दो देश भारत और पाकिस्तान का एक अध्याय " शिमला समझौता"

दो देश भारत और पाकिस्तान का एक अध्याय ” शिमला समझौता”

 

 

शिमला समझौता

शिमला समझौता

2-3 जुलाई 1972 की आधी रात को एशिया के दो देश भारत और पाकिस्तान मिलकर एक ऐसा अध्याय लिख रहे थे जिसे आज शिमला समझौता कहा जाता है। दोनों देशों के बीच हुए इस समझौते को 41 साल पूरे हो रहे हैं। 2 जुलाई 1972 की रात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो एक टेबल के सामने साथ-साथ बैठे थे। तारीख बदलकर 3 जुलाई हो चुकी थी और घड़ी में 12 बजकर 40 मिनट हो रहे थे। ये वो पल था जब भारत-पाकिस्तान के बीच एक समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे। शिमला के ताजगी भरे माहौल में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने शांति और विश्वास के लिए लिखित आश्वासन दिया।

41 साल पहले पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने ही भारत के सामने शांतिवार्ता का प्रस्ताव रखा था। जिसे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी स्वीकार कर लिया। दरअसल वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक बड़ा युद्ध लड़ा जा चुका था, 93 हजार पाकिस्तानी फौजी भारत में युद्धबंदी थे और पाकिस्तान से टूट कर पूर्वी पाकिस्तान भी बंगलादेश बन गया था। पूर्वी पाकिस्तान का आंदोलन, मुक्तिवाहिनी को भारत का समर्थन, 1971 के युद्ध में करारी हार और बंगलादेश का उदय, यही सब वे कारण थे जिनकी वजह से भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बेहद नाजूक दौर से गुजर रहे थे। विश्वास बहाली और कड़वाहट को कम करने के मकसद से इंदिरा और भुट्टो ने एक मंच पर आने का फैसला किया। 23 अप्रैल 1972 को पाकिस्तान के मरी में हुई दूतस्तरीय-वार्ता में शिखर-वार्ता के लिए शिमला की हसीनवादियों को चुना गया।

शिमला समझौता एक मिल का पत्थर साबित होने वाला था। भारत-पाकिस्तान के बीच शिखर-वार्ता 28 जून से 1 जुलाई तक तय की गयी। चार दिन तक चलने वाली इस वार्ता में सात दौर की वार्ता होनी थी। 28 जून 1972 के समाचार-पत्र हिन्दुस्तान के मुताबिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाली शिखर-वार्ता के लिए 27 जून को ही शिमला पहुंच गयी। चंडीगढ़ में मौसम खराब होने की वजह से इंदिरा चार घंटे विलम्ब से शिमला पहुंची। शिमला में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिखर-वार्ता की तैयारियों और व्यवस्थाओँ का जायजा स्वयं ही लिया। इस अवसर पर इंदिरा ने पत्रकारों से कहा कि “शिखर वार्ता पाकिस्तान के लिए शत्रुता भुलाकर नई शुरुआत करने का अवसर है।

28 जून को ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ वार्ता के लिए शिमला पहुंचे। 29 जून को

पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ वार्ता के लिए शिमला पहुंचे

पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ वार्ता के लिए शिमला पहुंचे

हिन्दुस्तान अखबार ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के स्वागत की खबर पर लिखा- “अनेक वर्षों के कटु संबंधों के बाद आज हरी-मरी घाटी में उस समय भारत-पाकिस्तान के राष्ट्रीय गीतों की धुन एक साथ गुंज उठी जब शिखर वार्तो के लिए पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो यहां पहुंचे।“

28 जून को भारत-पाक संबंधों में नए युग की कामना के साथ शिखर वार्ता शुरु हुई। दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच पहले दौर की बातचीत करीब एक घंटे तक चली। देर रात संयुक्त वक्तव्य में बताया गया कि शिखर-वार्ता सद्वभावना और रचनात्मक माहौल में शुरु हुई है। लेकिन अगले ही दिन खबरे सामने आने लगी कि प्राथमिक महत्व के विचारणीय मुद्दों के प्रश्न पर भारत-पाक शिखर वार्ता नाजूक दौर में पहुंच गयी है। वार्ता की रफ्तार धीमी पड़ने लगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के महानिदेशक डॉ एमए भट्टी ने 29 जून की शाम पत्रकारों को बताया कि “वार्ता प्रगति कर रही है लेकिन उसकी गति बहुत धीमी है।“

