कारगिल, लेह व लद्दाख में इन अनाजों की खेती ग्रीष्म ऋतु में की जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की दोगली किस्में जिनकी अनुवांशिकी में स्प्रिंग व विंटर टाईप के गुण विद्यमान हो, वह उचित रहती है। अत: इन सभी परिस्थितियों व वातावरण की अनुकूलता को ध्यान में रखते हुए हमारे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केंद्र टूटीकंडी शिमला से एचएस. 375 की किस्म विकसित की गई है जो अच्छी उपज देने वाली व रतुआ रोग प्रतिरोधी है। है। इस प्रजाति की औसत उपज 26.6 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। यह प्रजाति पीले व भूरे रतुये तथा पर्वतीय बंट रोगों के लिए प्रतिरोधक है। इस प्रजाति के दाने सुनहरे रंग तथा मध्यम कठोर है जो अच्छी चपाती के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति में प्रोटीन की औसतन मात्रा 10. 3 प्रतिशत है।

प्रश्र: बेहतर उपज देने वाली नई उन्नत किस्में व रतुआ रोग प्रतिरोधी कौन सी हैं?

उतर: बेहतर उपज देने वाली नई उन्नत किस्में एच.एस. 507 पूसा सुकेती, एच.एस. 490 पूसा बेकर, एच.एस. 420 शिवालिक व एच.एस. 375 हिमगिरी हैं।

प्रश्र: गेहूं कितनी प्रकार का होता है? इसकी कौन सी बेहतर किस्में है जो हिमाचल में पाई जाती हैं?

उत्तर: गुणवत्ता को ध्यान में रखकर गेहूं को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है- मृदु गेहूं एवं कठोर गेहूं। ट्रिटिकम ऐस्टिवम (रोटी गेहूं) मृदु गेहूं होता है और ट्रिटिकम डयूरम कठोर गेहूं होता है।

प्रश्र: कई बार किसान समय पर बुआई नहीं कर पाते हैं तो पछेती बीजाई के लिए कौन सी किस्म उपयोगी रहती है?

उत्तर: गेहूं की इस प्रजाति एच.एस.490 को उत्तरी पर्वतीय राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर व उत्तरी पूर्वी राज्यों में सीमित सिंचाई की दशा में पछेती बीजाई के लिए अनुमोदित किया गया है। इस किस्म की बीजाई 1-15 दिसंबर तक करना उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 31 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा क्षमता 50 क्विंटल तक है। यह प्रजाति रतुआ रोगों के लिए प्रतिरोधक है। यह किस्म जल्दी पकने वाली है जोकि 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इनमें बीटा केरोटीन, आयरन, जींक, जस्ता तथा मैगनीज की भी प्रचुर मात्रा होती है। इसके दाने मोटे, लंबे तथा सुनहरे रंग के हैं। यह प्रजाति सोनालिका एस. 308 व एच.एस. 295 के स्थान पर उपजाने तथा एच.एस. 420 व बी.एल. 892का एक बहुत अच्छा विकल्प है।

गेहूँ (ट्रिटिकम जाति) विश्वव्यापी महत्व की फसल

गेहूँ (ट्रिटिकम जाति) विश्वव्यापी महत्व की फसल

प्रश्र: अगेती, कम उर्वरा व असिंचित परिस्थिति में कौन सी प्रजाति गेहूं की खेती के लिए लाभदायक रहती है?

उत्तर: ऐसी परिस्थिति के लिए केंद्र द्वारा एच.एस. 277 प्रजाति विकसित की गई जिसकी खेती किसानों द्वारा सफलतापूर्वक की जा रही है। इस प्रजाति में कम तापमान को सहन करने की क्षमता भी है। लेकिन अब इसके विकल्प के रूप में गेहूं की नई प्रजाति वी.एल. 829 बीजाई के लिए लाभदायक है। इस प्रजाति को 75 दिनों के बाद हरे चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और कटाई के बाद इसका लाभ पुन: किसान उठा सकते हैं।

प्रश्र: नियमित समय पर सिंचित व असिंचित दशा में बुआई के विषय में जानकारी दें?

उत्तर: उत्तर पर्वतीय क्षेत्र का लगभग 83 प्रतिशत क्षेत्र असिंचित है। इस केंद्र द्वारा विकसित एचएस. 240 प्रजाति सिंचित व असिंचित परिस्थितियों में अच्छी पैदावार दे रही है तथा पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों की सबसे लोकप्रिय प्रजाति है। यह प्रजाति दूसरे देशों जैसे नेपाल व मंगोलिया में भी प्रचलित है। नियमित दशा में सिंचित व अंसिचित दशा में बुआई का समय भिन्न होता है असिंचित दशा के लिए समय पर खेत में हल चलाकर सुहागा लगाना चाहिए जिससे उपलब्ध नमी संग्रहित रह सके। असिंचित दशा में बुआई 15 अक्टूबर 30 अक्टूबर के मध्य अवश्य कर लेनी चाहिए। परंतु सिंचित अवस्था में बुआई 1 नवंबर से 15 नवंबर के मध्य करनी चाहिए।

प्रश्र: पछेती बुआई एवं असिंचित परिस्थिति में आप किसानों के लिए क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर: उत्तर पर्वतीय भाग के लगभग 30-35 प्रतिशत क्षेत्र में गेहूं की बुआई देरी से की जाती है। बुआई के लिए उपयुक्त नमी न होने के कारण किसानों को कभी-कभी गेहूं की बुआई दिसंबर माह तक करनी पड़ती है। इन परिस्थिति के लिए केंद्र द्वारा एसएस. 295 का विकास किया गया है जोकि पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं के विकास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धी रही है तथा किसानों की सबसे लोकप्रिय प्रजाति है। वर्ष 2003 में एक और प्रजाति शिवालिक एचएस 420 किसानों की सेवा में अनुमोदित की गई जिसको प्रचालित करने के प्रयास किये जा रहे हैं।

प्रश्र: अच्छी किस्म की गेहूं की पैदावार के लिए किसानों को क्या करना चाहिए?

उत्तर: भिन्न-भिन्न राज्यों में अपनी महत्वपूर्ण स्थानीय किस्में भी उपलब्ध हैं। अच्छी किस्मों की अब कमी नहीं हैं। किसान अपने अनुभव के आधार पर, स्थानीय प्रसार कार्यकर्ता की सहायता से अच्छी व अधिक पैदावार वाली किस्में चुन लेता है। अच्छी पैदावार के लिए अच्छे बीज की आवश्यकता होती है और इस बारे में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। भूमि का चुनाव गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए मटियार दोमट भूमि सबसे अच्छी रहती है, किन्तु यदि पौधों को सन्तुलित मात्रा में खुराक देने वाली पर्याप्त खाद दी जाए व सिंचाई आदि की व्यवस्था अच्छी हो तो हलकी भूमि से भी पैदावार ली जा सकती है। क्षारीय एवं खारी भूमि गेहूं की खेती के लिए अच्छी नहीं होती है। जिस भूमि में पानी भर जाता हो, वहां भी गेहूं की खेती नहीं करनी चाहिए। हमारे किसान समन्यत: गेहूं की बीजाई छींटा मारकर करते हैं यदि किसान लाइनों में बीजाई करें तो अच्छी पैदावार की जा सकती है।

प्रश्र: गेहूं की फसल उगाने के लिए भूमि किस प्रकार से तैयार की जानी चाहिए?

उत्तर: खेत की मिट्टी को बारीक और भुरभुरी करने के लिए गहरी जुताई करनी चाहिए। बुआई से पहले की जाने वाली परेट (सिंचाई) से पूर्व तवेदार हल (डिस्क हैरो) से जोतकर पटेला चला कर मिट्टी को समतल कर लेना चाहिए। बुआई से पहले 25 कि.ग्रा.। प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 1 प्रतिशत बी. एच. सी मिला देने से फसल को दीमक और गुझई के आक्रमण से बचाया जा सकता है। यदि बुआई से पहले खेत में नमी नहीं है तो एक समान अंकुरण के लिए सिंचाई आवश्यक है।

प्रश्र: गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए कौन सी महत्वपूर्ण बातें हैं जो ध्यान में रखनी चाहिए?

उत्तर: भौगोलिक परिस्थिति एवं वातावरण की अनुकूलता अनुसार सही प्रजाति का चयन व शुद्ध एवं शोधित प्रमाणिक बीज का उपयोग उचित रखना अति आवश्यक है। वहीं संतुलित उर्वरकों के अलावा, गोबर की खाद या कम्पोस्ट या केंचुआ खाद का उपयोग भूमि की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिए आवश्यक है जिसका ध्यान रखना जरूरी है। असिंचित क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के जल का संग्रहण करके उसका समुचित उपयोग लाभदायक रहता है। बीज जनित बीमारियां कडंवा रोग पर नियंत्रित करने के लिए बीज को वीटावैक्स या वेबीस्टीन की 2 ग्राम प्रतिकिलो ग्राम बीज के दर से उपचारित करके बीजाई करें। फसल की कटाई के बाइ इसके अवशेष न जलाएं। ताकि भूमि में उपस्थित लाभदायक सुक्ष्म जीवों को नष्ट होने से बचाया जा सके। ऐसा करने पर भूमि बंजर होने बच सकेगी और पर्यावरण भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

प्रश्र: किसानों को कितनी मात्रा में खेत में बीज डालना चाहिए?

उत्तर: सामान्यत: समय पर बीजाई व अगेती बीजाई के लिए मध्यम आकार के दानों की प्रजाति का 100 किलो ग्राम यानि 8 किलो ग्राम प्रति बीघा प्रति हेक्टियर बीज डालना चाहिए। लेकिन वहीं पछेती बीजाई के लिए 25 प्रतिशत से अधिक बीज डालने की सलाह दी जाती है।

प्रश्र: आप किसानों को कौन-कौन सी खाद कितनी मात्रा में प्रयोग करने की सलाह देते हैं?

उत्तर: असिंचित दशा में 40 किलो प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन व 20 किलो प्रति हेक्टेयर फास्फोरस डालने की सलाह दी जाती है। और वहीं सिंचित अवस्था में 120 किलो प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन, 60 किलो प्रति हेक्टेयर फॉस्फोरस व 60 किलो प्रति हेक्टेयर पोटाश प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा की बीजाई के समय व शेष आदि मात्रा को दो बार में पहली और दूसरी सिंचाई के बाद प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्र: रतुआ रोगों से गेहूं की फसलों का बचाव किस प्रकार किया जा सकता है?

उत्तर: रतुआ रोगों द्वारा किए जाने वाले नुकसान से फसलों को बचाने के लिए रतुआ रोगधी प्रजातियों का चयन करना चाहिए और पीला रतुआ रोग का प्रकोप होने पर प्रोपीकोनाजोल 0.1 प्रतिशत का छिडक़ाव करने पर इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्र: क्या कोई किसान आपके पास फसलों संबंधी जानकारी लेने आ सकता है?

उत्तर: जी हां, हमारे  संस्थान में कोई भी किसान आकर फसलों व उनकी किस्मों संबंधी जानकारी ले सकता है। किसान भाईयों को हम तकनीकी सलाह, फसलों के रोग, उनके बचाव की विस्तृत जानकारी देने के लिए हमेशा तैयार है ताकि हमारे किसानों को कृषि संबंधी सही जानकारी मिल सके।

 

 

 

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