हिमाचल में समकालीन कला एवं शिल्प प्रदर्शन के लिये बनेगी आर्ट गैलरी

हिमाचल में समकालीन कला एवं शिल्प प्रदर्शन के लिये बनेगी आर्ट गैलरी

फ़ीचर

हिमाचल प्रदेश को अपनी सांस्कृतिक विरासत तथा लोगों के समृद्ध रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं के लिये विश्व भर में जाना जाता है। प्रदेश में सदियों पुराने मन्दिरों, दुर्गों तथा अन्य ऐतिहासिक स्मारकों की बहुमूल्य धरोहर है। हिमाचल अपनी उत्कृष्ट कला एवं शिल्प विशेषकर चम्बा रूमाल, थंका, लघुचित्र पेंटिग्ज़ तथा धातु, स्टोन, काष्ठ शिल्प व विशिष्ट वास्तुकला इत्यादि के लिये भी प्रसिद्ध है। प्रदेश सरकार राज्य की सांस्कृतिक विरासत के सभी स्वरूपों के संरक्षण, सम्वर्धन और प्रोत्साहन के लिये प्रतिबद्ध है। इसके अतिरिक्त, सरकार हिमाचल की समकालीन कला एवं शिल्प के व्यापक प्रसार एवं प्रदर्शन के लिये उचित मंच उपलब्ध करवाने के लिये निरन्तर प्रयासरत है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये शिमला स्थित राज्य संग्रहालय में अलग से एक ‘आर्ट गैलरी’ की स्थापना की जा रही है, जिसमें हिमाचल की समकालीन कला एवं शिल्प वस्तुएं प्रदर्शित की जाएंगी। प्रदेश के कलाकारों एवं शिल्पकारों ने अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान बनाई है। संग्रहालय में उनकी कृतियों के प्रदर्शन से न केवल अधिक से अधिक लोग इन कलाकारों की अदभुत कला से परिचित होंगे, बल्कि इन कलाकारों सहित उभरते कलाकारों को प्रोत्साहन एवं वित्तीय सम्मान भी प्रदान किया जाएगा। इस दिशा में शुरूआत करते हुए राज्य संग्रहालय शिमला समकालीन हिमाचली कला एवं शिल्प की नई गैलरी के लिए थंका, चम्बा रूमाल और धातु शिल्प अधिगृहित करने जा रही है।

इसके अन्तर्गत इच्छुक कलाकार एवं शिल्पकार लाभ प्राप्त करने के लिये निर्धारित प्रपत्र पर 30 सितम्बर, 2015 से पहले जिला भाषा अधिकारी के पास आवेदन कर सकते हैं। आवेदन पत्र सम्बन्धित जिला भाषा अधिकारी कार्यालयों से प्राप्त किए जा सकते हैं, इसके अलावा, इन्हें हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की वैबसाईट से भी डाउनलोड किया जा सकता है।

प्रदेश की समकालीन कला एवं शिल्प को अधिगृहित करने के लिये हिमाचल राज्य संग्रहालय के क्यूरेटर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी तथा अधिगृहित वस्तुओं को राज्य संग्रहालय में समकालीन कला एवं शिल्प गैलरी में प्रदर्शन के लिये रखा जाएगा।

आरम्भ में समिति थंका पेंटिग्ज़, चम्बा रूमाल और धातु कला को अधिगृहित करेगी तथा बाद में काष्ठ शिल्प, स्टोन क्राफ्ट, समकालीन पेंटिग्ज़, लघु चित्र पेंटिग्ज इत्यादि का भी अधिग्रहण किया जाएगा।

हिमाचल प्रदेश में पुरातात्विक महत्व वाले अनेक ऐतिहासिक स्मारक एवं प्राचीन मन्दिर हैं तथा प्रदेश सरकार इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करने के लिये प्रयासरत है। पूर्व में मन्दिरों एवं स्मारकों इत्यादि के जीर्णोद्धार एवं मुरम्मत के लिये अधिकतम 50 हजार रूपये तक की धनराशि उपलब्ध करवाई जाती थी।

वर्तमान प्रदेश सरकार ने पुराने मन्दिरों एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्मारकों के पुरातन वैभव को बरकरार रखने के लिये इनकी मुरम्मत व जीर्णोद्धार के लिये आवश्यकतानुसार धनराशि उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया है।

विविध सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजनों के लिये प्रदेश सरकार सभी जिला मुख्यालयों पर जहां यह सुविधा उपलब्ध नहीं है, इण्डोर सभागारों का निर्माण पर बल दे रही है और इसके लिये वर्तमान वित्त वर्ष के दौरान 25 करोड़ रूपये का बजट प्रावधान किया गया है।

इसके अतिरिक्त, ऐसे मन्दिर जिनकी ज़मीनें हिमाचल सरकार को या मुजारों को चली गई हैं और जिनकी माली हालत कमजोर है, के रखरखाव के लिये वर्ष 2014¬-15 में 5 करोड़ रूपये की धनराशि का रिवॉलविंग फंड गठित किया गया था तथा इस निधि में वर्ष 2015-16 में पांच करोड़ रूपये के अतिरिक्त बजट का प्रावधान किया गया है।

प्रदेश सरकार ने समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सभी स्वरूपों के संरक्षण एवं प्रदर्शन को सुनिश्चित बनाने तथा कलाकारों, शिल्पकारों, कवियों, साहित्यकारों और शोधार्थियों को प्रोत्साहन देने के लिये अनेक योजनाएं आरम्भ की हैं। सरकार बहुमूल्य पुरातन पाण्डुलिपियों, छायाचित्रों, पेंटिग्ज, ऐतिहासिक दस्तावेजों तथा अन्य पुरातात्विक एवं अभिलेखीय वृति की महत्वपूर्ण वस्तुओं के संग्रहण एवं संरक्षण पर विशेष बल दे रही है।

पुरातन कला एवं संस्कृति के पुनरूत्थान एवं पुनःस्थापन तथा प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने राज्य में ललित कला महाविद्यालय खोलने का निर्णय लिया है। हिमाचली विद्यार्थियों को प्रदेश से बाहर निष्पादन कला, ललित कला इत्यादि के उच्च अध्ययन संस्थानों में प्रवेश पर छात्रवृतियां भी प्रदान की जा रही हैं।

प्रदेश सरकार के प्रभावी प्रयासों से हिमाचल की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का जहां समुचित संरक्षण एवं संवर्धन सुनिश्चित बनाया जा रहा है, वहीं वैश्विक फलक पर इसकी पहचान को और नये आयाम दिए जा रहे हैं।

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