रामपुर: सर्किट कोर्ट को 18 साल बाद मिली मंजूरी, 2000 में बंद कर दिया था

“शिक्षा का अधिकार अधिनियम”…ताकि हर बच्चा हो शिक्षित : अधिवक्ता रोहन सिंह चौहान

"शिक्षा का अधिकार अधिनियम"...ताकि हर बच्चा हो शिक्षित

“शिक्षा का अधिकार अधिनियम”…ताकि हर बच्चा हो शिक्षित

बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम 1 अप्रैल 2010 को पूर्ण रूप से देश में लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत छह

अधिवक्ता - रोहन सिंह चौहान

अधिवक्ता – रोहन सिंह चौहान

से लेकर चौदह वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त एवं अनिवार्य कर दिया गया। अब यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को सुलभ हो सके।शिक्षा किसी भी व्यक्ति एवं समाज के समग्र विकास तथा सशक्तीकरण के लिए आधारभूत मानव मौलिक अधिकार है। यूनेस्को की शिक्षा के लिए वैश्विक मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2010 के मुताबिक, लगभग 135 देशों ने अपने संविधान में शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है तथा मुफ्त एवं भेदभाव रहित शिक्षा सबको देने का प्रावधान किया है। भारत ने 1950 में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा देने के लिए संविधान में प्रतिबद्धता का प्रावधान किया था। इसे अनुच्छेद 45 के तहत राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धातों में शामिल किया गया है।

जी हाँ इस बार आपको कानून व्यवस्था में “”शिक्षा का अधिकार अधिनियम” क्या है ” के बारे में शिमला के अधिवक्ता रोहन सिंह चौहान विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं।

12 दिसंबर 2002 को संविधान में 86वां संशोधन किया गया और इसके अनुच्छेद 21ए को संशोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया है।

बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम 1 अप्रैल 2010 को पूर्ण रूप से लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत छह से लेकर चौदह वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त एवं अनिवार्य कर दिया गया है। अब यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को सुलभ हो सके।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  • छह से चौदह वर्ष तक के हर बच्चे के लिए नजदीकी विद्यालय में मुफ्त आधारभूत शिक्षा अनिवार्य है।
  • इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बच्चों से किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और न ही उन्हें शुल्क अथवा किसी खर्च की वजह से आधारभूत शिक्षा लेने से रोका जा सकेगा।
  • यदि छह वर्ष के अधिक उम्र का कोई भी बच्चा किन्हीं कारणों से विद्यालय नहीं जा पाता है तो उसे शिक्षा के लिए उसकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलवाया जाएगा।
  • इस अधिनियम के प्रावधानों को कियान्वित करने के लिए संबंधित सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को यदि आवश्यक हुआ तो विद्यालय भी खोलना होगा। अधिनियम के तहत यदि किसी क्षेत्र में विद्यालय नहीं है तो वहां पर तीन वर्षों की तय अवधि में विद्यालय का निर्माण करवाया जाना आवश्यक है।
  • इस अधिनियम के प्रावधानों को अमल में लाने की जिम्मेदारी केंद्र एवं राज्य सरकार दोनों की है तथा इसके लिए होने वाला धन खर्च भी इनकी समवर्ती जिम्मेदारी रहेगी।

यह अधिनियम माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तथा बच्चों तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अधिनियम का सर्वाधिक लाभ श्रमिकों के बच्चे, बाल मजदूर, प्रवासी, विशेष आवश्यकता वाले बच्चे या फिर ऐसे बच्चे जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषाई अथवा लिंग कारकों की वजह से शिक्षा से वंचित बच्चों को मिलेगा। इस अधिनियम के कार्यान्वयन के साथ ही यह उम्मीद भी है कि इससे विद्यालय छोड़ने वाले तथा विद्यालय न जाने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से दी जा सकेगी।

भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाने का कदम ऐतिहासिक कहा जा सकता है तथा इससे यह भी तय हो गया है कि हमारा देश सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (एमजीडी) तथा सभी के लिए शिक्षा (ईएफए) के नजदीक पहुंच रहा है।

क्या है यह अधिनियम?

