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वसीयत के बारे में कई अहम बातों की जानकारी होना आवश्यक: अधिवक्ता रोहन सिंह चौहान

क्या होती है वसीयत?

अधिवक्ता - रोहन सिंह चौहान

अधिवक्ता – रोहन सिंह चौहान,शिमला

आइये जानें…… क्या करें, कैसे करें “वसीयत”

क्या होती है वसीयत? क्या करें, कैसे करें

भारतीय कानून के मुताबिक किसी भी धर्म और भाषा का व्यक्ति वसीयत करवा सकता है, लेकिन अगर वसीयत नहीं की गई है तो जायदाद के बंटवारे के लिए कोर्ट जाना होगा। कोर्ट इस बारे में फैसला करते वक्त उनके धर्म में मौजूद कानून को ध्यान में रखेगा। ऐसी स्थिति में हिंदू धर्म मानने वालों पर हिंदू लॉ लागू होता है, मुस्लिम धर्म मानने वालों पर शरीयत के मुताबिक लॉ लागू होता है। इसी तरह गैर-हिंदू और गैर-मुस्लिम लोगों का फैसला इंडियन सक्सेशन ऐक्ट के मुताबिक होता है। वसीयत पर अगर कोई उंगली नहीं उठाता है तो सब ठीक है, लेकिन अगर इस मामले में कोई कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो कानून पूरे मामले की पड़ताल करेगा।
मौत के बाद अपनी जायदाद के इस्तेमाल का हक किसी को सौंपने का फैसला अपने जीते जी लेना वसीयत कहलाता है। वसीयत करने वाला वसीयत में यह बताता है कि उसकी मौत के बाद उसकी जायदाद का कितना हिस्सा किसे मिलेगा।

आवश्यक क्यों है?- अगर किसी ने वसीयत नहीं कराई है और उसकी मौत हो जाए तो जायदाद के बंटवारे को लेकर पारिवारिक झगड़ा होने का डर रहता है। वसीयत न करवाने से प्रॉपटी पर किसी अनजान आदमी के कब्जा करने का अंदेशा रहता है। अगर बेटियों को भी हक देना चाहते हैं तो वसीयत से ऐसा करना पक्का हो जाता है।

किस-किस चीज की वसीयत –खुद की कमाई हुई चल संपत्ति जैसे कैश, घरेलू सामान, गहने, बैंक में जमा रकम, पीएफ, शेयर्स, किसी कंपनी की हिस्सेदारी। खुद की कमाई हुई अचल संपत्ति जैसे जमीन, मकान, दुकान, खेत आदि। पुरखों से मिली कोई भी चल या अचल संपत्ति जो आपके नाम है।

कब करवाएं –रिटायरमेंट के फौरन बाद ही वसीयत करा देना अच्छा होता है। वसीयत करवाने का सबसे अच्छा वक्त है 60 साल की उम्र। अगर कोई शख्स कम उम्र में किसी गंभीर बीमारी से पीडित़ है तो वसीयत पहले भी कराई जा सकती है।

वसीयत का आम तरीका –वसीयत का कोई तय फॉर्म नहीं होता। यह सादे कागज पर भी लिख सकते हैं। अपने हाथ से लिखी वसीयत ज्यादा अच्छी रहती है। जायदाद जिसके नाम कर रहे हैं, उसके बारे में साफतौर से लिखें। उसका नाम, पिता का नाम, पता और उसके साथ अपना रिश्ता जरूर बताएं। अपनी पूरी जायदाद की ही वसीयत करनी चाहिए। जिस जायदाद की वसीयत नहीं की जाएगी, उस पर मौत के बाद झगड़ा होने का खतरा रहेगा। अगर पार्टनर के साथ जॉइंट प्रॉपटी है, तो केवल उस जायदाद की ही वसीयत की जा सकती है, जो वसीयत करने वाले के नाम है। पार्टनर की जायदाद की वसीयत का अधिकार पार्टनर को ही है। अगर दोनों बराबर के हिस्सेदार हैं तो एक पार्टनर सिर्फ 50 फीसदी हिस्से की ही वसीयत कर सकता है। वसीयत किसी भी भाषा में कर सकते हैं। स्टांप ड्यूटी अनिवार्य नहीं है। वसीयत में कभी भी और कितनी भी बार बदलाव कर सकते हैं। कोशिश करें कि वसीयत छोटी हो और एक पेज में आ जाए। इससे बार-बार विटनस की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक से ज्यादा पेज में आए तो हर पेज पर दोनों गवाहों के दस्तखत करवाएं। बिना वजह बेटियों को नजरअंदाज न करें। याद रखें, कानून उन्हें बराबर का हक देता है।