29 जून को इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच कश्मीर और युद्धबंदियों की रिहाई जैसे विवादित मुद्दों पर विचार-विमर्श भी हुआ। लेकिन भारत-पाक के बीच अहम मुद्दों पर विवाद बना रहा। इसके लिए पाकिस्तान की हठधर्मी ही मुख्य रूप से जिम्मेदार थी। बातचीत का ये सिलसिल टूटता और बनता रहा। 30 जून को दोनों देशों के प्रतिनिधियों की बैठक में विशेष रूप से कश्मीर पर गतिरोध पैदा हुआ और बातचीत टूटने के कगार पर पहुंच गयी। राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ भारत आए पाकिस्तानी पत्रकारों से इंदिरा ने खास इंटरव्यू में कहा “हम कुछ ऐसा सिलसिला यहां भी शुरु करें, जो इतनी आवाम यहां है और सदियों से दबी रही है, गरीब रही है। तो इनको मौका मिले नई जिंदगी का। तो उसके लिए ज़रूरी हो जाता है कि आपसी झगड़े खत्म हों।“

शिमला समझौते में कई महत्वपूर्ण बातें कही गयी थी

शिमला समझौते में कई महत्वपूर्ण बातें कही गयी थी

दोनों देशो के बीच पाकिस्तान द्वारा बंगलादेश को मान्यता, भारत-पाकिस्तान के राजनयिक संबंध, व्यापार, कश्मीर में नियंत्रण रेखा स्थापित करना और युद्धबंदियों की रिहाई जैसे मुद्दों पर बातचीत चलती रही। लेकिन कुछ मुद्दों पर एक राय नहीं बन पा रही थी। आखिरकार 30 जून को इंदिरा और भुट्टो ने शिखर-वार्ता को सफल बनाने के इरादे से निजी बातचीत की। 1 जुलाई को हिन्दुस्तान अखबार ने लिखा- “भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति भुट्टो के बीच आज यहां 40 मिनट तक निजी बातचीत हुई। जिसके फलस्वरुप भारत उपमहाद्विप में स्थायी शांति के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही शिखर-वार्ता की सफलता की अब आशा होने लगी है। दोनो देश समझौते के एक मसौदे पर विचार कर रहे है।“

1 जुलाई को इन्दिरा-भुट्टो को बातचीत के अंजाम देने के लिए फिर एक मेज पर आमने-सामने बैठे। लेकिन इस बार भी कश्मीर और युद्धबंदियों के मसले पर दोनों देशों के बीच विवाद बना रहा। इसके बाद भुट्टो ने एक प्रेस-वार्ता बुलाई। जिसमें भुट्टों ने कहा “मैं आपसे कहना चाहता हूं कि कुछ सफलता के साथ कुछ उम्मीद बची है। ये आज शाम को हुई मीटिंग का सार है। वहीं दूसरी तरफ इंदिरा ने भी उम्मीद जाहिर करते हुए पत्रकारों से कहा कि “ भारत-पाकिस्तान शिखर वार्ता में कुछ विशेष निश्चित परिणाम उभर कर नहीं आ सके हैं पर अंतिम परिणाम के प्रति मैं निराशावादी नहीं हूं।“

1 जुलाई की बातचीत भी बेनतीजा रही थी। असफल वार्ता और डिनर के बाद सभी सोने चले गए। लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो बैचेन थे। वे आधी रात को इंदिरा के कमरे में गए और इंदिरा से कहा कि वे अपने वतन खाली हाथ नहीं लौटना चाहते। उन्होंने इंदिरा से गुजारिश की कि भारत युद्ध में बंदी बनाय गए पाकिस्तानी सैनिकों को छोड़ दे। बदले में इंदिरा ने भी शर्त रख दी कि पाकिस्तान एलओसी को इंटरनेशनल बॉर्डर मान ले। भुट्टो ने इंदिरा को भरोसा दिलाया और लौट गए।