  • 6 से 14 साल की उम्र के हरेक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। संविधान के 86वें संशोधन द्वारा शिक्षा के अधिकार को प्रभावी बनाया गया है।
  • सरकारी स्कूल सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध करायेंगे और स्कूलों का प्रबंधन स्कूल प्रबंध समितियों (एसएमसी) द्वारा किया जायेगा। निजी स्कूल न्यूनतम 25 प्रतिशत बच्चों को बिना किसी शुल्क के नामांकित करेंगे।
  • गुणवत्ता समेत प्रारंभिक शिक्षा के सभी पहलुओं पर निगरानी के लिए प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया जायेगा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की मुख्य विशेषताएं

अधिनियम का इतिहास

  • दिसंबर 2002- अनुच्छेद 21 ए (भाग 3) के माध्यम से 86वें संशोधन विधेयक में 6 से 14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया।
  • अक्तूबर 2003- उपरोक्त अनुच्छेद में वर्णित कानून, मसलन बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2003 का पहला मसौदा तैयार कर अक्तूबर 2003 में इसे वेबसाइट पर डाला गया और आम लोगों से इस पर राय और सुझाव आमंत्रित किये गये।
  • 2004- मसौदे पर प्राप्त सुझावों के मद्देनजर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2004 का संशोधित प्रारूप तैयार कर http://education.nic.in वेबसाइट पर डाला गया।
  • जून 2005- केंद्रीय शिक्षा सलाहकार पर्षद समिति ने शिक्षा के अधिकार विधेयक का प्रारूप तैयार किया और उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसे नैक के पास भेजा, जिसकी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी हैं। नैक ने इस विधेयक को प्रधानमंत्री के ध्यानार्थ भेजा।
  • 14 जुलाई, 2006- वित्त समिति और योजना आयोग ने विधेयक को कोष के अभाव का कारण बताते हुए नामंजूर कर दिया और एक मॉडल विधेयक तैयार कर आवश्यक व्यवस्था करने के लिए राज्यों को भेजा। (76वें संशोधन के बाद राज्यों ने राज्य स्तर पर कोष की कमी की बात कही थी।)
  • 19 जुलाई 2006- सीएसीएल, एसएएफई, एनएएफआरई और केब ने आईएलपी तथा अन्य संगठनों को योजना बनाने, बैठक करने तथा संसद की कार्यवाही के प्रभाव पर विचार करने व भावी रणनीति तय करने और जिला तथा ग्राम स्तर पर उठाये जानेवाले कदमों पर विचार के लिए आमंत्रित किया।

विधेयक महत्वपूर्ण क्यों :

  • यह विधेयक महत्वपूर्ण है क्योंकि संवैधानिक संशोधन लागू करने की दिशा में सरकार की सक्रिय भूमिका का यह पहला कदम है और यह विधेयक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि-
  • इसमें निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक तथा माध्यमिक शिक्षा का कानूनी प्रावधान है।
  • प्रत्येक इलाके में एक स्कूल का प्रावधान है।
  • इसके अंतर्गत एक स्कूल निगरानी समिति के गठन प्रावधान है जो समुदाय के निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से स्कूल की कार्यप्रणाली की निगरानी करेगी।
  • 6 से 14 साल के आयुवर्ग के किसी भी बच्चे को नौकरी में नहीं रखने का प्रावधान है।

उपरोक्त प्रावधान एक सामान्य स्कूल प्रणाली के विकास की नींव रखने की दिशा में प्रभावी कदम है। इससे सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सकेगी और इस

"शिक्षा का अधिकार अधिनियम"...ताकि हर बच्चा हो शिक्षित

“शिक्षा का अधिकार अधिनियम”…ताकि हर बच्चा हो शिक्षित

प्रकार सामाजिक तथा आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को अलग-थलग करने में रोक लग सकेगी।

6 से 14 साल के आयु वर्ग को चुनने का उद्देश्य : विधेयक में सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रारंभिक से माध्यमिक स्कूल तक की शिक्षा देने पर जोर दिया गया है और

इस आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा देने से उनके भविष्य का आधार तैयार हो सकेगा।

कानून महत्वपूर्ण : मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 का पास होना भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक क्षण है।

यह कानून सुनिश्चित करता है कि हरेक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हो और यह इसे राज्य, परिवार और समुदाय की सहायता से पूरा करता है।

मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा : 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को अपने पड़ोस के स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलेगा।

इसके लिए बच्चे या उनके अभिभावकों से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए कोई भी प्रत्यक्ष फीस (स्कूल फीस) या अप्रत्यक्ष मूल्य (यूनीफॉर्म, पाठ्य-पुस्तकें, मध्या भोजन, परिवहन) नहीं लिया जाएगा। सरकार बच्चे को निःशुल्क स्कूलिंग उपलब्ध करवाएगी जब तक कि उसकी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं हो जाती।

आरटीई को सुनिश्चित करने के लिए समुदाय और अभिभावकों की भूमिका: मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 का पास होना भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक क्षण है। भारत के इतिहास में पहली बार बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का अधिकार दिया गया है जिसे राज्य द्वारा परिवार और समुदायों की सहायता से किया जाएगा।

