हिमाचल की एक महत्वपूर्ण मसालेदार व नगदी फसल अदरक

हिमाचल की एक महत्वपूर्ण मसालेदार व नगदी फसल अदरक

अदरक

अदरक

अदरक हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण मसालेदार व नगदी फसल है। यह लगभग 20 हैक्टेयर भूमि पर उगाया जाता है तथा इसका उत्पादन लगभग 160 टन होता है। अदरक की खेती मुख्यत: सिरमौर, सोलन, शिमला, बिलासपुर, मण्डी व कांगड़ा जिलों में की जाती है। ताजा एवं सूखा ‘सोंठ’ अदरक देश के दूसरे भागों में भेजा जाता है। इसकी खेती 50 से 60 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सफलता से की जाती है।
उन्नत किस्में
हिमगिरी : यह निचले तथा मध्यवर्ती क्षत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है तथा इससे अधिक पदैावार ली जा सकती है इस किस्म पर गट्ठी सडऩ रोग का कम से कम प्रकोप होता है।

निवेश सामग्री :

क्रमांकप्रति हैक्टेयरप्रति बीघाप्रति कनाल
बीज ( क्विंटल ) 201.600.80
खाद एवं उर्वरक---
गोबर की खाद (क्विंटल )302412
विधि -1
यूरिया ( किलो ग्राम)20168
सुपरफास्फेट ( किलो ग्राम )3152512
म्यूरेट ऑफ पोटाश (किलो ग्राम) 806.53.2
विधि- 2
12.32.16 मिश्रित खाद (किलो ग्राम )156.3 12.56.3
म्यूरेट ऑफ पोटाश (किलो ग्राम)413.31.7
यूरिया ( किलो ग्राम)175147
मल्च
हरी पत्तियां (टन)12.51.00.5
सूखी पत्तियां (टन)50.40.2
गोबर की खाद (टन) 100.80.4

सस्य क्रियायें:
अदरक की गांठें जिनमें कम से कम 2-3 आंखें व 30-40 ग्राम वजन वाली तथा स्वस्थ व रोग रहित होनी चाहिए।
विधि1
खेत की तैयारी के समय गोबर की खाद, सुपर फास्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा एवं यूरिया की आधी मात्रा मिट्टी में मिला दें तथा शेष यूरिया मिट्टी चढ़ाने के समय बीजाई के एक या दो महीने बाद टाप ड्रेस कर दें।
विधि2
गोबर की खाद, 12:32:16 मिश्रित खाद, म्यूरेट ऑफ पोटाश की सारी मात्रा व यूरिया खाद की आधी मात्रा खेत तैयार करते समय डालें। यूरिया खाद की शेष मात्रा मिट्टी चढ़ाने के समय डालें।
बीजोपचार
बीज को भण्डारण एवं बीजाई से पहले 10 ग्राम बैकिवस्टीन 50 डब्ल्यू पी तथा 25 ग्राम इंडोफिल फल एम-45 प्रति 10 लीटर पानी मे घोलकर एक घण्टे तक उपचारित कर ले।
दूरी
उपचारित कन्दों को पंक्तियों में 30-45 सैंटीमीटर व कन्दों के बीच की दूरी 20 सैंटीमीटर रखनी चाहिए तथा 3-4 सैंटीमीटर की गहराई पर बीजना चाहिए। मक्की की फसल का प्रयोग अदरक में छाया देने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए अदरक की हर तीसरी कतार के उपरान्त मक्की की एक कतार लगाएं।
बीजाई का समय
निचले क्षेत्र :    मध्य जून
मध्य क्षेत्र :     मध्य अप्रैल – मध्य मई
ऊंचे क्षेत्र :    अप्रैल
सिंचाई व निराई-गुड़ाई
अदरक की फसल के लिए भूमि में बराबर नमी बनी रहनी चाहिए। खेत खरपतवार रहित होना चाहिए तथा प्रत्येक गुड़ाई के समय मिट्टी अवश्य चढ़ाएं। यदि पहली मल्च सड़ जाए तो 45 दिन बाद दूसरी मल्च की तह लगा दें ।
खुदाई
गांठें जब तैयार हो जाएं तो खुदाई करके निकाल लें तथा बाजार भेज दें। बाजार के लिए सितम्बर महीने में पुरानी व नई गांठों को निकाल लें व बीज के लिए नवम्बर-दिसम्बर में गांठों को खेत से निकाला जाता है।
अदरक से सौंठ तथा सफेद सौंठ बनाने की विधि
सौंठ बनाने के लिए अदरक के कन्दों को बीजाई के 7-8 महीने बाद निकाले जब पत्ते पीले पडक़र गिरना शुरू कर दें। कन्दों को अच्छी तरह पानी से धेएं ताकि मिट्टी तथा जड़ों कन्दों से साफ हो जाएं। इसके उपरान्त बांस या लकड़ी के चाकू बनाकर कन्दों के छिलकों को निकाल दें तथा इस बात का ध्यान रखें कि छिलका गहरा न निकले। छिलका निकालने के लिए लोहे के चाकू का प्रयोग न करें। अदरक के कन्दों का छिलका निकालने के लिए ड्रम का प्रयोग भी किया जाता है। छिलका निकालने के बाद कन्दों को 8-1० प्रतिशत नमी तक धूप में सूखाएं।