दोनों देशों के प्रतिनिधी और पत्रकार किसी समझौते की उम्मीद छोड़ चुके थे लेकिन अगले दिन फिर 2 जुलाई को दोनों पक्षों में बातचीत हुई। आखिरकार 2 और 3 जुलाई की रात 12 बजकर 40 मिनट पर दोनों देशों ने समझौता पर हस्ताक्षर कर दिए। शिमला समझौते में दोनों देशों ने महत्वपूर्ण बातों पर सहमति जाहिर की थी।

शिमला समझौते में कई महत्वपूर्ण बातें कही गयी थी। भारत-पाक इस बात पर राज़ी हुए थे कि दोनों पक्ष सभी विवादों और समस्याओं

बेगम के अचानक बीमार होने पर उनकी जगह बेनजीर को साथ ले आए थे भुट्टो

बेगम के अचानक बीमार होने पर उनकी जगह बेनजीर को साथ ले आए थे भुट्टो

का शांतिपूर्ण समाधान बातचीत से करेंगे। स्थिति में एकतरफा कार्यवाही करके कोई परिवर्तन नहीं करेंगे। एक दूसरे के विरुद्घ बल प्रयोग नहीं किया जाएगा। एक दूसरे की राजनीतिक स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। कश्मीर सहित जितने भी विवाद हैं, उनका समाधान आपसी बातचीत से ही किया जाएगा और उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठाया जाएगा।

इस समझौते में भारत-पाकिस्तान ने तय किया कि 17 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी सेनाओं के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनायें जिस स्थिति में थीं, उस रेखा को ”वास्तविक नियंत्रण रेखा“ माना जाएगा और कोई भी पक्ष अपनी ओर से इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेगा। शिमला समझौते के बाद नियंत्रण रेखा को बहाल किया गया। लेकिन पाकिस्तान अपने इस वाएदे को कभी नहीं पूरा किया।

शिमला में हुए समझौते के बाद भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया और पाकिस्तानी जमीन भी वापस कर दी। इसके अलावा शिमला समझौते में दोनों देशों के बीच आवागमन की सुविधाएं, व्यापार, आर्थिक सहयोग और राजनयिक संबंधों पर भी सहमति बनी।

वहीं भारत में शिमला समझौते का विरोध किया जा रहा था। भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी के नेता प्रताप केसरी देव और कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई ने भारतीय कब्जे में आए इलाकों को लौटाए जाने का विरोध किया। लेकिन शिमला समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय रूप न देकर आपसी बातचीत से सुलझाने का वचन दिया गया था।

शिमला समझौते के 43 साल के सफर में पाकिस्तान ने कई बार अपने वचनों को तोड़ा है। कारगिल, सीमा उल्लंघन के मामले, आतंकी कैंप जैसी मिसाले शिमला समझौते के औचित्य पर सवाल खड़ा करती हैं।

दिसंबर 1970 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए थे। इस चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान की आवामी लीग ने 169 में से 167 सीटों पर जीत दर्ज की। इस जीत के बाद राष्ट्रपति याह्या खां ने आवामी लीग को सत्ता सौंपने से इंनकार कर दिया। 7 मार्च 1971 को आवामी लीग के नेता बंगबंधु मुजीबुर्रहमान ने पश्चिमी पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी। बंगबंधु की नेतृत्व में बांग्लादेश की आजादी की मांग उठने लगी। राष्ट्रपति याह्या खान ने आंदोलन को कुचलने के लिए 25 मार्च 1971 को सैनिक कार्रवाई के आदेश दे दिए। सैनिक कार्रवाई में करीब 3 लाख बांग्लादेशी मारे गए।