विश्व के कुछ ही देशों में सभी बच्चों को अपनी क्षमताएं विकसित करने में सहायता के लिए मुफ्त और बच्चे पर केन्द्रित तथा मित्रवत शिक्षा दोनों को सुनिश्चित करने का राष्ट्रीय प्रावधान मौजूद है। यह एक अनुमान है कि 2009 में भारत में 6 से 14 साल के आयु वर्ग के ऐसे 80 लाख बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते थे। विश्व, भारत के बगैर 2015 तक हरेक बच्चे को प्रा‍थमिक शिक्षा पूरी कराने के अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता।

स्कूल स्थानीय अधिकरण, अधिकारियों, माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों को मिलाकर स्कूल प्रबंधन समितियां (एसएमसी) बनाएंगे। ये एसएमसी स्कूल के विकास के लिए योजनाएं बनाएंगी और सरकार द्वारा दिए गए अनुदान का इस्तेमाल करेगी और पूरे स्कूल के वातावरण को नियंत्रित करेंगी।

आरटीई में यह घोषित है कि एसएमसी में वंचित तबकों से आने वाले बच्चों के माता-पिता और 50 फीसदी महिलाएं होनी चाहिए। इस तरह के समुदायों की भागीदारी

लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय सुविधाओं, स्वास्य, जल, स्वच्छ्ता जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान के जरिए पूरे स्कूल के वातावरण को बाल मित्रवत बनाने को सुनिश्चित करने हेतु महत्वपूर्ण होंगी।

1936 में जब महात्मा गांधी ने एक समान शिक्षा की बात उठायी थी, तब उन्हें भी लागत जैसे मुद्दे, जो आज भी जीवित हैं, का सामना करना पड़ा था। संविधान ने इसे एक अस्पष्ट अवधारणा के रूप में छोड़ दिया था, जिसमें 14 साल तक की उम्र के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की जवाबदेही राज्यों पर छोड़ दी गयी थी।

शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने हेतु रूपरेखा

निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के प्रावधानों पर नजर रखने के लिए बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीपीसीआर) को एजेंसी के रूप में नामित किया गया है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि RTE अधिनियम सफलतापूर्वक ईमानदारी से लागू किया जाता है, एनसीपीसीआर ने संस्थानों, सरकारी विभागों, नागरिक समाज और अन्य हितधारकों के बीच एक आम सहमति बनाने के लिए पहल की है। उसने शिक्षा के अधिकार के समुचित कार्यान्वयन के लिए योजना पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की है जिसमें विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारी, शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठ काम करनेवाले और अनुभवी व्यक्ति शामिल हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ बातचीत के तौर-तरीकों को स्थापित करना भी आवश्यक होगा ताकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के लागूकरण तथा निगरानी को सुनिश्चित करने के लिए वे मिलकर काम कर सकें।

अधिक से अधिक समन्वय और तालमेल के लिए अन्य मंत्रालयों शिक्षा का अधिकार अधिनियम से प्रभावित होने वाले अन्य मंत्रालयों जैसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता, श्रम मंत्रालय, आदिवासी मामलों के मंत्रालय तथा पंचायती राज मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठकें की गईं। उदाहरण के लिए, आरटीई अधिनियम का बाल श्रम अधिनियम पर विशेष प्रभाव पड़ता है और श्रम मंत्रालय को निभाने के लिए एक भूमिका है। इसी प्रकार जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे स्कूल भी आरटीई के दायरे में आएंगे। इस प्रकार आरटीई से बच्चों के लाभान्वित होने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि एनसीपीसीआर और इन मंत्रालयों के बीच आसान समन्वय और संचार हो।

शिक्षा का अधिकार की बेहतर निगरानी के लिए बेहतर सम्बन्ध बनाने के लिए एनसीपीसीआर ने अन्य राष्ट्रीय आयोगों जैसे महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात की है। उदाहरण के लिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि अभावग्रस्त समुदायों के लड़के या लडकियां शिक्षा के अधिकार से वंचित न रह जाएं, आयोग एक साथ कैसे काम कर सकते हैं। यह भी सुझाव दिया गया था कि एनसीपीसीआर द्वारा आयोजित सार्वजनिक सुनवाई में सम्बंधित आयोग से एक प्रतिनिधि भी जूरी में शामिल किया जा सकता है ताकि प्रभाव को और मजबूत किया जा सके।

हालांकि, अधिनियम के बेहतर कार्यान्वयन और निगरानी के लिए देश में अधिक से अधिक इतनी जागरूकता है ताकि इसके प्रावधान समझे जाएं और सभी संस्थाओं

 निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक तथा माध्यमिक शिक्षा का कानूनी प्रावधान

निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक तथा माध्यमिक शिक्षा का कानूनी प्रावधान

