पार्टी की ओर से दिये गये सम्मान से पूरी तरह से संतुष्ट, भ्रामक बातें न फैलाएं : प्रो. धूमल

प्रदेश में भ्रष्टाचार चर्म सीमा पर : प्रो. धूमल

शिमला: प्रो. प्रेम कुमार धूमल पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष ने आज एक प्रैस विज्ञप्ति के माध्यम से प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर चर्चा की है उन्होंने कहा कि हरे वृक्ष तो काटे जा रहे थे और बिना मार्क किये हुए वृक्षों का अवैध कटान भी किया जा रहा था लेकिन अब तो बोर्ड और कुर्सियां खरीदने के मामले में भी करोड़ों रू. का घोटाला भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्रदेश में भ्रष्टाचार चर्म सीमा पर है और दुःख की बात यह है कि उसकी जांच करने की अपेक्षा सरकार लीपापोती में लगी है। शिमला में राजधानी के सामने मुख्यमन्त्री के चुनाव क्षेत्र में 400 से ज्यादा देवदार के वृक्ष कटे तो मुख्यमन्त्री ने इस भ्रष्टाचार को यह कह कर दबा दिया कि वो वृक्ष नहीं झाड़ियां थीं। चम्बा के अवैध कटान को यह कह कर दबा दिया कि मार्किंग पिछली सरकार के समय हुई थी जबकि भ्रष्टाचार तो यही था कि जो मार्किंग हुई थी वो वृक्ष तो काटे ही नहीं गये बिना मार्किंग के वृक्ष कटे यही तो आरोप था आखिर सच्चाई को कब तक दबाते रहेंगे ?

अब स्कूलों के लिये जो बोर्ड खरीदे गए हैं और जो कुर्सियां खरीदी गई उन में एक उपनिदेशक पर 2 करोड़ रू. के घपले का आरोप लगा है तो पूरे प्रदेश में कितने का घपला हुआ होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विभाग मुख्यमन्त्री के पास है। इसी विभाग में पहले वर्दी घोटाला हुआ और जो वर्दियां आज तक बच्चों को नहीं मिल पाईं उसके लिये भी मुख्यमन्त्री ने दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डाली, एफआईआर (F.I.R.) करने के आदेष दिये परन्तु छः बार के मुख्यमन्त्री के प्रशासन का हाल यह है कि न तो एफआईआर ; (F.I.R.) हुई और न ही कोई दोषी पाया गया ।

मुख्यमन्त्री के ही पास लोक निर्माण विभाग है अधिकारियों को पदावनत (Demote) करने की धमकी देते हैं, सड़कों की स्थिति सुधरने की वजाय बिगड़ जाती है। न कोई पदावनत (Demote) होता है और न ही मुख्यमन्त्री उसके बाद इस समस्या पर कोई शब्द बोलते हैं।

प्रो. धूमल ने कहा कि नए जिले बनाने की बात फिजूल खर्ची का कारण दे कर रद्द कर देते हैं। प्रशासन का खर्चा इनको फिजूल खर्ची लगता है पर हारे हुये लोगों को सलाहकार, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बना कर उनके वेतन, गाड़ियों, स्टाफ और बंगलों पर तथा टी. ए. / डी. ए. पर अरबों रूपयों का खर्चा इनके लिये विकासात्मक काम है। जनता जब शिकायत करती है कि डिपुओं पर राशन नियमित तौर पर तथा एकमुशत नहीं मिलता और घटिया किस्म का आटा और दाल मिल रही है तो जबाब मिलता है इसकी रोटी बनाओ और मन्त्री को खिलाओ। क्या यह किसी मुख्यमन्त्री की ओर से जन-समस्याओं के समाधान का तरीका है या मुख्यमन्त्री की हताश है ?

वास्तव में प्रदेश सरकार हर मोर्चे पर पूरी तरह असफल हो चुकी है और इसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

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