नौणी विवि की तकनीक से बना हुआ सेब का सिरका लॉंच

नौणी विवि की तकनीक से बना हुआ सेब का सिरका लॉंच

सोलन: जल्द ही देश और प्रदेश के बाज़ारों में डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी द्वारा विकसित  एप्पल साइडर विनेगर उत्पादन तकनीक से बना सिरका उपलब्ध होगा। जुब्बल के नंदपुर स्थित कंपनी हिली फूड्स, विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इस सेब का सिरके बनाने की प्रौद्योगिकी, जो की पारंपरिक तरीकों का तेज और प्रभावी विकल्प है, का इस्तेमाल करके यह सिरका बनाया है।

हिली फूड्स द्वारा तैयार इस उत्पाद को हाल ही में विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति डॉ. परविंदर कौशल द्वारा लॉन्च किया गया। उद्यमी और हिली फूड्स के संस्थापक बीएस रावत भी इस अवसर पर मौजूद रहे। निदेशक अनुसंधान डॉ. राकेश गुप्ता, डीन बागवानी महाविद्यालय डॉ एमएल भारद्वाज, लाइब्रेरियन डॉ डीडी शर्मा, खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के विभाग अध्यक्ष डॉ अंजू धीमान और वैज्ञानिक डॉ. राकेश शर्मा ने भी लॉन्च समारोह में भाग लिया।ss1

विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिक डॉ. राकेश शर्मा और डॉ वीके जोशी ने डीएसटी प्रायोजित परियोजना के तहत इस प्रौद्योगिकी को परंपरागत तरीकों की जगह पर एक तेज़ और प्रभावी विकल्प के रूप में विकसित किया है। यह तकनीक, बाज़ार में न बिकने वाले खराब क्वालिटी सेब से सिरके के उत्पादन में मददगार होगी और राज्य में कृषक समुदाय की आजीविका में सुधार लाने का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण होगा। वर्ष 2018 में हिली फूड्स ने विश्वविद्यालय के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और इस तकनीक को हस्तांतरित किया गया। इस समझौते के तहत, कंपनी सेब के सिरके का निर्माण और बिक्री के लिए विश्वविद्यालय की तकनीक का उपयोग कर रही है।

सेब का सिरका बनाने के परंपरागत तरीके धीमें और खराब गुणवत्ता वाला सिरका देते हैं। इसके विपरीत, विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक नई तकनीक में इन समस्याओं को दूर करने में कामयाब रहें हैं। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लगभग पांच वर्षों के शोध में सिरके और बेस वाइन के उत्पादन में पेश आने वाली विभिन्न समस्याओं का समाधान किया है। व्यापक शोध कार्य के बाद एक संशोधित प्रक्रिया विकसित की गई जिसमें तुलनात्मक रूप से कम समय और गुणवत्ता वाले सिरके का उत्पादन होता है। एप्पल साइडर विनेगर के उत्पादन के लिए एक संशोधित पायलट सिरका उत्पादन संयंत्र भी विकसित किया गया है।

वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कुलपति डॉ परविंदर कौशल ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा ज्ञान और विकसित तकनीक, किसानों और उद्यमियों को उपलब्ध कारवाई जा रही है ताकि विश्वविद्यालय में किए जा रहे अनुसंधान का लाभ कृषक समुदाय उठा सके। उन्होनें कहा कि प्रदेश में पारंपरिक ज्ञान की प्रचुरता है और जरूरत है की नवीनतम वैज्ञानिक आदानों के साथ इन तकनीक को बेहतर बनाया जा सके। डॉ कौशल ने कहा कि राज्य की जलवायु परिस्थितियां उच्च गुणवत्ता वाले फलों, सब्जियों और अन्य फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देती है और यह महत्वपूर्ण है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए इसे सही ढंग से उपयोग किया जाए। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभिन्न तकनीकों और प्रोटोकॉल से फसल के बाद के नुकसान और खाद्य पदार्थों के पूर्ण उपयोग की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। विश्वविद्यालय किसानों और कृषि-उद्यमियों को गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान से लाभान्वित करने के लिए नई-नई तकनीक पर अनुसंधान करता रहता है। हिमाचल प्रदेश में सेब उद्योग के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित होगी, क्योंकि उत्पादन क्षेत्र में उपयुक्त प्रसंस्करण तकनीक की कमी के कारण मुख्य रूप से कुपित सेब (निम्न श्रेणी के आकार और विकृत सेब) की एक बड़ी मात्रा हर साल बर्बाद हो जाती है।

दुनिया भर में सिरके का उपयोग स्वाद और खाद्य संरक्षक के लिए किया जाता है। विभिन्न प्रकार के नॉन-सिंथेटिक सिरकों में सेब का सिरका भी शामिल है जो सेब के जूस एवं कॉन्संट्रेट से किन्वीकरण द्वारा तैयार किया जाता है और कई देशों में इसका इस्तेमाल होता है। कई औषधीय गुणों और गठिया, अस्थमा, खांसी, उच्च ब्लड शुगर, उच्च कोलेस्ट्रॉल इत्यादि जैसी बीमारियों को ठीक करने में इसकी भूमिका के कारण सेब के सिरके के मांग में पिछले कुछ सालों में कई गुना वृद्धि हुई है।

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