द्वारा शामिल किए जाएं। ऐसा करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर एक प्रचार अभियान शुरू करना होगा, जिसमें अधिनियम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद, संभवतः मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अन्य एजेंसियों के साथ संयुक्त रूप से करना होगा। एनसीपीसीआर ने इस अभियान के लिए ज़रूरी सामग्री बनाकर, जिसमें अधिनियम का सरलीकृत संस्करण पोस्टर, प्राइमर और मूलभूत प्रावधानों और अधिकारों के वर्णन पर्चे शामिल हैं, यह प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। यह बच्चों के लिए विशेष सामग्री डिजाइन करेंगे ताकि वे भी इस अधिनियम को समझ सकें।

शिक्षा अधिकार के प्रावधानों के अनुसार स्कूलों में प्रवेश

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने देशभर के स्कूलों में प्रवेश की प्रक्रिया, शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 के अनुरूप सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए

हैं। इसकी आवश्यकता इसलिए महसूस की गई कि कुछ राज्यों में स्कूलों में बच्चों को पूर्व-प्राथमिक स्कूलों में नामांकन हेतु स्क्रीनिंग की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है वह इस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है। अप्रैल 2010 में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर यह मांग की कि सरकारी आदेश जारी कर स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का पालन किया जाए। इसकी पहल मार्च में शिक्षा निदेशालय, दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार द्वारा एक सूचना जारी करने पर हुई जिसमें निदेशालय द्वारा चलाए जा रहे संस्थान राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालयों में कक्षा छह में दाखिला के लिए आवेदन मांगा गया था।

अप्रैल माह में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग के हस्तक्षेप से शिक्षा निदेशालय, दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र द्वारा सभी प्रमुख समाचारपत्रों में तथा निदेशालय की वेबसाइट पर एक प्रवेश सूचना जारी की गई, जिसमें छात्रों से 25 रुपये में नामांकन आवेदन पत्र खरीदने तथा उसके बाद एक प्रवेश जांच में बैठने की मांग की गई। चूंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम किसी भी प्रकार की प्रवेश जांच को प्रतिबंधित करता है तथा स्कूलों में तत्समय (पहले आओ, पहले पाओ) के आधार पर चयन पर जोर देता है, इसलिए इसे उस सूचना को अधिनियम का उल्लंघन माना गया।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम की निगरानी तथा क्रियान्वयन के नोडल निकाय के रूप में आयोग ने शिक्षा निदेशालय, दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के प्रधान सचिव, शिक्षा को एक पत्र लिखा जिसमें उस सूचना को वापस लेने के लिए कहा गया तथा उसके स्थान पर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को जारी करने का निर्देश दिया। यह भी मांग की गई कि एक सप्ताह के भीतर सरकार शिक्षा निदेशालय, दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के भीतर आने वाले सभी स्कूलों को अपने प्रवेश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के आदेश दें, ताकि स्कूल अपनी प्रक्रियाओं में आवश्यक फ़ेर-बदल कर सके।

अधिनियम के भाग-13 का प्रासंगिक प्रावधान

  • “प्रवेश लेने के दौरान कोई व्यक्ति या स्कूल किसी प्रकार का शुल्क या किसी बच्चे अथवा उसके माता-पिता या अभिभावक से किसी प्रकार की जांच नहीं ले सकता।
  • कोई स्कूल या व्यक्ति सब-सेक्शन (1) का उल्लंघन करते हुए,
  • कोई प्रवेश शुल्क प्राप्त करता है तो उस उल्लंघन के लिए उस पर ज़ुर्माना लगाया जा सकता है जो मांगे जाने वाले शुल्क का 10 गुना होगा,
  • जो स्कूल बच्चे की जांच लेता है तो उसपर 25,000 रुपये प्रथम उल्लंघन के लिए तथा 50,000 रुपये द्वितीय उल्लंघन के लिए ज़ुर्माना लगाया जाएगा।”

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग

नवोदय स्कूलों के लिए कोई जांच प्रक्रिया नहीं

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने नवोदय स्कूलों तथा सभी राज्य शिक्षा सचिवों को पत्र लिखकर कहा कि प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 8 तक) में प्रवेश के लिए किसी भी प्रकार की स्क्रीनिंग की स्थिति में विद्यालय प्रबंधन के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने नवोदय विद्यालय, दिल्ली तथा अन्य राज्यों से मिली सूचना के आधार पर शिक्षा के अधिकार प्रावधानों के उल्लंघन को रोकने की मांग की।

भाग-13 नवोदय विद्यालय समेत सभी स्कूलों के लिए लागू होगा, जिन्हें शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत ‘विशेष वर्ग’ का दर्ज़ा दिया गया है। नवोदय विद्यालय द्वारा संपन्न की जा रही प्रवेश प्रक्रिया इस अधिनियम का उल्लंघन है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने राज्य सरकार से यह भी मांग की कि सभी स्कूलों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के लिए आदेश जारी किए जाएं, ताकि वे अपनी प्रवेश प्रक्रिया तथा संचालन विधि में एक सप्ताह के भीतर आवश्यक फेर-बदल कर सकें।

