सभी प्रकार के फल पौधों में सेब को सबसे अधिक चिल हर्वज़ की आवश्यकता : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

सभी प्रकार के फल पौधों में सेब को सबसे अधिक चिल हर्वज़ की आवश्यकता : डॉ. एस.पी. भारद्वाज

  • पिछले दशकों से हिमपात का क्रम अधिकतर एक से दो दिनों तक ही सीमित

सर्दियों के महीनों में इस वर्ष शीतोष्ण क्षेत्रों में वर्षाजल तथा हिमपात की मात्रा में बहुत कमी देखने को मिली है जिसके कारण भूमि में जल की मात्रा में कमी हो गई है। ऐसा ही दृश्य वर्ष 2006-07 में देखने को मिला था जब जनवरी के माह में हिमपात बिल्कुल भी नहीं हुआ था परन्तु बाद के महीनों में हिमपात व वर्षाजल की प्राप्ति हो पाई। जनजातीय क्षेत्रों को छोड़ कर हिमपात अन्य क्षेत्रों में अभी तक बहुत कम हुआ है।

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज ने बागवानों के लिए विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि पिछले दशकों से यदि हिमपात होने की प्रक्रिया की तुलना करें

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एस.पी. भारद्वाज

तो यह स्पष्ट हुआ है कि 2010 के बाद हिमपात का क्रम अधिकतर एक से दो दिनों तक ही सीमित होकर रह गया जबकि पिछले दशकों में यह क्रम 4-6 दिनों तक निरन्तर चलता था और भरपूर हिमपात व वर्षाजल की उपलब्धता सर्दियों में हो पाती थी जिसके फलस्वरूप तापमान में अप्रत्याशित बढ़ौतरी देखने में आई है।

  • हिमपात या ठंडी हवा पौधों की चिल हर्वज़ की करता है आपूर्ति

डॉ. एस.पी. भारद्वाज ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात न केवल जल भण्डारण का मुख्य स्त्रोत है अपितु नदी नालों में भी जल की उपलब्धता का मुख्य  सूत्रधार है। 607e88be-1775-41f6-93ed-bc3b8538f7c1पर्याप्त जल की उपलब्धता के बिना पौधों व पशुओं का जीवन संभव नहीं है। शीतोष्ण पौधों जिनकी पत्तियां सर्दियों में गिर जाती है के लिए चिलिंग हर्वज़ की नितांत आवश्यकता होती है जो सामान्य तापमान 7 डिग्री सेलिस्यस से नीचे होने पर ही प्राप्त होता है। यह तापमान सेब, नाशपाती, चैरी, अखरोट, बादाम, खुमानी, प्लम, आडू, अनार, स्ट्राबैरी, अंगूर, अंजीर, पीकननट, जापानी फल, ब्लैक वैरी, ब्लू बैरी इत्यादि फलों को चिल हर्वज़ की आवश्यकता होती है जिससे फूल की उत्पत्ति व गुणवत्ता फल की प्राप्ति होती है। सभी प्रकार के फल पौधों में सेब को सबसे अधिक चिल हर्वज़ (1000 घंटे) तक की आवश्यकता होती है।

इसके पश्चात खुमानी नाशपाती (400-900 घंटे) प्लम (400-700 घंटे) तथा आडू (200-800 घंटे) चिल हर्वज़ की पूर्ति होना आवश्यक है। इन फलों की विभिन्न किस्मों में चिल हर्वज़ तापमान 7.2 डिग्री सेल्सियस से 1 डिग्री सेल्सियस तक होने पर ही सही ढंग से मिल पाते हैं। यदि तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि हो या गिरावट हो जाए तो जितने समय तक तापमान सही नहीं हो पाता वह चिल हर्वज़ में सम्मिलित नहीं किए जाते हैं। अत: हिमपात का होना या ठंडी हवा का इस तापमान में होने का निर्धारण करके पौधों की चिल हर्वज़ की आपूर्ति करता है।

  •  अभी तक चिल हर्वज़ 400 घंटे तक की पूर्ति हो पाई है

इस समय तक चिल हर्वज़ 400 घंटे तक की पूर्ति हो पाई है। अभी फरवरी-मार्च के पहले पखवाड़े तक पर्याप्त हिमपात होने पर इन बाकी बचे चिल हर्वज़ की आपूर्ति होना स्वभाविक है। अत: बागवान इस स्थिति से न घबराएं। मौसम संबंधी वर्तमान की परिस्थितियों को ध्यान में ही रखकर बागवानों की सेब व अन्य शीतोष्ण फलों के बागीचों में कार्य करना चाहिए।

  • बागीचे में कांट-छांट का कार्य पूरा कर बोर्डो मिक्चर का तुरंत करें छिडक़ाव

इस समय बागीचे में कांट-छांट का कार्य पूरा कर लें। जहां कांट-छांट पूरी की जा चुकी है वहां बोर्डो मिक्चर का छिडक़ाव तुरंत कर लें। इसके लिए 2 किलो नीला थोथा व 2 किलो साधारण चूना 200 लिटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें। इससे पौधों पर रोगों तथा लाइकन (मेहंदी) व मौस आदि का प्रकोप नहीं हो पाता और लंबे समय तक प्रभावी रहता है।