फुलप्रूफ तरीका-अपनी सारी प्रॉपटी की लिस्ट बनाएं और फिर ठंडे दिमाग से सोचें कि किसे क्या देना है। सादे कागज पर अपनी हैंडराइटिंग में लिखें या टाइप कराएं कि आप अपने पूरे होशो-हवास में यह घोषणा करते हैं कि आपके बाद आपकी जायदाद का कौन-सा हिस्सा किसे मिलना चाहिए। दो ऐसे लोगों को गवाह बनाएं, जो आपकी हैंडराइटिंग या आपके दस्तखत पहचानते हों। हर पेज पर गवाहों के और अपने दस्तखत करें और अंगूठे भी लगवाएं। इस वसीयत को सब-रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर रजिस्टर्ड कराएं और रजिस्ट्रार के रजिस्टर में इसकी एंट्री भी करवाएं। वसीयत करवाने की पूरी प्रक्रिया की विडियो रेकॉर्डिंग कराना अच्छा रहता है। वैसे, कानूनन यह जरूरी नहीं है। ऐसा हो तो क्या करें? अगर वसीयत करने वाले से पहले किसी गवाह की मौत हो जाए तो वसीयत दोबारा बनवानी चाहिए। दोबारा वसीयत बनवाते समय पहली वसीयत को कैंसल करने का जिक्र जरूर करें। वसीयत अगर खो जाए तो भी दोबारा वसीयत करवाएं और बेहतर है कि उसमें थोड़ा फेरबदल करें, ताकि पहली वसीयत कैंसल मान ली जाए। अगर वसीयत करने वाले की मौत और गवाह की मौत एक साथ हो जाए तो वसीयत करने वाले की और गवाह की हैंडराइटिंग ही उसका सबूत है। ऐसे में किसी ऐसे शख्स की तलाश करनी चाहिए, जो तीनों की हैंडराइटिंग पहचानता हो या तीनों के दस्तखत पहचानता हो।

किसे बनाएं गवाह-गवाह उसे ही बनाएं जिस पर आपको पूरा भरोसा हो। ऐसा शख्स गवाह नहीं बन सकता, जिसे वसीयत में कोई हिस्सा दिया जा रहा हो। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गवाह को वसीयत से कोई फायदा नहीं होना चाहिए। याद रहे, गवाह को अगर प्रॉपटी से हिस्सा मिल रहा है तो अदालत गवाही रद्द भी कर सकती है। गवाह पूरे होशो-हवास में होना चाहिए। उसकी दिमागी हालत दुरुस्त होनी चाहिए। दोनों गवाह तंदुरुस्त और वसीयत करने वाले की उम्र से कम उम्र के होने चाहिए। दोनों गवाहों में से एक डॉक्टर और एक वकील हो तो इससे अच्छा कुछ नहीं। डॉक्टर की मौजूदगी साबित करती है कि वसीयत करने वाला उस समय होशो-हवास में था और उसकी दिमागी हालत दुरुस्त थी। वकील की मौजूदगी में यह साफ हो जाता है कि वसीयत करने वाले ने कानूनी सलाह ली है।

यह भी जानें

क्या होती है वसीयत? क्या करें, कैसे करें

आप अपनी जायदाद की वसीयत एक ट्रस्ट के नाम भी कर सकते हैं। फायदा यह है कि इसमें डेढ़ लाख रुपये तक की रिबेट टैक्स में मिल जाती है। ट्रस्ट बनाते वक्त यह साफ करना होता है कि कौन ट्रस्टी है और कौन वारिस। ट्रस्ट के नाम वसीयत को कैंसल भी किया जा सकता है और बदला भी जा सकता है। ट्रस्ट के ट्रस्टी संपत्ति की देखभाल करेंगे और जो इनकम होगी, वह वारिसों को मिलेगी। याद रखें वारिस ट्रस्टी नहीं हो सकते। अगर कोई व्यक्ति मरते समय भी अपनी जायदाद की जुबानी घोषणा कर दे, तो भी आपसी सूझ-बूझ से जायदाद के हकदार बंटवारा कर सकते हैं। कानून को इसमें कोई ऐतराज नहीं होगा। कानून तब आड़े आता है जब किसी भी प्रकार की वसीयत पर विवाद हो।

आम गलतियां

लाइफ पार्टनर नजरंदाज

गलती : कई बार देखने में आया है कि पति अपनी वसीयत में जायदाद का बंटवारा अपने बच्चों के नाम कर देते हैं।

सलाह : ऐसा न करें वरना पति के न होने की स्थिति में पत्नी को दिक्कतें झेलनी पड़ सकती हैं। पति और पत्नी, दोनों अपनी-अपनी जायदाद की वसीयत एक-दूसरे के नाम करवाएं।

जीते जी बंटवारा

गलती : कई लोग जीते जी जायदाद का बंटवारा कर देते हैं।

सलाह : ऐसा भूलकर भी न करें। बंटवारा व्यक्ति की मौत के बाद ही होना चाहिए।

रजिस्टर्ड वसीयत

गलती : कुछ लोग वसीयत रजिस्टर्ड नहीं करवाते। उन्हें लगता है कि रजिस्टर्ड करवाने का खर्च प्रॉपटी के हिसाब से लगेगा, जो काफी ज्यादा होगा।

सलाह : आपकी जायदाद की कीमत चाहे कितनी भी हो, वसीयत रजिस्टर्ड करवाने का कुल खर्च सिर्फ 23 रुपये आता है। इस रकम को रजिस्ट्रार ऑफिस में जमा करवाना पड़ता है।

पूरा ब्यौरा

गलती : कुछ लोग अपनी जायदाद का पूरा ब्यौरा रजिस्ट्रार ऑॅफिस में देने से कतराते हैं। जहां काले धन की गुंजाइश होती है, वहां ऐसा होना मुमकिन है।

सलाह : वसीयत में पूरी जायदाद का जिक्र करने में ही भलाई है। अधूरी जायदाद की वसीयत तब तक ही ठीक रहती है, जब तक उसे चैलेंज न किया जाए, वरना बाकी जायदाद पर विवाद हो सकता है।

अवैध वसीयत

गलती : वसीयत करने वाला इस बात का जिक्र नहीं करता कि रजिस्टर्ड वसीयत के अलावा बाकी कोई भी वसीयत अवैध होगी।

सलाह : वसीयत रजिस्टर्ड करवाते समय उसमें यह जरूर लिखा जाए कि ‘मेरी कोई भी वसीयत जो रजिस्टर्ड न हो, वैलिड न मानी जाए।’

वसीयत के बाद खरीदी गई चीजें

गलती : कुछ लोग वसीयत करने के बाद खरीदी गई चीजों का जिक्र अपनी वसीयत में नहीं करते।

सलाह : वसीयत में यह जरूर लिखें कि ‘यह वसीयत करने से लेकर मेरे मरने तक अगर मैं कोई और चीज खरीदूंगा, तो उसका कौन-सा हिस्सा किसे मिलेगा।’

परिवार को बताना

गलती : लोग वसीयत के बारे में पहले से ही अपने वारिसों को बता देते हैं।

सलाह : वसीयत के बारे में परिवार के लोगों को न बताएं। बता देने से जिसे कम मिलता है, वह नाराज हो सकता है। बहला-फुसला कर वसीयत बदलने पर भी जोर दिया जा सकता है।

दलालों के चक्कर

गलती : वसीयत रजिस्टर्ड करवाने के लिए लोग दलालों के चक्कर में फंस जाते हैं।

सलाह : वसीयत को रजिस्टर्ड करवाने के लिए किसी दलाल या वकील की जरूरत नहीं होती। सिर्फ 23 रूपये

अदा करके सब-रजिस्ट्रार के ऑफिस में वसीयत रजिस्टर्ड करवा सकते हैं।

बुजुर्गों को वक्त रहते अपने बाद अपनी जायदाद के बंटवारे का ब्यौरा अपनी वसीयत यानी विल में कर देना चाहिए।

 उत्तराधिकार कानून के अलग-अलग धार्मिक समुदायों के उत्तराधिकार के लिए अलग- कानून हैं। यहां हम उनका ब्योरा पेश कर रहे

 वसीयत के बारे में परिवार के लोगों को न बताएं

वसीयत के बारे में परिवार के लोगों को न बताएं

हैं-

हिंदुओं में उत्तराधिकार

किसी हिंदू की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति उसकी विधवा , बच्चों (लड़के तथा लड़कियां) तथा मां के बीच बराबर बांटी जाती है ।

