हिमाचल की उत्कृष्ट कलाएं एवं वास्तुकला विश्वभर में विख्यात

हिमाचल की उत्कृष्ट कलाएं एवं वास्तुकला विश्वभर में विख्यात

हिमाचल प्रदेश की प्राचीन कलाएं, मंदिरों के वास्तुशिल्प, लकड़ी पर

हिमाचल प्रदेश की प्राचीन कलाएं, मंदिरों के वास्तुशिल्प, लकड़ी पर खुदाई, पत्थरों और धातुओं की मूर्तियों तथा चम्बा रूमालों आदि के रूप में आज भी सुरक्षित

हिमाचल प्रदेश की प्राचीन कलाएं, मंदिरों के वास्तुशिल्प, लकड़ी पर खुदाई, पत्थरों और धातुओं की मूर्तियों तथा चम्बा रूमालों आदि के रूप में आज भी सुरक्षित

खुदाई, पत्थरों और धातुओं की मूर्तियां तथा चम्बा रूमालों आदि के रूप में आज भी सुरक्षित है। हिमाचल अपनी सांस्कृतिक विरासत तथा लोगों के समृद्ध रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं के लिये विश्व भर में जाना जाता है। प्रदेश में सदियों पुराने मन्दिरों, दुर्गों तथा अन्य ऐतिहासिक स्मारकों की बहुमूल्य धरोहर है। हिमाचल अपनी उत्कृष्ट कला एवं शिल्प विशेषकर चम्बा रूमाल, थंका, लघुचित्र, पेंटिग्ज़ तथा धातु, स्टोन, काष्ठ शिल्प व विशिष्ट वास्तुकला इत्यादि के लिये भी विख्यात है।

इन कलाओं को तीन मुख्य वर्गों में बांटा जा सकता है।

  • 1. देशी और अधिक स्पष्ट कहें तो खश कलाएं। 2. भारतीय आर्यकलाएं।  3. भारतीय तिब्बती कलाएं।

हिमाचल की सबसे प्राचीन कलाकृतियां खश शैली में हैं और इनमें अधिकतर लकड़ी का प्रयोग हुआ है। इस शैली के प्राचीनतम उदाहरण औदुम्बरों के तांबे और चांदी से बने सिक्कों में मिलता है जो कि दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। औदुम्बरों के सिक्कों पर अंकित मंदिरों पर एक ध्वज, त्रिशूल और युद्ध में प्रयोग होने वाली कुल्हाड़ी है। इस आकृति के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ये शैव मन्दिर हैं।

  • मन्दिर शैली

संपूर्ण हिमाचल में वास्तुकला की दृष्टि से चार प्रकार के मंदिर मिलते हैं जो विभिन्न युगों में विभिन्न धार्मिक विश्वासों के सूचक हैं तथा इस अनुमान को आधार प्रदान करते हैं कि पुराने निवासियों के बीच नई जातियों का समावेश होता रहा है। इन शैलियों को अलगाने के लिए यदि छतों को आधार बनाया जाए तो चार प्रकार हैं- 1. पूरी तरह से बन्द छत जिसके चारों ओर बरामदा रहता है। 2. पिरामिड जैसी छत। 3. पैगोड़ा शैली वाले मंदिर जिन पर लकड़ी की गोल छत एक-दूसरे पर बनाई जाती है। 4. ढलानदार और पैगोड़ा आकार की छतें। अन्तिम शैली वाले मंदिर सतलुत घाटी की शैली वाले माने जाते हैं।

  • बन्द छत वाले मंदिर सबसे पुराने

बन्द छत वाले मंदिर सबसे पुराने हैं। भरमौर के शासक मेरूवर्मन द्वारा 7वीं शताब्दी में निर्मित भरमौर का लक्षणा देवी मंदिर तथा

संपूर्ण हिमाचल में वास्तुकला की दृष्टि से चार प्रकार के मंदिर मिलते हैं

हिमाचल में बन्द छत वाले मंदिर सबसे पुराने हैं

चित्तराड़ी का शक्ति देवी मंदिर इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं। इसी प्रकार का एक अन्य उदाहरण कालिदेवी अथवा मृकुला देवी के नाम से विख्यात मंदिर भी है जिसे कि कश्मीर के राजा आनन्द देव की पत्नी सूर्यमति ने बनवाया था जो कि त्रिगर्त कांगड़ा की राजकुमारी थी।

  •  जुब्बल घाटी में पिरामिड के आकार की छतों वाले मंदिर

पिरामिड के आकार की छतों वाले मंदिर जुब्बल घाटी में मिलते हैं। इसके सुन्दर उदाहरण हैं- हाटकोटी में हाटेश्वरी देवी और शिवजी का मंदिर तथा महासू और शिव का मंदिर जो कि जुब्बल के देयोरा में है। पैगोड़ा शैली सर्वाधिक रोचक है। यह शैली नेपाल से हिमाचल में आई जहां काठमांडू के अधिकांश मंदिर इसी शैली में बने हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि इस शैली को मैदानों से आने वाले लोगों ने ईसा सन् के प्रारम्भ में प्रचलित किया था जैसा कि औदुम्बरों के सिक्कों से पता चलता है।

  • हिमाचल के मण्डी, कुल्लू, किन्नौर, शिमला के पर्वतीय क्षेत्रों में पैगोड़ा शैली के असंख्य मंदिर

हिमाचल प्रदेश के मण्डी, कुल्लू, किन्नौर, शिमला के पर्वतीय क्षेत्रों में पैगोड़ा शैली के असंख्य मंदिर हैं। राजा बाणसेन द्वारा 1346 में निर्मित मण्डी का पराशर मंदिर, मनाली का हिडिम्बा मंदिर जिसे कि कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने 1553 में बनवाया था। नगगर का त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर, दयार में स्थित त्रियुगी नारायण मंदिर, खोखन में आदि ब्रह्मा मंदिर, कुल्लू घाटी में सनहार में स्थित मनु का मंदिर, सुंगरा में स्थित माहेश्वर मंदिर तथा किन्नौर में स्थित चगाओं मंदिर सभी पैगोड़ा छत शैली में निर्मित हैं।

चौथी शैली के मंदिर बंद छतों और पैगोड़ा शैली की छतों का मिश्रण हैं। इस मिश्रित शैली के उदाहरणों में बाहरी सिराज के नीरथ नामक स्थान पर निर्मित वाहन महादेव और धनेश्वरी देवी के मंदिर हैं। इनके अतिरिक्त पहाड़ी वास्तुशैली के मुख्य मंदिर हैं भीमाकाली मंदिर (सराहन, शिमला), बीजट देवता मंदिर (सराहां, चौपाल), शिरगुल देवता मंदिर, (जोडऩा, चौपाल), डोम देवता मंदिर, (गुठाण, ठियोग), मगलेश्वर मंदिर (बलग, ठियोग), कामरू मंदिर (सांगला, किन्नौर), रूद्रदेवता मंदिर (देवठी-मझगांव, सिरमौर), बौइन्द्रा देवता (अढाल, रोहडू), शिरगुल देवता मंदिर (शामा, सिरमौर) मगरू महादेव मंदिर (छतरी, मण्डी), मांहूनाग मंदिर (करसोग, मण्डी), गुड़ारू देवता मंदिर (गवास, रोहडू), महासू देवता मंदिर (बालीकोटी, शिलाई), नाग देवता मंदिर (जायली, चौपाल), दुर्गामाता मंदिर (शड़ी, ठियोग) तथा चेवली मंदिर शिला (बलसन, ठियोग)।

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