  • कांट-छांट की गई लकड़ी का पाला पडऩे पर करें प्रयोग

बागवानी विशेषज्ञ ने बताया कि कांट-छांट की गई लकड़ी को इकट्ठा करके एक स्थान पर रखें और इन्हें अभी न जलाएं। पाला पडऩे की स्थिति में इनका प्रयोग किया जा सकता है। बागीचे में पनप रही झाडिय़ों को जो कोई अवरोधक नहीं है को न काटें। बहुत झाडिय़ां जिनमें फूल आते हैं जंगली मधु मक्खियों के लिए भोजन का प्रबल साधन बनती हैं और मधुमक्खियों को जंगल में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि जंगली या इंडियन मधुमक्खी का फल पौधों में फल पौधों में फल बनाने के लिए अभिन्न योगदान है, इन्हें हर स्थिति में बचाकर रखना अत्यंत आवश्यक है।

  • जंगली मधुमक्खियों के संरक्षण के प्रति जागरूक रहना बहुत आवश्यक

यदि मधुमक्खियों की जीव संख्या कम होगी तो फल बनने की भी संभावना उतनी ही कम हो जाती है। अत: जंगली मधुमक्खियों के संरक्षण के प्रति जागरूक रहना बहुत आवश्यक है।

  • बागीचों में कम नमी के चलते तौलिए बनाने का कार्य न करें

वर्तमान में बागीचों में कम नमी के चलते तौलिए बनाने का कार्य न करें, तौलिए तभी बनाएं जब पर्याप्त नमी तौलिए में उपलब्ध हो। इस समय तौलिया बनाने से उपलब्ध नमी की मात्रा में कमी आएगी और इसे हर हाल में बचाकर रखना आवश्यक है। पौधों में गौबर की खाद व सुपर फास्फेट उर्वरक की मात्रा भी न प्रयोग करें, इसे आसानी से मार्च में भी तौलिया बनाते समय प्रयोग किया जा सकता है।

बहुधा यह देखा गया है। कि ग्रामीण जंगलों में नया घास प्राप्त करने हेतु आग लगाते रहते हैं यह कार्य अत्यंत क्षति पहुंचाता है विशेषकर तापमान में वृद्धि, जंगली झाडिय़ों जिनमें फूल ऋतुनुसार आते रहते हैं और जंगली मधुमक्खियों को भोजन प्रदान कर जिंदा रखते हैं, अन्य मित्र कीट जो इन झाडिय़ों और पौधों में आश्रय लेते हैं नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, ऐसे अनिष्ट कार्य से स्वयं बचें तथा गांव के दूसरों को भी समझाकर रोकने का प्रयत्न करें।

जिन बागीचों में चूना-नीला थोथा से तना लेपन का कार्य पूरा नहीं जो पाया है अवश्य कर लें, इससे कैकर रोग, वूली एफिड, तने पर अंडे देने वाले बोरर कीट का सफलता d2910cc3-f6a1-451a-b61d-d0950b378e25पूर्वक नियंत्रण होता है।

 यदि नए पौधे लगाने हैं तो गडढे (1x1x1 मीटर) के करके इन्हें खुला छोड़े दें और धूप या वर्षा जल यदि आता है से भरने दें। 20-25 दिनों के पश्चात इन्हें गोबर की गली सड़ी खाद 1 किल्टा तथा सुपर फास्फेट 1 किलो की दर से मिट्टी में मिलाकर भर दें। पौधे तभी लगाएं जब भूमि में पर्याप्त वर्षा मिले। इन पौधों को मार्च तक सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। अत: शीघ्रता या उतावलापन न करें। पौधों को लगाते समय 400 मि.ली. डरमेट या डरसवान (क्लोरपायरीफास) तथा 600 ग्राम कापर आक्सीक्लोराईड (ब्लाईटाक्स, फाइटोलान) प्रति 200 लिटर पानी में मिलाकर प्रति पौधे में 5-10 लिटर घोल से सींचित करे, इसके प्रयोग से स्केल वूली एफिड व जड़छेदक तथा मृदा संबंधित रोगों का नियंत्रण होता है।

  • कास्टिक सोडा का छिडक़ाव न करें

आजकल बागवान कास्टिक सोडा का भी छिडक़ाव करते करते देखे गए हैं। यह छिडक़ाव 1960-70 के दशक में तब किया जाता था जब किसी भी प्रकार के अन्य रसायन उपलब्ध नहीं थे और यह केवल लाईकन (मैहंदी) की रोकथाम के लिए मुख्य तने पर ही किया जाता था। इसका आजकल प्रचलन विस्मित करता है, इसका प्रयोग न करें क्योंकि यह बीमों व कोमल कोंपलों के अग्र भाग को हानि पहुंचाता है जिसके कारण फूल व पत्तियां ठीक से नहीं निकल पाती और पौधों में फल उत्पादन कम होता है, लगातार प्रयोग से पौधे के अग्र भाग जल जाते हैं।

  • बागवान मौसम की पस्थितियों तथा बागीचे में समस्या को ध्यान में रखकर ही करें कार्य

बागवानों को मौसम की पस्थितियों तथा बागीचे में समस्या को ही ध्यान में रखकर समयानुसार कार्य करना चाहिए। कोई भी कार्य किसी राह चलते या अनभिज्ञ व्यक्ति से पूछकर न करें, अपित औद्यानिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से सम्पर्क करके ही करें, इससे समय, धन, अनावश्यक छिडक़ाव व रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग में कमी आएगी तथा पौधों की आयु व स्वास्थ्य में सुधार होगा तथा फल उत्पादन में भी गुणात्मक सुधार हो पाएगा।

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