बाल केन्द्रित है शिक्षा का अधिकार कानून

शैक्षिक सरोकारों के इतिहास में 1 अप्रैल 2010 सदैव रेखांकित होता रहेगा। यही वह दिन है जिस दिन संसद द्वारा पारित निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 देश में लागू कर दिया गया। शिक्षा के अधिकार की पहली मांग का लिखित इतिहास 18 मार्च 1910 है। इस दिन ब्रिटिश विधान परिषद के सामने गोपाल कृष्ण गोखले भारत में निःशुल्क शिक्षा के प्रावधान का प्रस्ताव लाये थे।

एक सदी बीत जाने के बाद आज हम यह कहने की स्थिति में हैं कि यह अधिनियम भारत के बच्चों के सुखद भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

इस आलेख में लागू अधिनियम की दो धाराओं को केन्द्र में रखकर बाल केन्द्रित संभावनाओं पर विमर्श करने की कोशिश भर की गई है।

धारा 17. (1) किसी बच्चे को शारीरिक रूप से दंडित या मानसिक उत्पीड़न नहीं किया जाएगा।

(2) जो कोई उपखण्ड (1) के प्रावधानों का उल्लघंन करता है वह उस व्यक्ति पर लागू होने वाले सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा।

धारा 30 (जी) बच्चे को भय, सदमा और चिन्ता मुक्त बनाना और उसे अपने विचारों को खुलकर कहने में सक्षम बनाना।

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 का पास होना भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक क्षण

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 का पास होना भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक क्षण

अधिनियम में इन दो धाराओं से बच्चों के कौन से अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं? बच्चे क्या कुछ प्रगति कर पाएंगे? इससे पहले यह जरूरी होगा कि हम यह विमर्श करें कि आखिर इन धाराओं को शामिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यह कहना गलत न होगा कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था बच्चे में अत्यधिक दबाव डालती है। स्कूल जाने का पहला ही दिन मासूम बच्चे को दूसरी दुनिया में ले जाता है। अमूमन हर बच्चे के ख्यालों में स्कूल की वह अवधारणा होती ही नहीं। जिसे मन में संजोकर वह खुशी-खुशी स्कूल जाता है। कई बच्चे ऐसे हैं जो पहले दिन स्कूल जाने से इंकार कर देते हैं। इसका अर्थ सीधा सा है। अधिकतर स्कूलों का कार्य-व्यवहार ऐसा है, जो बच्चों में अपनत्व पैदा नहीं करता। यह तो संकेत भर है। हर साल परीक्षा से पहले और परीक्षा परिणाम के बाद बच्चों पर क्या गुजरती है। यह किसी से छिपा नहीं है। यही नहीं हर रोज न जाने कितने बच्चों की पवित्र भावनाओं का, विचारों का और आदतों का कक्षा-कक्ष में गला घोंटा जाता है। यह वृहद शोध का विषय हो सकता है।

उपरोक्त धाराओं के आलोक में यह महसूस किया जा सकता है कि बहुत से कारणों में से नीचे दिये गए कुछ हैं, जिनकी वजह से अधिनियम में बच्चे को भयमुक्त शिक्षा

