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घरेलू हिंसा से महिलाओं का बचाव अधिनियम, 2005

 

विशेष लेख

 

  • * लायर्स कलैक्टिव विमन्स राइट्स इनिशिएटिव
  • धन राहत के आदेश/मुआवजा आदेश

 

घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव अधिनियम, 2005 अंतर्गत गुजारे भत्ते का दावा करने का कौन पात्र है?

आपराधिक प्रक्रिया संहिंता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत व्यक्तियों की सभी श्रेणियां इस कानून के अंतर्गत गुजारे भत्ते का दावा करने की पात्र हैं। इनमें पत्नी, अवयस्क बच्चे भले ही वे वैध हों या अवैध, शारीरिक या मानसिक असमान्यता या चोट से पीड़ित वयस्क बच्चे और माता शामिल हैं। अपने निजी कानून के अंतर्गत अन्य पात्र भी दावा कर सकते हैं।

 

धन राहत की राशि की गणना किस प्रकार की जाती है?

अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत- धन राहत की राशि पर्याप्त, समुचित और वाजिब तथा पीड़ित महिला के पहले के जीवन स्तर के अनुरूप स्तर के अनुसार होनी चाहिए। धन राहत की राशि की गणना करते हुए अदालतें गुजारे भत्ते के कानून के अंतर्गत निर्धारित मानकों का पालन करेंगी।

[एचएएमए की धारा 23(2)] न्यायालय को दिये जाने वाले गुजारे भत्ते की राशि तय करते हुए निम्नलिखित कारकों पर विचार करना होगा।

  • दम्पति का सामाजिक स्तर, इसमें पति की आय और दम्पति का जीवन स्तर शामिल है।
  • पत्नी की वाजिब जरूरतें; इसमें उसकी भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा व्यय का न्यूनतम शामिल है।
  • पत्नी की सम्पति और आय, यदि कोई हो, का मूल्य।
  • एचएएमए के अंतर्गत पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने के व्यक्तियों की संख्या; इसमें पत्नी, बच्चों उनके अभिभावक और विधवा बहू शामिल हैं।

 

क्या धन राहत एकमुश्त राशि हो सकती है या मासिक किश्तों में होनी चाहिए?

क्या धन राहत मासिक भुगतान है या यह एकमुश्त भुगतान के रूप में होगी, यह पीड़ित महिला की मांग और न्यायालय के विवेक पर निर्भर करेगा। घरेलू हिंसा से बचाव अधिनियम, 2005 के अंतर्गत धारा 20(3) के तहत मासिक भुगतान या एक मुश्त राशि स्वीकृत की जा सकती है।

अगर किसी महिला को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत या गुजारे भत्ते के किसी अन्य मुकदमे में कोई आदेश मिला है या कोई गुजारा भत्ते का आदेश मिला है तो क्या वह घरेलू हिंसा से बचाव अधिनियम, 2005 के तहत प्रवर्तन का आवेदन कर सकती है?

इस कानून के अंतर्गत धारा 125 के आदेश के प्रर्वतन के लिए अनुरोध करने का कोई लाभ नहीं है लेकिन धारा 125 के आदेश के उल्लंघन को आर्थिक दुरुपयोग के आधार पर घरेलू हिंसा माना जा सकता है।

 

धारा 12(2) के प्रावधान का क्या अर्थ है? कैसे अलग किए गए भाग की गणना की जाएगी?

धारा 12(2) के प्रावधान में कहा गया कि जब किसी पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में कोई अदालत मुआवजे और क्षति की कोई राशि की डिक्री का आदेश देती है तो अधिनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश के अनुरुप भुगतान की गई या भुगतान की जाने वाली राशि ऐसी डिक्री के अंतर्गत भुगतान की जाने वाली राशि के बदले अलग कर दी जाएगी और शेष राशि, यदि पृथक किए जाने के बाद शेष बची, के लिए डिक्री लागू की जाएगी। आदेश दिए जाने के बाद राशि में से सीआरपीसी की धारा 125 या एचएएमए या किसी अन्य कानून के प्रावधानों के अनुरूप राशि कम कर दी जाएगी।

 

क्या कोई मुस्लिम महिला घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव अधिनियम, 2005 के अंतर्गत धन राहत के आदेश का अनुरोध कर सकती है?

कोई मुस्लिम महिला जिसने तलाक नहीं लिया हो वह इस अधिनियम के अंतर्गत धन राहत की मांग कर सकती है। अगर वह तलाकशुदा है तो उसके अधिकार मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकारों की रक्षा) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत तय किए जाएंगे और उसे सीआरपीसी की धारा 125 के अंतर्गत कानून का सहारा लेना होगा (देखें डेनियल लतीफ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया [(2001)7 एससीसी 740]

 

कोई मुस्लिम महिला अपने पुत्र के लिए धन राहत के आदेश के लिए आवेदन कर सकती है।

अदालत कैसे यह सुनिश्चित करेगा कि प्रतिवादी के पास राहत और मुआवजे के भुगतान करने के साधन नहीं होने पर किस तरह धन राहत और मुआवजे, वैकल्पिक आवास के आदेश लागू किया जाएं?

उच्चतम न्यायालय ने लीलावती बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश [1982 (1) एससीसी437] में राय दी है कि यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ और स्वस्थ शरीर का है तो उसके पास अपनी पत्नी, बच्चों और अभिभावकों को मदद देने के अवश्य साधन होने चाहिए। न्यायालय सीआरपीसी की धारा 125(3) के अंतर्गत कार्रवाई शुरू कर सकता है और प्रतिवादी की गिरफ्तारी भी की जा सकती है अगर वह धारा 125 के अंतर्गत के आदेश पर भुगतान नहीं करता।

 

धन राहत का आदेश का पालन नहीं किए जाने के मामलों में क्या प्रक्रिया अपनायी जाएगी?

नियम 6(5) में प्रावधान है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव अधिनियम, 2005 के अंतर्गत सभी आदेशों को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत निर्धारित तरीके से लागू किया जाएगा।

नियम 10(ई) में प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिखित में निर्देश दिए जाने पर संरक्षण अधिकारी अधिनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित तरीके से न्यायालय के आदेश को लागू करने में मदद देगा। ऐसा करने के लिए धारा 12, 18, 19, 20, 21, 23 के अंतर्गत आदेश शामिल हैं।

घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आदेशों के पालन की कार्रवाई सीआरपीसी की धारा 125(3) के अंतर्गत शुरू की जा सकती है। मजिस्ट्रेट देय राशि प्राप्त करने के लिए जुर्माना वसूलने के लिए निर्धारित तरीके के अनुरूप वारंट जारी कर सकता है और किसी व्यक्ति को मासिक राशि के किसी भाग या पूरी राशि के लिए या धनराहत के आदेश में वर्णित किसी अन्य राशि के लिए जेल भी भेज सकता है।

समुचित मामलों में न्यायालय प्रतिवादी के नियोक्ता को पीड़ित व्यक्ति को इस अधिनियम की धारा 20(6) के अंतर्गत सीधे भुगतान का निर्देश दे सकता है, इसके लिए सम्पति कुर्क आदि भी की जा सकती है।

मजिस्ट्रेट जब संरक्षण आदेश के साथ धन राहत का आदेश देता है तो आदेश का पालन नहीं किए जाने का मतलब अधिनयम की धारा 31 के अंतर्गत कानून का उल्लंघन होगा। सदैव किसी अन्य राहत के साथ संरक्षण आदेश का अनुरोध करने की सलाह दी जाती है।

धारा 20(4) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को धन राहत के आदेश की प्रति पुलिस को भेजनी होगी।

 

पुलिस को आदेश का पालन कराने का अधिकार नहीं दिया गया तो ऐसे में आदेश लागू कैसे किया जाएगा?

पुलिस को जब आदेश दिया जाता है तो पीड़ित व्यक्ति को आदेश के पालन में पुलिस को सहायता देने का निर्देश का आदेश मांगना चाहिए। यदि ऐसा निर्देश नहीं दिया जाता तो घरेलू हिंसा का रिकार्ड पुलिस के पास रखा जाना जरूरी है ताकि पुलिस के पास मामले का इतिहास रहे और वह आवश्यकता पड़ने पर सहायता दे सकें। जब कोई संरक्षण आदेश धन राहत के आदेश के संयोजन में दिया जाता है तो संरक्षण आदेश का उल्लंघन संज्ञेय अपराध होता है और धारा 31 के अंतर्गत पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

देखरेख आदेश

 

क्या कोई महिला इस आदेश के अंतर्गत बच्चों की देखरेख के लिए अपने पास रखने का अनुरोध कर सकती है?

जी हां अधिनियम की धारा 21 के अंतर्गत ऐसा किया जा सकता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि देखरेख के आदेश के लिए आवेदन या संरक्षण या अन्य आदेशों के अलावा किया जाना चाहिए। इसका अर्थ है कि घरेलू हिंसा होने की स्थिति में महिला अगर संरक्षण आदेश आदि चाहती है तो वह अस्थाई देखरेख के आदेश के लिए आवेदन कर सकती है।

मजिस्ट्रेट केवल बच्चों की अस्थाई देखरेख के आदेश दे सकता है। इससे किसी अन्य पक्ष को किसी समुचित मंच पर बच्चों की स्थाई देखरेख या संयुक्त देखरेख का अनुरोध करने से रोका नहीं जा सकेगा।

अगर बच्चों की देखरेख के बारे में किसी न्यायालय में मामला लंबित है तो उसी न्यायालय में बच्चों के अस्थाई देखरेख का आवेदन दिया जा सकता है।

 

न्यायालय किस तरह बच्चों के श्रेष्ठ हित का फैसला करेगा?