सफेद सौंठ बनाना
उपरोक्त विधि द्वारा सूखाए गए अदरक को चूने के पानी (10-20 ग्राम चूना प्रति लीटर पानी) में 4-6 घन्टे तक डूबोएं तथा निकालने के उपरान्त धूप में सुखाएं इस विधि को 2-3 बार तक दोहराएं ताकि सौंठ का रंग सफेद हो जाए।
उपज ( क्विंटल )     प्रति हैक्टेयर     प्रति बीघा        प्रति कनाल
 10-150                   8-12              4-6
भण्डारण
भण्डारण के लिए रोगमुक्त क्षेत्रा से रोग रहित मोटी तथा फूली हुई गठ्ठियां ही चुने। अदरक की गठ्ठियों का भण्डारण करने से पहले उनका इंडोफिल एम-45 (0.025) प्रतिशत तथा 0.1 प्रतिशत बैविस्टीन 10 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी के मिश्रण से 60 मिनट तक उपचार करें । इससे गठ्ठियां सडऩे से बचती है। बीज गठ्ठियों को उपयुक्त गड्ढों में रेत की परतों से ढक कर रखा जाता है और ऊपर से लकड़ी का तख्ता रखा जाता है। हवा की उचित मात्रा प्राप्त करवाने के लिए तख्ते में छेद करते हैं और बाकी के भाग को गोबर से लेप दिया जाता है। तख्ते के ऊपर मिट्टी की ऊंची तह बनाई जाती है ताकि बाहर से पानी गड्ढे में न जाए।
बीज अदरक का भण्डारण

  •  नमी रहित क्षेत्रों में 1*1*1 मीटर आकार का गड्ढा बनायें तथा इसकें किनारों पर पत्थर लगायें।
  •  गड्ढे में 10 सैं. मी. मसेटी रेत की तह बिछायें।
  •  मोटी और रोगमुक्त गठ्ठियां चुने तथा दिसम्बर में एक घण्टे के लिए 25 ग्राम इंडोफिल एम-45 और 10 ग्राम बैविस्टीन प्रति 10 लीटर पानी के घोल में 60 मिनट तक रखें तथा छाया में सुखा लें।
  •  इन उपचारित गठ्ठियों को 48 घन्टे के बाद गड्ढे में उसकी उंचाई से 10-12 सें.मी. नीचे तक फैला कर लकड़ी के तख्ते से ढक दें।
    तख्ते में सुराख या दरार रखें तथा शेष भाग को गोबर से लेप दें ।
  •  गड्ढे का तापमान 12-13 सेल्सियस तथा आपेक्षित नमी 65 प्रतिशत रखें।
  •  निचले पर्वतीय क्षेत्रों में अप्रैल-मई में गठ्ठियों को गड्ढे से बाहर निकालें तथा रोगी गठ्ठियो को निकाल दें । पनीले ध्ब्बे वाली गठ्ठियों के सड़े भाग को काटने के बाद स्ट्रैप्टोसाईक्लिन (2 ग्रा./10 लीटर पानी) में 30 मिनट के लिए डुबोकर रखें ।
  •  उपचारित गठ्ठियों को पुन: गड्ढे में रखें।