दिये जाने का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

  • स्कूल में दाखिला देने से पहले प्रबंधन-शिक्षक बच्चे से परीक्षा-साक्षात्कार-असहज बातचीत की जाती रही है। एक तरह से छंटनी-जैसा काम किया जाता रहा है। कुल मिलाकर निष्पक्ष और पारदर्शिता का भाव निम्न रहा है।
  • व्ंचित बच्चे और कमज़ोर वर्ग के बच्चे परिवेशगत और रूढ़िगत कुपरंपराओं के चलते स्वयं ही असहज पाते रहे हैं। हलके से दबाव और कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही के संकेत मात्र से स्वयं ही असहज होते रहे हैं।
  • लैंगिक रूप से और सामाजिक स्तर पर भी विविध वर्ग-जाति के बच्चों को स्कूल की चार-दीवारी के भीतर असहजता-तनाव का सामना करना पड़ता रहा है।
  • कई बार स्कूल में पिटाई के मामलों से तंग आकर कई बच्चे स्वयं ही स्कूल छोड़ते रहे हैं। वहीं कई अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते रहे हैं अथवा स्कूल भेजना बंद करते रहे हैं।
  • स्कूल में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के चलते कई बच्चे आजीवन के लिए अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। इस प्रताड़ना से कक्षा में ही ऐसी प्रतिस्पर्धा जन्म ले लेती है, जिसमें बच्चे असहयोग और व्यक्तिवादी प्रगति की ओर उन्मुख हो जाते हैं।
  • अभी तक बच्चों की शिकायतों को कमोबेश सुना ही नहीं जाता था। यदि हां भी तो स्कूल प्रबंधन स्तर पर ही उसका अस्थाई निवारण कर दिया जाता था। शिकायतों के मूल में जाने की प्रायः कोशिश ही नहीं की जाती थी। भेदभाव, प्रवेश न देने के मामले और पिटाई के हजारों प्रकरण स्कूल से बाहर जाते ही नहीं थे।
  • राज्यों में बाल अधिकारों की सुरक्षा के राज्य आयोग कछुआ चाल से चलते आए हैं। बहुत कम मामले ही इन आयोग तक पहुंचते हैं। स्कूल प्रबंधन ऐसा माहौल बनाने में अब तक सफल रहा है कि अब तक पीड़ित बच्चे या उनके अभिभावक आयोग तक शिकायतें प्रायः ले जाते ही नहीं है।
  • विद्यालयी बच्चों के मामलों में अब तक गैर-सरकारी संगठन एवं जागरुक नागरिक प्रायः कम ही रुचि लेते रहे हैं। स्कूल में बच्चों के हितों को लेकर अंगुलियों में गिनने योग्य ही संगठन हैं जो छिटपुट अवसरों पर शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के अधिकारों के प्रचार-प्रसार की बात करते रहे हैं। ऐसे बहुत कम मामले हैं जिनमें इन गैर सरकारी संगठनों ने बच्चों के अधिकारों के हनन के मामलों में पैरवी की हो।
  • अब तक स्कूल केवल पढ़ने-पढ़ाने का केन्द्र रहे हैं। अब यह अधिनियम स्कूल को बाध्य करता है कि वह बाल केन्द्रित भावना के अनुरूप कार्य करे। कुल मिलाकर स्कूल अब तक बच्चों की बेहतर देखभाल करने के केन्द्र तो नहीं बन सके हैं।

उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में कई झोल हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा के अधिकार में इन खामियों व कमियों, असफलताओं कमजोर पक्षों को दूर करने के लिए कुछ बाध्यताएं रखी गई हैं। आशा की जाती है कि यह अधिनियम बहुत हद तक बाल मनःस्थिति को समझते हुए ही तैयार किया गया है। यदि समाज, शिक्षक और अभिभावक अधिनियम की मूल भावना का सम्मान करते हुए बच्चे के साथ सुगमकर्ता के रूप में, दोस्त के रूप में और एक सहयोगी के रूप में पेश आएंगे तो निश्चित रूप से बाल जीवन सुखद होगा और यही बच्चे राष्ट्र की प्रगति में आगे चलकर बहुत बड़ा योगदान कर सकेंगे।

  • इस अधिनियम की उपरोक्त दो धाराओं के शामिल कर लिये जाने के बाद यदि शिक्षक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने कार्य व्यवहार में बदलाव लाएंगे तो बहुत सारे पक्षों में आशातीत सफलता हासिल होगी। यही नहीं बच्चे, बाल जीवन और स्कूल से जुड़ी कई समस्याएं धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाएंगी। मौटे तौर पर निम्नांकित बिंदु हैं, जो इस अधिनियम का पालन करने पर हमें समाज में-स्कूल में और घर-परिवार में धीरे-धीरे दिखाई देंगे।
  • समाज में पसरा जातिगत और सामुदायिक भेदभाव आखिरकार दूर होगा।
  • सभी के लिए स्कूल के द्वार खुलेंगे और स्कूल विविधताओं से भरे बच्चों की एक पौधशाला के रूप में दिखाई देंगे।
  • स्कूल न पढ़ने-पढ़ाने के औपचारिक केन्द्र रहेंगे बल्कि उचित देखभाल और सुरक्षित संस्थान के रूप में स्थापित होंगे। यही नहीं डर के अभाव में स्वतः ही बच्चों की नियमित उपस्थिति रहेगी।
  • स्कूल शिक्षा प्राप्त करने का ऐसा आनन्दालय होगा जहां निष्पक्षता,पारदर्शिता और भेदभाव रहित नियम के साथ बच्चे सहभागिता करते हैं।
  • किसी एक भी बच्चे के मन में कभी यह बात घर नहीं करेगी कि स्कूल में समान अवसर नहीं दिये जाते। पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। दूसरे शब्दों में अब हर किसी बच्चे को भरपूर अवसर मिलेंगे कि वह अपनी क्षमताओं का उपयोग करे।
  • बच्चे स्कूल में मिल रही शिक्षा पर खुद भी टिप्पणी कर सकेंगे। स्कूल से जुड़े कई मसलों पर बच्चे अब खुल कर बेबाक राय दे सकेंगे। यह सब इसलिए हो सकेगा कि अब बच्चों के मन से मारपीट-पिटाई और दण्ड का भय नहीं रहेगा।
  • परिवार के बाद स्कूल ही दूसरा ऐसा बड़ा क्षेत्र है जो बच्चों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है। यदि स्कूल भयरहित, दण्डरहित होगा तो निश्चित ही विद्यालय आनंदालय बन सकेंगे।
  • यह ऐतिहासिक पहल है कि बच्चे स्कूल में अब ऐसी शिक्षा के हकदार हैं, जो शिक्षक के माध्यम से उनके व्यक्तित्व में पूर्ण निखार लाने में संपूर्ण रूप से ज़िम्मेदारी निभाएगा।
  • शारीरिक रूप से दंडित करने और मानसिक पीड़ा पहुंचाने के स्कूली मामले खत्म हो जाएंगे। इससे स्कूल में बच्चे में सीखने की गति बढ़ेगी। बच्चों में स्वतः सीखने की प्रवृति बढ़ेगी। अब उन में शिक्षक की सहायता से समग्रता से सोचने, कारण जानने, सीखने की क्षमता बढ़ाने, दूसरों का सम्मान करने और समानता का भाव मन में संजोने में आशातीत वृद्धि होगी।
  • इसमें कोई दो राय नहीं कि निकट भविष्य में शिक्षण संस्थान बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित और संरक्षित केन्द्र माने जाएंगे। जहां बच्चे सुकून से अपनी समझ
    प्रवेश लेने के दौरान कोई व्यक्ति या स्कूल किसी प्रकार का शुल्क या किसी बच्चे अथवा उसके माता-पिता या अभिभावक से किसी प्रकार की जांच नहीं ले सकता।