 शांति-प्रस्ताव शिमला समझौते के रुप में सामने आया

शांति-प्रस्ताव शिमला समझौते के रुप में सामने आया

पूर्वी पाकिस्तान के राजनैतिक संकट का असर भारत पर भी पड़ा। पूर्वी पाकिस्तान की आवाम भारत की ओर भागने लगी। देखते ही देखते भारत में शरणार्थियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर पहुंच गयी। इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान से आ रहे शरणार्थियों की मदद के लिए भारतीय सीमा खोल दी। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान और शरणार्थियों की समस्या को विदेशी मंचों पर भी उठाना शुरु किया। साथ ही बंगलादेश आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इससे बौखला कर पाकिस्तान की सेना ने भारत की पश्चिमी सीमा पर हवाई हमला कर दिया। करीब 15 दिन तक चले युद्ध में पाकिस्तान को करारी हार मिली और उसके 93 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया गया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान की जगह जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बने और उन्होंने इंदिरा के सामने शांति-वार्ता का प्रस्ताव रखा। जिसे इंदिरा ने स्वीकार कर लिया। यहीं शांति-प्रस्ताव शिमला समझौते के रुप में सामने आया।

शिमला भले ही भारत और पाकिस्तान आज अपने मसलों को शांति पूर्ण माहौल में वार्ता के जरिए सुलझाने की बात करते हैं, लेकिन दोनों मुल्कों में बंटवारे के बाद जो कड़वाहट पैदा हुई है वह नीम की कड़वाहट से भी कहीं ज्यादा है। 3 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को सुधारने के लिए शिमला समझौता हुआ था।

बेगम के अचानक बीमार होने पर उनकी जगह बेनजीर को साथ ले आए थे भुट्टो

बताया जाता है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो को शिमला से बेहद लगाव था। 1972 में भारत-पाकिस्तान शिमला शिखर बैठक में पहले उनकी पत्नी नुसरत भुट्टो उनके साथ शिमला आने वाली थीं। खराब सेहत के चलते वह नहीं आईं। उनकी जगह अपनी बेटी बेनजीर को लेकर आए। वह उन दिनों अमरीका में पढ़ाई कर रही थीं और गर्मियों की छुट्टी में पाकिस्तान आईं थीं।
शिमला में देखी पाकीजा फिल्म- बेनजीर जब अपने पिता के साथ इंदिरा से मिलीं तो वह लाल कलर की साड़ी पहने हुए थीं। 19 साल की बेनजीर लाल सुर्ख लिपस्टिक लगाए हुए थीं। उस समय उनके बाल लंबे हुआ करते थे। जुल्फिकार भुट्टो ने अपने प्रेस सचिव और शिमला आए पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य खालिद हसन को हर समय बेनजीर के साथ रहने को कहा। खालिद हसन बेनजीर को शिमला की एक टॉकीज में पाकीजा फिल्म दिखाने ले गए थे।

पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो जो उनके साथ शिमला आई थीं।  बेनजीर उस समय 19 साल की थी। उन्होंने शिमला के सिनेमा हॉल में पाकीजा फिल्म देखी थी। जब वह माल रोड पर घूमने निकली तो लड़कों की भीड़ उनके पीछे पड़ गई थी।

क्या लिखा है बेनजीर ने अपनी किताब में

बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी आत्मकथा डॉटर ऑफ द ईस्ट लिखी। इसमें लिखा है कि हवाई जहाज में उनके पिता ने उन्हें समझाया था कि शिमला में किसी के सामने मुस्कुराना नहीं। यह भी कहा कि तुम्हें दुखी भी नहीं दिखना है। इससे गलत संदेश जाएगा। तब बेनजीर ने उनसे पूछा कि बताएं उन्हें कैसा दिखना है तब भुट्टो बोले, न खुश और न ही दुखी।

माल रोड पर बेनजीर के पीछे लगी लड़कों की भीड़
बेनजीर जब अपने पिता के साथ शिमला आईं तो उनके स्वागत कार्यक्रम के फोटो अखबारों में छप गए। खालिद हसन के साथ बिना

माल रोड पर बेनजीर के पीछे लगी लड़कों की भीड़

माल रोड पर बेनजीर के पीछे लगी लड़कों की भीड़

सुरक्षा के घूमने निकली बेनजीर को शिमला में लोगों ने पहचान लिया। वह जहां-जहां जाती भीड़ उनके पीछे दिखाई देती। हसन ने अपनी किताब में लिखा है कि उस दौरान शिमला में बेनजीर की चर्चा उनके पिता से ज्यादा हुई। हसन ने लिखा है कि इस भीड़ में कई पत्रकार भी शामिल थे। वह उनका इंटरव्यू करना चाहते थे। सिर्फ एक भारतीय पत्रकार दिलीप मुखर्जी को उनसे मिलने की अनुमति दी गई थी वो भी इसलिए क्योंकि उन्होंने भुट्टो की जीवनी लिखी थी।
क्या लिखा है बेनजीर ने अपनी किताब में
बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी आत्मकथा डॉटर ऑफ द ईस्ट लिखी। इसमें लिखा है कि हवाई जहाज में उनके पिता ने उन्हें समझाया था कि शिमला में किसी के सामने मुस्कुराना नहीं। यह भी कहा कि तुम्हें दुखी भी नहीं दिखना है। इससे गलत संदेश जाएगा। तब बेनजीर ने उनसे पूछा कि बताएं उन्हें कैसा दिखना है तब भुट्टो बोले, न खुश और न ही दुखी।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेटी को डाल दिया था असमंजस में

जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेनजीर से कहा था कि भारतीय लोगों को इस बात का जरा भी आभास नहीं होना चाहिए कि पाक के सैनिकों को बंदी बनाए जाने पर हम यात्रा का आनंद ले रहे हैं। बेनजीर की आत्मकथा में असमंजस जैसी स्थिति उस दौरान महसूस होती है क्योंकि जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेनजीर को यह कह कर भी उन्हें संकट में डाल दिया था कि तुम्हें न तो इस यात्रा के दौरान ज्यादा खुश दिखना है और न ही ज्यादा दुखी। बेनजीर लिखती हैं कि यह उस समय उनके लिए बहुत ही कठिन था।

इंदिरा गांधी इंतजाम देखने खुद पहुंची गई थीं शिमला

इंदिरा गांधी शिमला समझौते से एक दिन पहले शिमला के हिमाचल भवन में यह देखने खुद पहुंच गईं थी कि भुट्टो और पाक शिष्टमंडल के रहने का इंतजाम क्या किया गया है। इंदिरा के तत्कालीन सचिव पीएन धर ने अपने लेख में लिखा है कि इंदिरा जब उस कमरे में पहुंची जहां भुट्टो को ठहरना था तो वहां अपनी तस्वीर देखकर भड़क उठीं। उन्होंने तुरंत उसे वहां से हटवाया ताकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को मानसिक तौर पर ये न लगे कि वो लगातार उन पर नजर रखे हुए हैं। इंदिरा ने भुट्टो के कमरे के टॉयलेट का भी मुआयना किया था। वह यह देख कर संतुष्ट हो गईं थीं कि वहां रखी प्रसाधन की सारी चीजें भारत में ही बनी थीं।

जुल्फिकार अली भुट्टो को विरासत में मिला था टूटा हुआ पाकिस्तान

3 जुलाई 1972 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शिमला में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसे शिमला समझौता कहा जाता है। इसमें भारत की तरफ से इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की तरफ से जुल्फिकार अली भुट्टो शामिल थे। जुल्फिकार अली भुट्टो ने 20 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का पदभार संभाला था। उन्हें विरासत में एक टूटा हुआ पाकिस्तान मिला। सत्ता सभालते ही भुट्टो ने यह वादा किया कि वह शीघ्र ही बांग्लादेश को फिर से पाकिस्तान में शामिल करा लेंगे। पाकिस्तानी सेना के अनेक अधिकारियों को, देश की पराजय के लिए उत्तरदायी मान कर, डिसमिस कर दिया गया था।

क्या है शिमला समझौता

कई महीने तक चलने वाली राजनीतिक-स्तर की बातचीत के बाद 3 जुलाई 1972 में शिमला में भारत-पाकिस्तान शिखर बैठक हुई। इंदिरा गाधी और जुल्फिकार भुट्टो ने अपने उच्चस्तरीय मंत्रियों और अधिकारियों के साथ उन सभी विषयों पर चर्चा की थी जो 1971 के युद्ध से उत्पन्न हुए थे। लंबी बातचीत के बाद भुट्टो इस बात के लिए सहमत हुए कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से तय किया जाएगा। शिमला समझौते के तहत एक समझौते पर इंदिरा गाधी और जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे।