पौध संरक्षण
लक्षण     
बीमारियां   
गठ्ठी सडऩ रोग: गठ्ठियां नरम और कमजोर गुद्दे वाली हो जाती हैं। रेशे के सिवाय सभी पत्तियां सड़ जाती हैं, पत्ते पीले पड़ जाते हैं और उन पर पनीले स्थान बन जाते हैं व नीचे से सडऩे शुरू हो जाते हैं ।
उपचार
1. रोगमुक्त गठ्ठियों का प्रयोग करें।
2. रेागमुक्त गठ्ठियों को भण्डारण से पूर्व तथा बुआई से पूर्व 60 मिनट के लिए 25 ग्रा. इंडोफिल एम-45 और 10 ग्रा. बैविस्टीन 50 डब्ल्यू पी प्रति 10 ली. पानी के घोल में रखे तथा इसे छाया में 48 घन्टे के लिए सुखायें।
3. निचले तथा मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में प्रभावित पौधें को कापर ओक्सिक्लोराईड ( 30 ग्राम ब्लाईटीक्स-50, प्रति 10 लीटर पानी) से अगस्त और सितम्बर में सिंचाई करें।
4. अदरक की गठिठ्यां को प्रात: 11-11. 45 के बीच पोलेथिन थेलियो (25 एम.एम.) में डालकर धूप में रखें । इसके उपरान्त अदरक को छाया में सुखा लें या धूप में रखी गठिठ्यों को गर्म पानी (45डि.से.) में आधे घण्टे तक डुबायें। इसके पश्चात इसे छाया में सुखा लें।
पीलीया रोग: पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा पौधे मुरझा जाते हैं। गठ्ठियां सड़ जाती हैं। रोग कहीं-कहीं प्रकट होता है। गठ्ठी सडऩ रोग की तरह ही इसका उपचार किया जाता है
पत्ती धब्बा रोग: अनियमित सफेद रंग के काले किनारे वाले धब्बे पत्तियों पर बन जाते हंै तथा पत्तों के किनारे भूरे हो जाते हैं। रोग प्रकट होने पर 30 ग्राम ब्लाइर्टक्स-50 प्रति 10 लीटर पानी के घोल का छिडक़ाव हर दस दिन बाद करें।
फाईलोस्टिकटा पत्ता धब्बा रोग : पत्तों पर हल्के गहरे रंग के धब्बे बनते हैं। फसल पर हैक्साकोनाजोल 5 ई. सी. कनटॉफ (0.1:)का छिडक़ाव करें।
भण्डार का गठ्ठी सडऩ रोग : गठ्ठियों पर पनीले धब्बे बन जाते हैं। बुआई से पूर्व गठ्ठियों को 30 मिनट के लिए स्ट्रप्टोसाईक्लिन (2ग्रा./10 लीटर पानी) के घोल में रखें।
कीट: जड़ ग्रन्थि सूत्राकृमि : ये सूत्राकृमि गठ्ठियों मे सडऩ तथा पीलिया बढ़ाने में सहायक होते हैं ।  

1. बीज-गठ्ठियों का चुनाव सडऩ रहित क्षेत्रों से करें।
2. अन्न के साथ वाला फसल चक्र अपनाएं। विशेषतय: तीन वर्ष में एक बार धन अवश्य लगाएं।
3. खेत तैयार करते समय कारबोफ्रयूरान (फ्रयूराडान 3 जी) 30 कि. ग्राम प्रति हैक्टेयर डालें।
फसल रोगों की एकीकृत व्यवस्था
1. स्वस्थ बीज का प्रयोग करें व पांच वर्षीय फसल चक्र अपनाएं।
2. बीज को एक घन्टे के लिए 25 ग्रा. इंडोफिल एम-45 और 10 ग्रा. बैविस्टीन को 10 लीटर पानी के घुले मिश्रण में डुबोकर 48 घण्टे के लिए छाया में सुखाएं।
3. रोगी भागों को नष्ट करें तथा प्रभावित पौधे को कॉपर आक्सीक्लोराईड (30 ग्रा. ब्लाईटाक्स-50 प्रति 0 ली. पानी) से मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में अगस्त में तथा निचले पर्वतीय क्षेत्रों में सितम्बर में सीचें । जल निकास का पूर्ण प्रबन्ध रखें।
4. पत्ता धब्बा रोग होने पर कापर आक्सीक्लोराईड का छिडक़ाव हर 10 दिन बाद करें।

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