    प्रवेश लेने के दौरान कोई व्यक्ति या स्कूल किसी प्रकार का शुल्क या किसी बच्चे अथवा उसके माता-पिता या अभिभावक से किसी प्रकार की जांच नहीं ले सकता।

    विकसित करेंगे। बाल मैत्रीपूर्ण शिक्षा और खुद करके सीखने के साथ-साथ उनकी अभिव्यक्त करने की क्षमता का भी समग्र विकास होगा।

  • वर्तमान समय में कई शिक्षण संस्थाएं छात्र उत्पीड़न-दण्ड-भय के कारण विवादों में आती रही है। अब जब अधिनियम उपरोक्त धाराओं के क्रम में बच्चों के साथ नम्रता से पेश आने की सिफारिश ही नहीं करता बल्कि शिक्षकों पर बाध्यकारी है। इसके भी दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। शिक्षण संस्थाएं और शिक्षक अब प्रायः जांच-पड़ताल, समन, न्यायालय आदि के प्रकरणों से मुक्त होकर स्वाध्याय और अध्यापन में अधिक समय दे सकेंगे।
  • बच्चों को सजा न देने, उन्हें भयभीत न करने को लेकर शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों में वर्तमान में जो संशय है, वह भी कमोबेश धीरे-धीरे दूर होता चला जाएगा। दुनिया तेजी से बदल रही है। शिक्षक को भी आ रहे इस बदलाव के चलते अपनी शिक्षण पद्वति भी बदलनी होगी। यकीनन इस बदलाव से शिक्षकों की लोकप्रियता ही बढ़ेगी।
  • बच्चों को भयमुक्त रखने, उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ रखने की कवायद में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षक के आचरण में सख्ती की जगह मैत्रीपूर्ण व्यवहार, कड़े अनुशासन की जगह लचीली व्यवस्था, पिटाई की जगह अपनत्व, बच्चों को चिन्ता से उनमुक्त रखने से परिणाम यह होगा कि समाज में शिक्षक की आज की भूमिका भी बदल जाएगी। भविष्य में समुदाय और समाज शिक्षक को बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और निगरानी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानने लगेगा। यह हर शिक्षक के लिए गौरव की बात होगी।
  • यह कहना गलत होगा कि भय के बिना बच्चे सीखते नहीं है। शोध बताते हैं कि भयमुक्त वातावरण में बच्चा सहजता से और तीव्रता से सीखता है। यही नहीं भय और दबाव के मुक्त कक्षा-कक्ष में शिक्षक की शिक्षण शैली ज्यादा प्रभावशाली और गुणवत्तापरक होती है।
  • भय और दण्ड के अभाव में बच्चों में सीखने की एक समान सामर्थ्य को बल मिलेगा। शिक्षाविद् मानते भी है कि बच्चों में सीखने के लिए एक समान सामर्थ्य होती है। लेकिन बेहतर परिणाम से इतर बच्चे पिछड़ रहे हैं तो यह समस्य बच्चों के साथ नहीं है, बल्कि भिन्न परिवेश, अनियमित व्यवहार और शिक्षण का बहुआयामी तरीका न होने से उत्पन्न हुई है। इसके पीछे कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक, मानसिक दबाव और भय भी कारक होते हैं। भयमुक्त वातावरण में बच्चों की सीखने की सामर्थ्य बढ़ेगी।

