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अभाव में पलता… “बचपन”

childजीवन का यह एक कटु सत्य है कि मासूम बच्चों का जीवन कहीं तो खुशियो से भरपूर है। तो कहीं खुशियों से महरूम। बच्चों के हाथों में कलम और आंखो में भविष्य के सपने होने चाहिए। लेकिन दुनिया में करोड़ों बच्चे ऐसे हैं, जिनकी आंखो में कोई सपना नहीं पलता। बस दो जून की रोटी कमा लेने की चाहत पलती है। सभ्य समाज के बच्चे को बहेतरीन शिक्षा बेहतर सभी सुख सुविधाएं मुहैंया हैं ओर होनी भी चाहिए लेकिन हमारे देश के सभ्य समाज के बच्चों को नहीं बल्कि हमारे देश के हर कोने में पलने वाले हर बच्चे को शिक्षा और उसकी जरूरत की हर सुख सुविधा मुहैया होनी चाहिए।

जहां हमारे देश के बच्चों को हर सुख सुविधाएं मिल रही हैं वहीं हमारे ही देश का मासूम बचपन एक ऐसा भी है जो खेतों में काम कर रहा है, फैक्ट्रियों में काम कर रहा है, ठेली लगाकर सामान बेच रहा है, रेशम के धागे से कपड़े तैयार कर रहा है, चाय की दूकान पर बर्तन धो रहा है, स्कूल की बसों में हेल्परी कर रहा है, फूल बेच रहा है और न जाने क्या क्या करने पर मजबूर है। देश के किसी भी कोने में चले जाइये वहां पर आपको होटलों-ढाबों, दुकानों, घरों, गैराजों, जरी, पटाखों, चूड़ी व कालीन के कारखानों में गरीबों के बच्चे अपने बचपन को खाक में मिलाते दिख जायेंगे। सुबह 5 या 6 बजे से रात के 12-1 बजे तक 17-18 घण्टे काम के बदले उन्हें 10 से 50 रुपया साप्ताहिक मिलता है जबकि उनके काम का कोई हिसाब नहीं। ओर उसके बाद भी उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज आम है, जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है तथा कथित सभ्य और बड़े कहलाने वाले लोग भी बच्चों का शोषण करने में पीछे नहीं हैं। ऐसे में सर्व शिक्षा अभियान भी बेमानी हो जाता है। खेल व मनोरंजन तो वे सपने में भी नहीं पाते हैं।

दोनों बचपनों के बीच बहुत बड़ा फर्क है। एक वो बचपन जो अभावों से कोसों दूर है, जहां बच्चों को बचपन में ही वो सब साहूलियत मिल रही है जिसकी उन्हें जरूरत भी नहीं। आज के नन्हें मासूमों के हाथों में नए-नए मॉडल के मोबाईल, लैपटॉप, कंम्प्यूटर तक थमा दिए जाते हैं तो वहीं दूसरा बचपन दूसरों की दया पर अपने आप को पाल रहा है। देखा जाए तो आंकड़ा उन मासूम बच्चों का अधिक है जो अभावों में जिदंगी गुजार रहे हैं न कि उनका जिनके पास सब कुछ है, जो नहीं होना चाहिए वह भी।

हालांकि हमारे लिए बाल मजदूरी आज अभिशाप बन गया है आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 13 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनकी आयु 14 वर्ष से कम है- वहीँ अगर 2001 और 1991 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भी आंकड़े चौंकाने वाले ही हैं। 1991 की जनगणना के हिसाब से बाल मजदूरों का आंकड़ा 11.3 मिलियन था। जबकि 2001 में यह आंकड़ा बढ़कर 12.7 मिलियन पहुंच गया था।

आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वजह साफ है कर्ज, फर्ज, मजबूरी ओर जिम्मेवारी के बोझ तले पलते इन बच्चों के बचपन की कहानी। जहां एक ओर गरीबी, मजबूरी और माता-पिता की प्रताड़ना के चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं वहीं दूसरी ओर यूनीसेफ के एक अध्ययन के अनुसार बच्चों का नियोजन इसलिए भी किया जाता है या किया जा रहा है, क्योंकि उनका शोषण बड़ी आसानी और सरलता से किया जा सकता है। बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप बड़े और जटिलकाम जिन मुख्य कारणों के चलते करते हैं, उनमें गरीबी पहले स्थान पर है। वहीं देश में सरकार द्वारा बालश्रम पर कानून ओर उनके लिए बनाई गई योजनाएं पूरी तरह सिरे नहीं चढ़ पातीं। बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक परिवार या माता-पिता जो इन बच्चों को स्कूल भेजने की बजाये काम पर भेजने के प्रति ज्यादा रूचि दिखाते हैं। कल कारखानों में, बसस्टेण्ड-रेल्वेस्टेशन पर काम करने से लेकर कचरों के ढ़ेर में काम करता मासूम बचपन ही दिखेगा। इतना ही नहीं मासूम बचपन किन मुसीबतों से पलकर कब बड़ा हो जाता है उसे भी खुद मालूम नहीं हो पाता। अक्सर कहा जाता है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं, बच्चे किसी भी देश समाज, परिवार का भविष्य होते हैं अगर यूं भी कहा जाए कि ये आगे चलाकर एक सभ्य समाज की स्थापना करते हैं तो गलत नहीं होगा। हमारे देश में एक तरफ मासूम बच्चों के लिए कई योजनाएं बनाई जातीं है उन पर सरकार न जाने कितना धन व्यय करती है, उनकी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य के लिए माता- बाप फिक्रमंद हैं वहीं ऐसे बच्चों की भी कमी नहीं जहां कुछ बच्चों की बचपन की मासूमियत खोती जा रही है। मासूम बच्चों का जीवन केवल बालश्रम तक ही सीमित नहीं बल्कि बाल विवाह, बच्चों की तस्करी और लड़कियों के साथ भेदभाव प्रमुख चुनौतियां आज भी देश में एक विकट समस्या के रूप में हमारे सामने है। वहीं ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही हैं, जो एचआईवी और एड्स से प्रभावित और संक्रमित हैं। तेजी से हो रहे आर्थिक विकास और सस्ते दरों पर खाद्यान्न की उपलब्धता तथा बच्चों के लिए पूरक खाद्य कार्यक्रमों के बावजूद पांच वर्ष की आयु तक के लगभग आधे बच्चे औसत से कम वजन के हैं।

यह आज हो रहा है ऐसा नहीं, बल्कि बाल मजदूरी कुप्रथा भारत में सैकड़ों साल से चली आ रही है। वर्ष 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन की शुरुआत कैलाश सत्यार्थी ने की थी जो अब तक 80 हजार से अधिक मासूमों के जीवन को तबाह होने से बचा चुके हैं। पिछले साल शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए अलग-अलग देश दो ऐसे लोग के नामों की घोषणा हुई जो कि बच्चों के खिलाफ हो रही हिंसा, उत्पीड़न को रोकने की दिशा में काम कर रहे हैं। बालश्रम रोकने के लिए न जाने कितनी संस्थाएं काम कर रही है लेकिन अफसोस तो यह है कि उसके बावजूद बालश्रम में कमी होती नजर नहीं आ रही है। बच्चों को अभी भी अपने अधिकार पूरे तौर पर नहीं मिल पाते। अनेक बच्चों को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की सुविधाएं तो है ही नहीं और यदि हैं भी तो बहुत कम।

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