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“स्कैब” रोग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में किसानों एवं बागवानों को बागवानी विभाग की सलाह....

“स्कैब” रोग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में किसानों एवं बागवानों को बागवानी विभाग की सलाह….

रीना ठाकुर/शिमला: प्रदेश के कुछ सेब उत्पादक क्षेत्रों में स्कैब रोग के लक्षण पाए जाने के बाद बागवानी विभाग ने इस परिस्थिति से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाए हैं।

विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि यद्यपि विभाग हर वर्ष डा.वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के सहयोग से सेब स्केब रोग छिड़काव सारणी विभाग तैयार करवाता है, जिसके अनुसार आवश्यक दवाइयों का वितरण समय रहते किया जाता है। लेकिन प्रत्येक सावधानियों के बावजूद इस वर्ष कुछ क्षेत्रों में इस रोग के लक्षण सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष फरवरी माह से ही प्रभावित क्षेत्रों में उच्च आर्द्रता का वातावरण बना हुआ है जिससे इस रोग के बिजाणु पनप रहे हैं। यही कारण है कि प्रत्येक सावधानी के बावजूद सेब के पौधों पर इस रोग के लक्षण पाए गए हैं।

बागवानी विभाग ने इस स्थिति से निपटने के लिए निदेशालय स्तर पर एक समिति का गठन किया है जो इस रोग के नियंत्रण के लिए उपयोग की जाने वाली आवश्यक दवाइयां को प्रभावित क्षेत्रों में आपूर्ति एवं वितरण पर निगरानी रखेगी। इसके अतिरिक्त इस रोग की रोकथाम के लिए बागवानी विश्वविद्यालय के विज्ञानी व विभाग के अधिकारी जागरूकता शिविर लगा रहे हैं। प्रभावित क्षेत्र के उद्यान अधिकारियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं और उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि बागवानों को तुरन्त आवश्यक सहायता प्रदान की जाए।

उन्होंने कहा कि किसानों एवं बागवानों को सलाह दी गई है कि स्कैब रोग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बागवानी विभाग की ओर से सुझाई गई छिड़काव सारिणी अनुसरण करें। विभाग ने सलाह दी है कि अखरोट के आकार के सेब पर मैनकोजेब या प्रोपिनेब या डोडिन अथवा माईक्लोबुटानिल का छिड़काव करें। इसके अलावा टेबुकोनाजोल आठ प्रतिशत व कैप्टान 32 प्रतिशत एससी अथवा मेटीराम 55 प्रतिशत व पायराक्लोस्ट्रोबिन पांच प्रतिशत का छिड़काव भी किया जा सकता है।

इसके बीस दिन के उपरान्त टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत व ट्राईफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी, प्रोपिनेब या जीनेब का छिड़काव करें। फल तोड़ने से 20-25 दिन पूर्व कैप्टान या जिरम अथवा मैटीराम 55 प्रतिशत व पायराक्लोस्ट्राबिन पांच प्रतिशत का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

उन्होंने कहा कि अधिक वर्षा के कारण फफूंदीनाशक दवाइयां जल्दी घुल सकती हैं और उनका असर भी कम हो जाता है। इसलिए छिड़काव घोल तैयार करते समय उसमें स्टीकर का प्रयोग आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह भी सलाह दी गई है कि अगर छिड़काव के एक-दो घंटे बाद बारिश हो जाती है तो दूसरे दिन फिर छिड़काव करें।

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