एडवांस स्टडी में हुआ था शिमला समझौता

एडवांस स्टडी में हुआ था शिमला समझौता

एडवांस स्टडी में हुआ था शिमला समझौता

6अक्टूबर, 1964 को रजिस्ट्रेशन आफ सोसायटी एक्ट, 1860 के अंतर्गत ‘भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान सोसायटी’ का पंजीकरण हुआ। तब से लेकर इसे राष्ट्रपति निवास भी माना गया। देश और विदेश के रिसर्च फेलो के लिए शोध का प्रमुख केंद्र रहे एडवांस स्टडी दिन प्रतिदिन नई ऊंचाइयां छू रहा है।

14 जून 1945 को की थी शिमला सम्मेलन की घोषणा: 14 जून, 1945 को वायसराय लार्ड वेवल ने एक रेडियो प्रसारण में शिमला सम्मेलन की घोषणा की, जिसकी रूपरेखा तत्कालीन राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने और भारत को पूर्ण स्वराज के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर करने के लिए तैयार की गई थी। 25 जून से 14 जुलाई, 1945 तक वायसरीगल लाज में यह सम्मेलन हुआ। इस बैठक में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सी.राजगोपालाचारी, मास्टर तारा सिंह और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे। यद्यपि पूरे सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी शिमला में रहे मगर कांफ्रेंस के किसी भी सत्र में व्यक्तिगत रूप से हाजिर नहीं हुए। यह कांफ्रेंस तब तक डगमगाती रही, जब तक वायसराय सहित हर प्रतिभागी ने इसकी असफलता स्वीकार कर ली। शायद भारत के विभाजन को रोकने का अंतिम अवसर था जो हाथ से निकल गया था।

दो जुलाई, 1972 को हुआ शिमला समझौता: तत्कालीन देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ। 20 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति का पदभार भुटटो ने संभाला। सत्ता सभांलते ही भुट्टो ने यह वादा किया कि वह शीघ्र ही बांग्लादेश को फिर से पाकिस्तान में शामिल करवा लेंगे। पाकिस्तानी सेना के अनेक अधिकारियों को, देश की पराजय के लिए उत्तरदायी मान कर बरखास्त कर दिया गया था।

लंबी बातचीत के बाद निकला नतीजा: कई महीने तक चलने वाली राजनीतिक-स्तर की बातचीत के बाद अंत में शिमला में भारत-पाकिस्तान शिखर बैठक हुई। इन में कुछ प्रमुख विषय थे, युद्ध बंदियों की अदला-बदली, पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश को मान्यता का प्रश्न, भारत और पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना, व्यापार फिर से शुरू करना और कश्मीर में नियंत्रण रेखा स्थापित करना। लंबी बातचीत के बाद भुट्टो इस बात के लिए सहमत हुए कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से तय किया जाएगा।

इंदिरा गाधी और भुट्टो ने यह तय किया कि दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे

इंदिरा गाधी और भुट्टो ने यह तय किया कि दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे 

यह थे महत्वपूर्ण बिंदु

  • इंदिरा गाधी और भुट्टो ने यह तय किया कि दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे और किसी भी स्थिति में एकतरफा कार्यवाही करके कोई परिवर्तन नहीं करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध न तो बल प्रयोग करेंगे, न प्रादेशिक अखण्डता की अवेहलना करेंगे। साथ ही एक-दूसरे की राजनीतिक स्वतंत्रता में भी किसी प्रकार के हस्तक्षेप की कोशिश नहीं होगी।
  •  संबंधों में मित्रता के विकास के लिए दोनों ही सरकारें एक-दूसरे देश के विरुद्ध प्रचार को रोकेंगी और समाचारों को प्रोत्साहन देंगी। संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सभी संचार संबंध फिर से स्थापित किए जाएंगे।
  •  घनिष्ठ संबंध स्थापित करने के लिए दोनों देशों के लोगों के लिए आवागमन की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी।
  •  शीघ्र ही व्यापार और आर्थिक सहयोग को फिर से स्थापित किया जाएगा।
  • विज्ञान व संस्कृति के क्षेत्र में आपसी आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  •  स्थाई शांति के हित में दोनों सरकारों ने कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले भी किये, इसमें तय हुआ दोनों देशों की सेनाएं अपने-अपने प्रदेशों में वापस चली जाएंगी। 17 सितंबर, 1971 की युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा के रूप में मान्यता दी गयी।
  • दोनों नेताओं की इस मुलाक़ात में यह भी तय किया गया कि भविष्य में दोनों सरकारों के अध्यक्ष मिलते रहेंगे और इस बीच अपने संबंध सामान्य बनाने के लिए दोनों देशों के अधिकारी बातचीत करते रहेंगे। शिमला समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि दोनों देशों ने अपने विवादों को आपसी बातचीत से निपटाने का निर्णय किया।
  • शिमला समझौता के बाद भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियो को रिहा कर दिया।
  • 1971 के युद्ध में भारत द्वारा कब्जा की गई पाकिस्तान की जमीन भी वापस कर दी गई। दोनों देशों ने तय किया कि 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस स्थिति में थी उस रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाएगा। दोनों ही देश इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेंगे। आवागमन की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी ताकि दोनों देशों के लोग आसानी से आ जा सकें।