यह कारण जो उपरोक्त इस अधिनियम के पक्ष में दिये गए हैं। उदाहरण मात्र हैं। सटीक और वृहद कारण तो धीरे-धीरे अब कक्षा-कक्ष से सामने आएंगे। सकारात्मक शिक्षकों की भी यह जिम्मेदारी है कि वह भयमुक्त वातावरण से बच्चों में जो भी बदलाव देख रहे हैं, उसका प्रचार-प्रसार करें। आशा की जानी चाहिए कि किसी भी शिक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही इस आशय से नहीं होगी कि उस शिक्षक ने अधिनियम का उल्लंघन करते हुए बच्चों को दण्ड दिया अथवा मानसिक पीड़ा या क्षति पहुंचाई। यही इस अधिनियम की सफलता भी होगी।

सम्बंधित समाचार

7 Responses

Leave a Reply
  1. बिपिन कुमार
    Oct 01, 2016 - 10:35 PM

    आज भी मधेपुरा जिला के अधिकांश निजी स्कूल में मुफ़्त नामांकन बच्चों का नहीं होता है जिसे कराई से लागु करने की जरुरत है ताकि गरीब के बच्चे भी अच्छी शिक्षा पा सके

    Reply
  2. Md manzer alam
    Jan 09, 2017 - 06:59 PM

    Primary school chandpara ‘po balupara ps barsoi distt katihar main ek matr urdu trachers hai jis ka Teachers student ratio ke hisab se transfer ho jane ke karan mera beti ka 4th class main ka urdu shicha bhadhit hone ki sambhawana hai iske liye kiya shicha ka adhikar main koi upai hai kirpa karke disha nirdesh de

    Reply
  3. राकेश सोनानी
    Mar 31, 2017 - 08:09 AM

    मेरा नाम राकेश सोनानी हे.मे बोर्डा ग्रामपंचायत अधीन वरोरा तहसिल चंद्रपुर जिल्हे की सेंट अॅन्स पब्लिक स्कुल मे मेरी बच्ची 4 वर्ष की स्कुल की पुरी फिस भरता हु यहा आर टी ई के तहत कोई भी नियम का पालन नही होता बच्चो जो एस.स्सी प्रवर्ग से हो या दलित सभी से फिस की सख्ती की जाती है…

    Reply
  4. इक़बाल
    Apr 26, 2017 - 03:38 PM

    आज भी जयपुर राजसथान में स्कूल में बच्चो को मिलने वाली सुविधा स्कूल वाले गरीब को न दे कर सम्पन लोगो को दे रहे है गरीब का तो नाम है जिन को मिलना चाहिए उन्हें पूरा हक नही मिल पा रहा

    Reply
  5. हनुमान प्रसाद गुप्त
    Apr 30, 2017 - 08:02 AM

    प्राय: सभी प्राइवेट स्कूलों में नामांकन के पूर्व ‘प्रवेश-परीक्षाएँ’ आयोजित कर बच्चों को Qualify/Disqualify करने का मानक अपनाया जा रहा है; कृपया माननीय लोग ध्यान दें।

    Reply
  6. Jitendra somkuwar
    Jun 30, 2017 - 09:38 AM

    वार्ड न. 24 महाराणा प्रताप वार्ड(सोनपुर)छिंदवाड़ा में न्यू ज्ञान दीप पब्लिक स्कूल में RTE नियम का पालन नहीं हो रहा है।यहाँ पर बच्चों से फ़ीस वसूली जा रही है ।और स्कूल में सुविधा भी नहीं है।

    Reply
  7. Zakir hussain pathan
    Jul 18, 2017 - 08:34 PM

    कृपया कोई ये बताये की किसी भी बच्चे को जो 6 से 14 वर्ष की उम्र का हो उसे हम बिना किसी दस्तावेज जैसे टी.सी .या अंक सुचि के भी शासकीय स्कूल में प्रवेष दे सकते है ? यदि हां तो किस धारा के तहत । क्योकि निजी स्कूल संचालक बच्चों को एक बार प्रवेष देकर टीसी नही देते है और मोटी फिस देना पालको की मजबुरी बन गई । कई पालक अपने बच्चोा को शासकीय स्कूल में प्रवेष दिलवाना चाहते है परन्तु निजी स्कूलो की मनमानी के चलते कई बच्चें शिक्षा से वंचित रह रहे है।

    Reply

अपने सुझाव दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *