हिमालयी राज्यों के लिए होगा आपदा राहत निधि का सृजन : निदेशक एवं विशेष सचिव (राजस्व एवं आपदा प्रबंधन) डी.सी. राणा

हिमाचल: 2 अक्तूबर को ग्राम सभा की बैठकों में आपदा प्रबंधन के विषय पर होगी चर्चा और ग्राम स्तर पर गठित होंगी कमेटियांः : डीसी राणा

  • ग्राम सभा के लिए आपदा प्रबंधन विषय पर चर्चा के यह रहेंगे मुख्य मुद्देः-

रीना ठाकुर/शिमला: स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबन्धन हेतु पूर्व तैयारी व आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए ग्राम स्तर पर कमेटियों का गठन किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए निदेशक-विशेष सचिव (राजस्व-आपदा) डीसी राणा ने जानकारी देते हुए बताया कि आगामी 2 अक्तूबर को होने वाली ग्राम सभा की बैठकों में आपदा प्रबंधन के विषय को लेकर गंभीरता से चर्चा की जाएगी।

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में आपदा प्रबंधन सतत विकास की प्राथमिकता बन चुका है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर आपदा हेतु पूर्व तैयारी व आपदाओं के जोखिमों को कम करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से पंचायती राज संस्थाओं, समुदाय आधारित संगठनों व ग्रामीण समुदाय की है। इसके लिए आवश्यक है कि पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन के मुद्दे पर समझ विकसित करने व क्षमता वृद्धि पर ध्यान दिया जाए व पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधि आपदा प्रबंधन पर स्थानीय प्राधिकारी के रूप में अपने दायित्वों को समझें व इस महत्वपूर्ण विषय पर जन-जागरूकता पर ध्यान केन्द्रित करें। आपदा प्रबंधन के विषय पर सभी प्रधानों व उप-प्रधानों के प्रशिक्षण की भी बहुत आवश्यकता है। उन्होंने सभी स्थानीय प्राधिकारी व पंचायत प्रधानों से अनुरोध किया कि वे आगामी 2 अक्तूबर को आपदा प्रबंधन विषय पर केन्द्रित एक विशेष ग्राम सभा का आयोजन करें। उन्होंने बताया कि आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए पंचायती राज संस्थाओं, समुदाय आधारित संगठनों व ग्रामीण समुदाय को प्रशिक्षित और सदैव तैयार रहने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 और आपदा प्रबंधन पर राज्य नीति 2011 के अनुसार ग्राम स्तरीय आपदा प्रबंधन कमेटियां बनाना अनिवार्य है।

अतः इसके तहत प्रत्येक ग्राम सभा में यह कमेटियां बनाना आवश्यक हैं। कमेटी सदस्यों के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि अध्यक्ष के रूप में पंचायत प्रधान, उपाध्यक्ष उपप्रधान/सचिव अथवा पटवारी, आशा कार्यकर्ता, स्थानीय गैर सरकारी संगठन/युवक मंडल/महिला मंडल, युवाप्रतिनिधि(एनसीसी, एनएसएस, एनवायकेएस), प्रतिनिधि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र/सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, स्थानीय धार्मिक संस्थान के प्रतिनिधि, वार्ड सदस्य/ पंचायत में पड़ने वाले सभी गांवों से प्रतिनिधि एवं स्थानीय प्रशासन के विवेकानुसार अन्य कोई स्थानीय संस्था एवं व्यक्ति सदस्य के रूप में रहेंगे। उन्होंने समितियां से स्वयंसेवी भाव से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार आपदा प्रबंधन के लिए सदैव स्वयं को तैयार और सतर्क रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन पर राज्य कार्यकारी समिति (एस.ई.सी.) ने निर्णय लिया है कि ग्राम पंचायत स्तर तक लोगों को आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक किया जाएगा।

ग्राम सभा के लिए आपदा प्रबंधन विषय पर चर्चा हेतु मुद्देः

हिमाचल: 2 अक्तूबर को ग्राम सभा की बैठकों में आपदा प्रबंधन के विषय पर होगी चर्चा : डीसी राणा

हिमाचल: 2 अक्तूबर को ग्राम सभा की बैठकों में आपदा प्रबंधन के विषय पर होगी चर्चा : डीसी राणा

  • स्थानीय प्राधिकारी जिला प्राधिकरण के निर्देशों के अधीन रहते हुए यह सुनिश्चित करेगा, उसके अधिकारी और कर्मचारी आपदा प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित हैं।
  • आपदा प्रबंधन से संबंधित संसाधनों का इस प्रकार अनुरक्षण किया जा रहा है जिससे वे किसी आपदा की आशंका की स्थिति या आपदा की दशा में सदैव उपयोग के लिए उपलब्ध रहेंगे।
  • उसके अधीन या उसकी अधिकारिता के भीतर सभी सन्निर्माण परियोजनांए राष्ट्रीय प्राधिकरण, राज्य प्राधिकरण और जिला प्राधिकरण द्वारा आपदाओं के निवारण और शमन के लिए अधिकथित मानकों और विनिर्देशों के अनुरूप है।
  • प्रभावित क्षेत्र में राज्य योजना और जिला योजना के अनुसार राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के क्रियाकलाप करेगा। स्थानीय प्राधिकारी ऐसे अन्य उपाय कर सकेगा जिन्हें वह आपदा प्रबंधन के लिए आवश्यक समझे।
  •  ग्राम सभा क्षेत्र में होने वाली आपदाओं तथा उनके प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक उपायों तथा कार्य योजना बनाने पर चर्चा।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 41 में पंचायत को दी गई जिम्मेदारी के बारे में चर्चा।
  • अपने मकान का निर्माण करते समय सुनिश्चित करें कि वह आपकी सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • ये देखें कि आपकी ईमारत को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की संहितायों द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप डिज़ाइन एवं निर्मित किया गया है।
  • पंचायत स्तर पर मिस्त्रियों, बार-बाइंडर, इत्यादि को सुरक्षित घर बनाने के बारे में प्रशिक्षित किया जाए।
  • पारंपरिक निर्माण प्रथाओं और ज्ञान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • मनरेगा तथा अन्य मदों में प्राप्त धन से पंचायत में विद्यमान आपदा जोखिमों जैसे: भूस्खलन, आग, भूकम्प, सूखा, बाढ़ आदि को कम करने से सम्बन्धित कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।
  • स्थानीय जनता को आपदाओं से बचने हेतु जागरूक किया जाए।

ईमारत’ पर भकूंप के प्रभाव को कम किया जा सकता है:

  • ईमारत के लिए एक साधारण आयताकार योजना बनाकर।
  •  भकूंप का सामना करने के लिए संरचनात्मक रूप से मजबत नींव बनाकर।
  • दीवारों पर छिद्रों को नियन्त्रण कर।
  • ढलान को स्थिर करना।
  •  अवरोध पैदा करना बाढ़ के लिए सुरक्षित निर्माण कार्य है।
  • उचित साइट का चयन।
  • ईमारतों की मजबूत नींव रखना।

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