 

शिमला समझौते पर विशेषज्ञों की राय

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते में अमन-चैन कायम करने के मकसद से दो जुलाई 1972 को हुआ शिमला समझौता अपना लक्ष्य पाने में कुछ हद तक ही कामयाब रहा है।

भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी और पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त रहे जी. पार्थसारथी का हालांकि कहना है कि शिमला समझौता बहुत हद तक कामयाब रहा है। पार्थसारथी के मुताबिक ‘यह इसी समझौते की देन है कि भारत और पाकिस्तान अपने रिश्तों में रोड़े अटकाने वाले मुद्दों पर आपस में मिल-बैठकर बातचीत करते हैं। यह आज भी दोनों देशों के रिश्ते का आधार है।’ उन्होंने कहा कि शिमला समझौते के बाद बनी नयी नियंत्रण रेखा का पालन आज भी दोनों देश बखूबी कर रहे हैं। इस समझौते के बाबत दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राकेश सिन्हा के विचार पार्थसारथी के ठीक उलट हैं। प्रोफेसर सिन्हा के मुताबिक इस समझौते का मकसद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते में पड़ी दरार को कूटनीतिक तरीके से पाटना था लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो सका और आज यह पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है।

प्रोफेसर सिन्हा ने कहा कि यदि कूटनीतिक नजरिए से देखें तो शिमला समझौता बहुत अच्छा कदम नहीं था। इस समझौते का विरोध तत्कालीन विपक्षी दलों ने भी किया था और देश में इस पर आम सहमति नहीं बन पायी थी। प्रोफेसर सिन्हा कहते हैं कि उस समय इस समझौते के विरोध में ‘जनसंघ’ ने एक नारा दिया था ‘देश न हारी फौज न हारी, हारी है सरकार हमारी’।

शिमला समझौते के बारे में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर एस के गुलाटी ने कहा कि यह समझौता आज राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से कोई मायने नहीं रखता लेकिन यह सच है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्ते कायम करने की कोशिशों की बुनियाद इसी समझौते ने रखी थी। गुलाटी ने कहा कि इस समझौते के बाद भी कई दफा पाकिस्तान के साथ रिश्तों की बेहतरी के प्रयास किए गए लेकिन हालात अभी तक जस के तस हैं।

हालांकि उन्होंने उम्मीद जतायी कि शिमला समझौता रूपी आधार का इस्तेमाल कर दोनों देशों के संबंध मधुर बन सकते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिमला समझौते पर पीएचडी कर चुके अभिषेक खन्ना ने इसकी खामियों के बारे में कहा कि इस समझौते की सबसे बड़ी खामी यह थी कि इसमें ‘सियाचिन ग्लेशियर-सालतोरो रिज’ की लाइन को परिभाषित नहीं किया गया था। खन्ना ने कहा कि 1984 में भारत ने इस क्षेत्र में अपनी सेना तैनात की और फिर पाक ने भी यहां अपनी सेना तैनात कर दी। दोनों देशों की ओर से सेना की तैनाती के बाद यह क्षेत्र दुनिया का सबसे उंचा युद्धक्षेत्र बन गया।

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