अस्थाई देखरेख के आवेदन पर फैसला करते समय बच्चों के श्रेष्ठ हितों या बच्चों के कल्याण को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। रोजी जैकब बनाम जैकब चक्रामाकल में उच्चतम न्यायालय ने संरक्षक नियुक्त करने के मामले पर विचार करते हुए राय दी कि

“अवयस्क का कल्याण क्या होगा इसका विचार करते हुए न्यायालय को नाबालिग की आयु, लिंग और धर्म, प्रस्तावित संरक्षक की क्षमता और चरित्र तथा नाबालिग के साथ उस व्यक्ति की निकटता को ध्यान में रखना चाहिए”

बच्चे के कल्याण का फैसला केवल भौतिक आराम के पहलू के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। मैकग्राथ (इनफेंट्स) (1983) एक अध्याय 143, अनुमति से उल्लेखित, धनवंति जोशी बनाम माधव उंडे (1998)1 एससीसी 112 में यह व्यवस्था दी गई है कि “बच्चे का कल्याण का आकलन केवल धन या केवल भौतिक आराम के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। ‘कल्याण’ शब्द का अर्थ व्यापक भाव के अनुरूप किया जाना चाहिए।

नैतिक और धार्मिक कल्याण पर भौतिक कल्याण पर विचार किया जाना चाहिए। स्नेह के संबंधों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।”

वाकर बनाम वाकर-6 1981 न्यू जी रिसेन्ट लॉ 257

“कल्याण एक व्यापक शब्द है। इसमें भौतिक कल्याण शामिल है जिसमें एक घर और आरामदायक जीनव स्तर तथा अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त देखभाल और निजी गौरव की भावना समाहित है। हालांकि भौतिक आधारों का भी स्थान है लेकिन वे गौंण हैं। देखभाल और मार्गदर्शन की समझबूझ, करूणामय संबंधों की गर्माहट भी बच्चे के अपने चरित्र, व्यक्तित्व और प्रतिभा के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

 

प्रवर्तन

पीड़ित महिला के साथ बातचीत करने से प्रतिवादी को रोकने के आदेश को कैसे लागू किया जाएगा?

अगर बातचीत फोन से है तो इसका रिकार्ड रखा जाएगा और पीड़ित व्यक्ति को कॉलर आईडी लगाने की सलाह दी जा सकती है। अगर ई-मेल से संपर्क किया जाता है तो इसका रिकार्ड रखा जा सकता है तो इसे प्रमाण के तौर पर न्यायालय में पेश किया जा सकता है। अगर प्रतिवादी पीड़ित व्यक्ति को उसके कार्यालय या घर में मिलने जाता है तो पीड़ित व्यक्ति को तुरंत पुलिस बुलानी चाहिए ताकि आदेश का उल्लंघन कर प्रतिवादी को गिरफ्तार किया जा सके।

नियम 10(ई): मजिस्ट्रेट द्वारा अगर ऐसा करने का निर्देश दिया गया है तो वह अधिनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित तरीके से कार्रवाई के आदेश लागू करने में मदद देगा इसमें धारा 12, 18, 19, 20, 21, 23 के आदेश शामिल हैं।

संरक्षण अधिकारी को प्रतिवादी द्वारा किए गए संपर्क या बातचीत के बारे में सूचित किया जाए या उससे संपर्क किया जाए ताकि इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तत्काल कार्रवाई की जा सके।

धारा 19(4) के अंतर्गत शांति बनाए रखने का बॉन्ड भी भरा जाना चाहिए (और आगे घरेलू हिंसा रोकने के लिए)। पीड़ित महिला के बचाव के लिए पुलिस मदद ली जा सकती है। इस कानून के अंतर्गत किसी आदेश को लागू कराने के लिए भी वह पुलिस मदद ले सकती है।

 

निवास के आदेश के उल्लंघन को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

मजिस्ट्रेट धारा 19(3) के तहत प्रतिवादी को भविष्य में घरेलू हिंसा रोकने के लिए बॉन्ड भरने का आदेश दे सकता है जिसमें निवास के आदेश के प्रावधान हैं। धारा 19 के अंतर्गत किसी उल्लंघन को सीआरपीसी के अध्याय 8 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप निपटा जाएगा। अतः बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन पर गिरफ्तार किया जा सकता है।

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