अगर उसके किसी पुत्र की उससे पहले मृत्यु हो गयी हो तो बेटे की विधवा तथा बच्चों को संपत्ति का एक हिस्सा मिलेगा।

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी हिंदू पुरुष द्वारा पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी कर लेने से दूसरी पत्नी को उत्तराधिकार नहीं मिलता है , लेकिन उसके बच्चों का पहली पत्नी के बच्चों की तरह ही अधिकार होता है ।

हिंदू महिला की संपत्ति उसके बच्चों (लड़के तथा लड़कियां ) तथा पति को मिलेगी । उससे पहले मरने वाले बेटे के बच्चों को भी बराबर का एक हिस्सा मिलेगा ।

अगर किसी हिंदू व्यक्ति के परिवार के नजदीकी सदस्य जीवित नहीं हैं, तो उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पाने वाले उत्तराधिकारियों का निश्चित वर्गीकरण होता है ।

मुसलमानों (शिया और सुन्नी) में उत्तराधिकार

शिया और सुन्नियों के लिए अलग-अलग नियम हैं। लेकिन निम्नलिखित सामान्य नियम दोनों पर लागू होते हैं

अंतिम संस्कार के खर्च और ऋणों के भुगतान के बाद बची संपत्ति का केवल एक तिहाई वसीयत के रुप में दिया जा सकता है ।

पुरुष वारिस को महिला वारिस से दोगुना हिस्सा मिलता है ।

वंश-परंपरा में (जैसे पुत्र-पोता) नजदीकी रिश्ते (पुत्र) के होने पर दूर के रिश्ते (पोते) को हिस्सा नहीं मिलता है ।

ईसाइयों में उत्तराधिकार

भारतीय ईसाइयों को उत्तराधिकार में मिलने वाली संपत्ति का निर्धारण उत्तराधिकार कानून के तहत होता है । विशेष विवाह कानून के तहत विवाह करने वाले तथा भारत में रहने वाले यूरोपीय, एंग्लो इंडियन तथा यहूदी भी इसी कानून के तहत आते हैं ।

विधवा को एक तिहाई संपत्ति पाने का हक है । बाकी दो तिहाई मृतक की सीधी वंश परंपरा के उत्तराधिकारियों को मिलता है।

बेटे और बेटियों को बराबर का हिस्सा मिलता है ।

पिता की मृत्यु से पहले मर जाने वाले बेटे की संतानों को उसे बेटे का हिस्सा मिल जाता है ।

अगर केवल विधवा जीवित हो तो उसे आधी संपत्ति मिलती है और आधी मृतक के पिता को मिल जाती है ।

अगर पिता जिंदा ना हो तो यह हिस्सा मां, भाइयों तथा बहनों को मिल जाता है ।

किसी महिला की संपत्ति का भी इसी तरह बंटवारा होता है

पारसियों में उत्तराधिकार

पारसियों में पुरुष की संपत्ति उसकी विधवा , बच्चों तथा माता-पिता में बंटती है ।

लड़के तथा विधवा को लड़की से दोगुना हिस्सा मिलता है ।

पिता को पोते के हिस्से का आधा तथा माता को पोती के हिस्से का आधा मिलता है ।

किसी महिला की संपत्ति उसके पति और बच्चों में बराबर-बराबर बंटती हिस्सों में बंटती है ।

पति की संपत्ति के बंटवारे के समय उसमें पत्नी की निजी संपत्ति नहीं जोड़ी जाती है ।

पत्नी को अपनी संपत्ति पर पूरा अधिकार है । उसकी संपत्ति में उसकी आय, निजी साज-सामान तथा विवाह के समय मिले उपहार शामिल हैं ।

शादी के समय दुल्हन को मिले उपहार और भेंट स्त्रीधन के तहत आते हैं ।

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह कानून की धारा 27 के तहत स्त्रीधन पर पूर्ण अधिकार पत्नी का होता है और उसे इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है ।

नोट- किसी फंड या बीमा पॉलिसी में नामांकन हो जाने से नामांकित व्यक्ति के नाम संपत्ति हस्तांतरित नहीं हो जाती है ।वह तो किसी की मृत्यु के बाद इन रकमों का केवल ट्रस्टी है ।

जारी….

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